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सर्वकोश
दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary

महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा

DevanagariHindipublished156 पृष्ठ

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७ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
सुधा के स्रव से ? कुण्डलिनी जागरण और अमृत रस या सोम
पान ही मद्य के लिये प्रयुक्त होता है ।
२. मांस-काम, क्रोध, लोभ मोह आदि पशु वृंद हनै, धैर्य
से विवेक रूपी खड्ग चलाय के' इस अर्थ में मांस शब्द का प्रयोग
हुआ है । मांस, उड़द को भी कहते हैं । सूरदास ने अपने कूट
पद (हरि-आहार चलिजात) में इसका अर्थ मांस (मास) महीना
अर्थात् अवधि के रूप में भी किया है ।
३. मत्स्य-विषय विराग रूपी बागुरा बिछाइ दैकै, धीवर
कृती की प्रतिकृति को अनुसरै । द्वेष-मद, मान, दम्भ, मत्सर पशु-
द्वय आदि मीन मति वृद्ध विद्या सहित मेलै धरै । अर्थात् विषय
रूपी जल में आसक्त इन्द्रिय रूपी मछलियों को अलग करना
है ।
४. मैथुन-
पर पद को पहुंची हैं सूक्ष्म रूप नाड़िका जो,
सुषुम्ना है नाम वाको, सुन्दरी समझिये ।
चन्द्र-सूर्य योग में उसी के साथ संग करि,
सुन्दर सब भूषण ले श्यामा को साजिये ।'
अर्थात् यह दिव्य नाड़ी सुषुम्ना का प्रसंग है । जिसका
इडा-पिंगला (सूर्य-चंद्र) नाड़ियों के साथ समागम है ।
५. मुद्रा-
आशा अरु तृष्णा, भय, घृणा, लज्जा, कोप, जुगुप्सा
(घृणा) ये अष्ट भारी कष्ट कारी हैं । वृक्ष रूपी पावक में आठों
को पकायदे वै, तांत्रिक क्रिया कलाप के जो अधिकारी हैं ।"
भावानुकारिणी आकृति - विकृति ही मुद्रायें हैं । गायत्री - जप के
पूर्वापर में भी मुद्रायें की जाती हैं। जिज्ञासु जन इन पाँचों मकारों
के अर्थ 'दुर्गा-महिमा' ग्रन्थ में विस्तार से देख सकते हैं ।