दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
पुराणों में सीता, लक्ष्मी, राधा, उमा आदि नामों से यही
शक्ति अभिहित है जो 'केनोपनिषद्' के यक्ष प्रसङ्ग में ब्रह्म-विद्या
होकर देवों को उपदेश देती है । ऋग्वेद में यही वाक्-शक्ति है ।
सांख्य-दर्शन में इसी का नाम 'अमृता' है । कहा है—पुरुषे षोडश
कले तामाहुमृतां कलाम् ।'
ऋषियों के विचार से प्रतिपाद्य वस्तु का प्रतिपादन
पुराण, श्रुति, ध्वनि, तेज, प्रभा इन पांच प्रकार से होता है ।
इसी क्रम से उनका वर्णन भी है । इसी देवी से अवतारों का
प्राकट्य इस क्रम से प्रतिपादित है । देवी के दायें हाथ के अंगूठे
से मत्स्य, तर्जनी से कूर्म, मध्यमा से वराह, अनामिका से नृसिंह,
कनिष्ठा से वामन और बायें हाथ के अंगूठे से परशुराम, तर्जनी
से राम, मध्यमा से कृष्ण, अनामिका से बुद्ध जी प्रकट हुये हैं ।
कश्मीर की पावन कन्दराओं से लेकर कन्या कुमारी तक,
कच्छ से लेकर कामाख्या तक सम्पूर्ण भारत में इस पराम्बा
शक्ति की अनेक स्थलों पर ख्याति प्राप्त सिद्ध पीठें हैं, जहाँ माँ
के परम उपासक उपासना के माध्यम से अभीष्ट प्राप्त करते हैं
ये सिद्ध पीठें सर्वत्र हैं जिनमें काशी, काञ्ची, मलयगिरि, विन्ध्य
मालावार, मालवा, गुजरात, दतिया, प्रयाग, बंगाल तथा नेपाल
कामाख्या आदि में विशेष प्रसिद्ध हैं ।
यही शक्ति दस महा विद्याओं के रूप में वर्णित है—
काली तारा महाविद्या षोडशी भुवनेश्वरी ।
भैरवी छिन्न मस्ता च विद्या धूमावती तथा ॥
बगला सिद्ध विद्या च मातंगी कमलात्मिका ।
एतादश महा विद्या *सर्व तन्त्रेषु गोपिता ॥
- (सिद्ध विद्या प्रकीर्तिता पाठान्तर)
इनमें से किसी एक की उपासना में दीक्षित होकर ही
आराधना की जाती है ।
समस्त शाक्त - उपासना का लक्ष्य 'सर्वं खलु, इदं ब्रह्म'
का ज्ञान ही है ।” इसी की सिद्धि हेतु 'दुर्गा-पूजा' महोत्सव क