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सर्वकोश
दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary

महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा

DevanagariHindipublished156 पृष्ठ

पृष्ठ 30, कुल 156 में से

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श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ६
आयोजन होता है । यही दुर्गा-पूजा, दुर्गा सप्तशती में कही गई
है । एनर्जी पावर कहकर वैज्ञानिक भी इसे मानते हैं, किन्तु कुछ
कौल मतावलम्बियों के द्वारा आचारहीन-कृत्य किये जाने के
कारण शाक्त लोग समाज में बदनाम भी हुए हैं वस्तुतः यह
उनकी अल्पज्ञता अर्थवाद की अनर्थता के कारण हुई है । किस
शब्द का कहाँ क्या अर्थ होता है ? इस ज्ञान के अभाव में बड़े-
बड़े अनर्थ हुए हैं । अतः इससे बचने के लिए अर्थ समझ लेना
अनिवार्य है । जैसे देवी बलि से प्रसन्न होती है । लोगों ने
इसका अर्थ पशु-बलि ही नहीं, अपितु नर-बलि देने जैसे पाशविक
कृत्य करने का अर्थ ले लिया है, जबकि इस 'बलि' शब्द का
अर्थ स्वयं देवी जी ने स्पष्ट किया है जो दृष्टव्य ही नहीं; अपितु
ध्यातव्य भी है—'काम क्रोधौ द्वौ पशू तावेव बलिमर्पयेत्' अर्थात्
काम - क्रोध दोनों पशु है । मनुष्य जब इन दोनों को सर्वथा नष्ट
करता है, तभी देवी प्रसन्न होती हैं । कुछ दो - चार शब्दों के
उदाहरण प्रस्तुत करना यहाँ प्रासङ्गिक ही नहीं, अपितु अनिवार्य
भी है जिससे सुधीजन तो लाभान्वित होंगे ही, सामान्य जन भी
अनावश्यक पाप कर्म से वञ्चित होकर धर्म लाभ उठावेंगे ।
अब आप 'अजा' शब्द को लीजिए—अजा अविद्या को
कहते हैं । मूर्खों ने अविद्या का संहार करने की अपेक्षा बकरों
की बलि चढ़ाना प्रारंभ कर दिया । इसी प्रकार—मद्य, मांस,
मत्स्य, मैथुन और मुद्रा ये पञ्च मकार बड़े प्रसिद्ध हैं, जिनका
अर्थ न समझ कर अज्ञ तथा इन्द्रिय - लोलुप जनों ने बड़ा ही
दुरुपयोग किया है । वस्तुतः सन्त योगी जन ही इन गुत्थियों को
सुलझा कर मार्ग - दर्शन करते हैं । अतः संक्षेपतः इनका अर्थ
भी देखिए—
१. मद्य (मदिरा)—आत्मानन्द की परम अनुभूति में जो
(भूमा स्थिति) मस्ती आती है उसी को 'मदिरा' कहते हैं । जैसे
भरी है सहस्रार पद्म-रूपी भाजन में, पली है जो चन्द्र की कला