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सर्वकोश
दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary

महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा

DevanagariHindipublished156 पृष्ठ

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पृष्ठ 34

श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ १०
इस प्रकार सत्सङ्ग से, पञ्च मकार सेवन से सत्व गुण की
वृद्धिहोती है । त्रिगुणमयी प्रकृति से परे परम तत्व की उपलब्धि
आत्मस्वरूप में होती है । प्रत्येक जीव में ईश्वर ने दिव्य गुण
दिये हैं, उन्हें प्रकट करना ही पुरुषार्थ है । शरीर क्षेत्र (खेत) है
'इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते' गीता (१३) । इसमें
दोनों प्रवृत्तियाँ हैं—सत्य क्षमादि सात्विकी तथा काम - क्रोधादि
तामसी । ये ही कभी धर्मराज - दुर्योधन तो कभी राम - रावण
कभी कृष्ण-कंस और कभी महिषासुर, चण्ड-मुण्डादि कह दिये
जाते हैं । देवासुर संग्राम अपने भीतर देखना ही साधना है,
आसुरी प्रवृत्तियों को जीतना ही पुरुषार्थ है ।
सच्चे साधक को सदैव निन्दा से दूर रहना अपेक्षित है ।
उसे किसी की निन्दा नहीं करनी चाहिए । विशेषतः उसमें भी
'स्त्रियं न निन्देत' के अनुसार स्त्रियों की तो कदापि निन्दा न
करें, क्योंकि नारी तो सभी पराम्बा स्वरूपा ही हैं । तभी
'या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता' कहा है । इसी आचार
से माँ के किसी निम्नलिखित रूप का ध्यान करके लक्ष्य-सिद्धि
संभव है, क्योंकि यही आचार पुरुषार्थ है ।
माँ के ये मुख्य आठ रूप ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी,
वैष्णवीं, वाराही, नारंसिही, ऐन्द्री, चामुण्डा नामों से उल्लिखित
हैं, ये आठ शक्तियों के रूप में प्रसिद्ध हैं । दृष्टान्त के रूप में
'चामुण्डा' को ही ले लीजिए । 'चामुण्डा' आठवी शक्ति का नाम
चामुण्डा है । प्रवृत्ति का अर्थ चण्ड तथा निवृत्ति का अर्थ मुण्ड
है । ये दोनों भाई हैं जो काम और क्रोध के रूप में भी माने
गये हैं । पाणिनि जी की 'चडि कोपे तथा मुडि खण्डने धातुओं
से इसकी निष्पत्ति हुई है ।' इसकी संहारक शक्ति का नाम ही
चामुण्डा है, जो स्वयं प्रकाशमान हैं । वे किसी आधार को लेकर
प्रकाशित नहीं हैं । अतः इनका कोई वाहन भी नहीं बतलाया
गया है । इस पराम्बा शक्ति के पाँच कार्य बताये गये हैं ।