ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
अथवा अतिथि जब आता । तब जो जो करना पडता ।
ऐसे कर्मको जानना पार्थ । नैमित्तिक कर्म ॥ ११ ॥
वर्षासे क्षुब्ध होता गगन । वसंतमें खिलता है वन ।
देहको शृंगारता यौवन । जिस भांति ॥ १२ ॥
या सोमकांत सोम स्रवता । सूर्यसे है कमल खिलता ।
मूलमें जो था वही विकसता । जैसे यहां ॥ १३ ॥
वैसे नित्यका जो होता कर्म । वही नैमित्तिक यह नियम ।
जब वह दृढ-सा होता नाम । नैमित्तिक ॥ १४ ॥
तथा सायं प्रात और मध्यान्ह । करना होता जो प्रतिदिन ।
जैसी दृष्टि होती है लोचन-। को नहीं भारी ॥ १५ ॥
नहीं आती है जिस भांति गति । चरणोंमें वह सहज होती ।
अथवा दीपमें होती है दीप्ति । पांडुकुमार ॥ १६ ॥
बिन पुटके जैसे चंदन । सुगंध देता है निशिदिन ।
अधिकारका वैसे अर्जुन । वही है रूप ॥ १७ ॥
नित्य-कर्म ऐसे है जन । बोलते हैं वह तू जान ।
नित्य-नैमित्तिक अर्जुन । दिखाये ऐसे ॥ १८ ॥
यही है नित्य नैमित्तिक । करना है जो आवश्यक ।
इसीलिये कहते देख । निष्फल इसको ॥ १९ ॥
किंतु जैसे भोजनमें सतत । भूख मिटकर होता तृप्त ।
वैसे नित्य-नैमित्तिकका पार्थ । अंगभूत है फल ॥ १२० ॥
हीन कस सोना आगमें पड़ता । हीनता तज कर तेज चढ़ता ।
इन कर्मोंका वैसा ही फल होता । जानना यहां ॥ २१ ॥
इससे दोष सब मिटते । स्वाधिकार सतत बढ़ते ।
तथा सद्गति ओर बढ़ते । अहर्निश ॥ २२ ॥
इतना यह सब रसाल । नित्य-नैमित्तिकका है फल ।
किंतु तजते मूलका बल । वैसे तजना इसे ॥ २३ ॥
ज्ञानेश्वरी ७२०
त्यागवृत्तिका रहस्य, संन्यास और त्यागका फल—
वन सारा खिल उठता । आम्र-वृक्ष भी महकता ।
न छूकर ही छोड़ जाता । वसंत जैसे ॥ २४ ॥
वैसे न कर कर्म-सीमा उल्लंघन । सदा कर नित्य-नैमित्तिकाचरण ।
तजना उसकी फल-आशा संपूर्ण । उच्छिष्ट जैसे ॥ २५ ॥
कर्म-फलका जो यही त्याग । ज्ञानियोंसे कहलाता त्याग ।
वैसे संन्यास और त्याग । कहा है तुझसे ॥ २६ ॥
जब यह संन्यास संभवता । काम्य-कर्म नहीं बांध सकता ।
निषिद्ध स्वभावसे छूट जाता । जो है निषिद्ध ॥ २७ ॥
तथा जो नित्यादिक होता । फल-त्यागसे है नाशता ।
जैसे अवयवोंका होता । सिर काटनेसे ॥ २८ ॥
फल पाकसे सस्य सूखता । वैसे सब कर्म है छूटता ।
आपसे आप खोजता आता । आत्म-ज्ञान ॥ २९ ॥
इस भांति यह दो अर्जुन । त्याग संन्यासका आचरण ।
देते हैं हृदय-सिंहासन । आत्म ज्ञानको ॥ १३० ॥
कर्म-त्यागकी यह कुशलता । छूट कर कर्मका त्याग जब होता ।
उस त्यागसे त्यागी है फंसता । जालमें अधिक ॥ ३१ ॥
नहीं करके रोगका निदान । औषध दिया विष होता जान ।
भूखके समय न खाया अन्न । ने मारती क्या भूख ॥ ३२ ॥
त्याग करना जहां नहीं उचित । वहां त्याग करना अनुपयुक्त ।
तथा जिसका त्यागना है उचित । नहीं करना लोभ ॥ ३३ ॥
त्यागका यह मर्म भूलकर । बना लेते हैं त्यागका भी भार ।
नहीं देखते वहां धनुर्धर । कभी वीतराग ॥ ३४ ॥
(85) ७२१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद योग
त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः ।
यज्ञदानतपः कर्म न त्याज्यमिति चापरे ॥ ३ ॥
फलाशा जो न छोड सकता । कर्मको वह बद्ध कहता ।
जैसे आप नग्न हो कहता । जग झगड़ालू ॥ ३५ ॥
जिव्हा-लंपट रोगी जैसे । अन्नको दोष देता वैसे ।
या कोढी चिढे मक्खियोंसे । उसी भांति ॥ ३६ ॥
जो हैं फल-काम दुर्बल । कहते हैं कर्म ही मल ।
फिर मत देते केवल । कर्म हैं त्याज्य ॥ ३७ ॥
कहता कोई यज्ञादिक । करना अति आवश्यक ।
उसके बिना न शोधक । दूसरा कुछ है ॥ ३८ ॥
यदि है चित्त-शुद्धिका मार्ग । चलना चाहे कोई सवेग ।
देता है कर्म उसमें वेग । उसे तजना नहीं ॥ ३९ ॥
यदि सुवर्णको शुद्ध करना । उसको जैसे आगमें तपाना ।
या लोह-दर्पण स्वच्छ करना । जमाना है रज ॥ १४० ॥
या कपडोंको स्वच्छ करना । ऐसी होती है मनोकामना ।
धोबीकी भट्टी गंदी करना । ऐसे होगा ॥ ४१ ॥
वैसे दुःख दायक कर्म जात । ऐसे मान उन्हे 'तजना नित ।
रसोईका क्लेश मान पार्थ । मिलेगा क्या अन्न ॥ ४२ ॥
सुन कर ऐसे ऐसे शब्द । कर्म-रत होते हैं सुबुद्ध ।
ऐसे त्याग विषयमें विशुद्ध । हुवा न निर्णय ॥ ४३ ॥
तमी न मिटे इसका निर्णय । त्यागके विषयमें हो निर्णय ।
ऐसे कहता हूं मैं धनंजय । ध्यानसे सुन तू ॥ ४४ ॥
छोड़ना कहते कोई कर्म हैं दोष रूप जो ।
न छोड़ कहते कोई यज्ञ दान तपादिक ॥ ३ ॥
ज्ञानेश्वरी ७२२
निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम ।
त्यागो हि पुरुषव्याघ्रः त्रिविधः संप्रकीर्तितः ॥ ४ ॥
त्याग भी तीन प्रकारका है—
त्याग जो सो यहां अर्जुन । तीन प्रकारका है जान ।
इन प्रकारका वर्णन । कहूंगा अब ॥ ४५ ॥
त्यागके तीन प्रकार । होते हैं यदि गोचर ।
इनका इत्यर्थ सार । जान तू इतना ॥ ४६ ॥
मुझ सर्वज्ञ बुद्धिको जंचता । वह निश्चित मत मैं कहता ।
उसको जान तू पहले पार्थ । इस स्थान पे ॥ ४७ ॥
चाहता जो संसारसे छुटकार । तथा इसमें सावध धनुर्धर ।
उसके लिये हैं सब ही प्रकार । करणीय हैं ये ॥ ४८ ॥
यज्ञदानतपः कर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् ।
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ॥ ५ ॥
आत्म-ज्ञानका निश्चय न होने तक कर्म अनिवार्य है—
जैसे यज्ञ दान तपादिक । कर्म करना है आवश्यक ।
न छोडे कभी उन्हे पथिक । डग भरना जैसे ॥ ४९ ॥
खोया हुवा जब नहीं मिलता । उसका भाग नहीं तजा जाता ।
या जब तक तृप्त नहीं होता । न छोड़ते थाली ॥ १५० ॥
तट पाने तक न तजते नांव । फलने तक केला न काटे पांडव ।
रखा हुवा मिले तब तक सदैव । रखते हैं दीप ॥ ५१ ॥
वैसे आत्म-ज्ञानका विषय । न होता जब तक निश्चय ।
न होना कर्ममें धनंजय । उदासीन ॥ ५२ ॥
तभी तू इसमें मेरा सुन निश्चित निर्णय ।
कहते जिसको त्याग वह भी तीन भांतिका ॥ ४ ॥
तप यज्ञ तथा दान अवश्य करना नित ।
होते पावन ज्ञानीको तजना न इन्हे कभी ॥ ५ ॥
७२३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद योग
सत्कर्मके तीर्थसे उज्वल होनेसे सत्व-शुद्धि होती है—
किंतु स्वाधिकारानुरूप । करना यज्ञ दान तप ।
अनुष्ठान करें आक्षेप । किये बिना ॥ ५३ ॥
चलनेमें जो वेग बढ़ता । विश्रांतिकाही कारण होता ।
वैसे कर्मातिशयमें आता । नैष्कर्म्य पास ॥ ५४ ॥
पथ्यमें जैसे नियमित । होता जाता है वैसे पार्थ ।
रोगसे हठता निश्चित । उसी प्रकार ॥ ५५ ॥
वैसे कर्म होते जो आवश्यक । करनेसे कुशलतापूर्वक ।
झड़ते हैं रज तम निरर्थक । पूर्ण-रूपसे ॥ ५६ ॥
या क्षारसे जैसे सतत । पुट देते स्वर्णको पार्थ ।
निर्मल हो जाता तुरंत । सुवर्ण जैसे ॥ ५७ ॥
वैसे निष्ठासे किया हुवा कर्म । धोता जाता है सदा रज तम ।
तथा सत्व-शुद्धिका पुण्य-धाम । दृष्टिमें आता ॥ ५८ ॥
इसीलिये जान तू पार्था । सत्व-शुद्धि जो है चाहता ।
उसको कर्म मानो तीर्थ- । समान जान ॥ ५९ ॥
तीर्थसे होता बाह्य मल-क्षालन । कर्मसे अभ्यंतर उजला जान ।
ऐसे निर्मल तीर्थ जान अर्जुन । सत्कर्मको ही ॥ १६० ॥
तृषार्तको जैसे मरु-भूमिके । अमृत-वर्षा साथ तपनेके ।
या नयनमें आ बैठे अंधेके । स्वयं भास्कर ॥ ६१ ॥
डूबनेवालेकी रक्षामें नदी आयी । गिरनेवालेके लिये धरणी आयी ।
मरनेवालेको मृत्युने ही बढ़ायी । आयू उसकी ॥ ६२ ॥
वैसे है कर्म-बद्धता । मुमुक्षुको छुड़ाती पांडुसुता ।
विष जैसे रसायन बनता । उपाय बलसे ॥ ६३ ॥
वैसे कर्म-कुशलता । देती बद्धको मुक्तता ।
बद्धको छुड़ानेमें पार्थ । आती काम ॥ ६४ ॥
ज्ञानेश्वरी ७२४
तुझे अब वह कुशलता । कहता सुंदरतासे पार्था ।
कर्मसे कर्मही है मिटता । जिससे यहां ॥ ६५ ॥
एतान्यापि तु कर्माणि संगंत्यक्त्वा फलानि च ।
कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम् ॥ ६ ॥
कर्म-नाशकी कर्म-कुशलता—
महा यागादि सब प्रमुख । कर्म-संपन्न होते हैं नेक ।
कर्तापनकी अहंता देख । रहती नहीं ॥ ६६ ॥
जैसे जो मूल्यसे यात्रा करता । उसको यात्राका गर्व न होता ।
उसको हृदयमें नहीं होता । यात्राका आनंद ॥ ६७ ॥
अथवा जो राजाकी आज्ञासे । लड़ता रहता है राजासे ।
अभिमान नहीं होता उसे । जीतता मैं राजाको ॥ ६८ ॥
अन्योंकी सहायतासे जो तरता । उसको तरनेका गर्व न होता ।
अथवा पुरोहित न धरता । दातृत्वका गर्व ॥ ६९ ॥
वैसे कर्तृत्वका अहंकार । नहीं लेते यथा अवसर ।
कर्म-मात्र सभी धनुर्धर । करना पूर्ण ॥ १७० ॥
तथा कर्म किया अर्जुना । इससे है फलका आना ।
ऐसी अपेक्षा न धरना । मनमें कभी ॥ ७१ ॥
फलकी आशा छोड़कर । कर्म करना धनुर्धर ।
पराया बच्चा निरंतर । देखती धात्री जैसे ॥ ७२ ॥
बिना किये ही फलकी आशा । तुलसीमें पानी देते जैसा ।
वैसे ही हो फलमें निराशा । करना कर्म ॥ ७३ ॥
न करके दूधकी आशा ग्वाल । करता गांवके पशु संभाल ।
उसी भांति मान कर्मका फल । करना कर्म ॥ ७४ ॥
किंतु पुण्य-कर्म भी ये ममत्व-फल छोड़के ।
करना योग्य है मेरा जान उत्तम निर्णय ॥ ६ ॥
७२५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद योग
इस भांति कर्म-कुशलता । साधकर जो कर्म करता ।
अपने आप दर्शन पाता । सहजमें जो ॥ ७५ ॥
तभी फल आशा छोड कर । तथा तज देह अहंकार ।
कर्म करना है धनुर्धर । यह मेरा संदेश ॥ ७६ ॥
जीव जो बंधसे थका हुवा । भक्तिकी चाह करता हुआ ।
उसे मैं कहता हूं पांडव । नहीं अन्य मार्ग ॥ ७७ ॥
नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते ।
मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः ॥ ७ ॥
तामसिक कर्म-त्याग—
अंधारमें नहीं दीखता । इसलिये आंखें फोडता ।
वैसे कर्म-द्वेषसे करता । कर्मका त्याग ॥ ७८ ॥
उसका है जो कर्मका तजना । कहता हूं मैं तामस अर्जुना ।
आधासीसीके क्रोधसे फोड़ना । कपाल जैसे ॥ ७९ ॥
पथ है यह अति कठिन । तो भी पार करेंगे चरण ।
उन्हीका करना क्या खंडण । मार्गापराधसे ॥ १८० ॥
भूखेके सम्मुख आया आहार । उसको अति उष्ण मानकर ।
करके अनशनका विचार । उसे तजना सा ॥ ८१ ॥
वैसे कर्मका बाधक कर्म । निस्तार करना यह मर्म ।
न जानता तामस सभ्रम । मत्त होकर ॥ ८२ ॥
स्वाभाविक जो भागमें आता । उस कर्मको जो तज देता ।
ऐसे तामस त्यागसे पार्थ । रहना दूर ॥ ८३ ॥
राजस कर्म-त्याग—
अथवा स्वाधिकार जो जानता । अपना विहित कर्म सूझता ।
किंतु काया-क्लेश मान तजता । आलस्यसे जो ॥ ८४ ॥
न होता साध्य संन्यास कभी नियत कर्मका ।
करनेसे स-सम्मोह कहाता त्याग तामस ॥ ७ ॥
ज्ञानेश्वरी ७२६
दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत् ।
स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्याग फलं लभेत् ॥ ८ ॥
कार्यारंभका जो उगम । कष्टकर होता प्रथम ।
लगता ढोना भारी काम । पाथेय जैसे ॥ ८५ ॥
कडुआ लगता है नीम । कशैला हर्रा प्रथम ।
प्रारंभमें वैसे काम । लगता सदैव ॥ ८६ ॥
गायका दोष है सींग । सेवंतीका कंटकांग ।
भोजन सुख महंगा । पकानेमें ॥ ८७ ॥
होता वैसे प्रारंभमें कर्म । आरंभमें होता है विषम ।
इसीलिये करनेमें श्रम । मानता है वह ॥ ८८ ॥
आरंभता है कर्म समस्त । वैसे यह जो शास्त्र - सम्मत ।
किंतु आंच आते ही व्यथित । हो तजता सब ॥ ८९ ॥
कहता संपत्ति शरीर जैसी । मिली है अतीव भाग्यसे ऐसी ।
कर्मादिकमें यह व्यर्थ वैसी । खपाना है पाप ॥ १९० ॥
किया हुवा कर्म कभी देगा फल । किंतु मिला है यह सुंदर फल ।
इसको अभी भोगनेमें कुशल । नहीं है क्या ? ॥ ९१ ॥
इस भांति शरीर - क्लेशसे । भीत हो तजता कर्म जैसे ।
कहलाता है सुन तू इसे । राजस त्याग ॥ ९२ ॥
इसमें भी होता है कर्म-त्याग । किंतु न मिलता त्यागका योग ।
अपनेसे गिर होता है त्याग । उसी भांति ॥ ९३ ॥
अथवा प्राण गये डूबकर । "अधोदकमें समाधि पाकर” ।
ऐसे नहीं कहते धनुर्धर । वह दुर्मरणही ॥ ९४ ॥
ऐसे शरीरका लोभ । तजाता है कर्म जब ।
नहीं मिलता है लाभ । कर्म-त्यागका ॥ ९५ ॥
कष्ट कारण जो कर्म तजता तन चोरके ।
त्याग राजस जो व्यर्थ न देखें अपना फल ॥ ८ ॥
७२७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद मोग
वास्तवमें जब अपना । ज्ञानोदय होता अर्जुन ।
जैसे उदय-काल जान । निगलता है तारे ॥ ९६ ॥
वैसे सकारण क्रिया-जात । खो जाते हैं सहजही पार्थ ।
कर्मत्याग तब लाता नित । मोक्षका फल ॥ ९७ ॥
मोक्षका फल यह अज्ञान- । त्यागको न मिलता अर्जुन ।
इसीलिये तू त्याग न मान । जो है राजस ॥ ९८ ॥
किंतु देता है कैसा त्याग । घरमें मोक्ष-फल-भाग ।
सुन अब यह प्रसंग । कहता हूं मैं ॥ ९९ ॥
कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन ।
संगं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः ॥ ९ ॥
सात्विक-त्याग—
तब स्वाधिकारानुसार । आता जो सहज होकर ।
विधि-गौरवसे आचर । भूषण मान ॥ २०० ॥
किंतु यह मैं करता हूं ऐसे । स्मरण भी तज कर मनसे ।
फलाशा तज संपूर्ण-रूपसे । करना है जो ॥ १ ॥
किंतु अवज्ञा और कामना । माताके विषयमें अर्जुन ।
करनेसे होता है पतन । हेतु जो जैसे ॥ २ ॥
सो इन दोनोंको तजना । माता मान कर भजना ।
मुख अशुद्ध सो अर्जुन । तजना क्या गाय ॥ ३ ॥
अपने प्रिय फलमें धनुर्धर । छिलका और बीज जो असार ।
इसलिये तजते क्या फल सारा । कभी कोई ॥ ४ ॥
वैसे ही है कर्तृत्वका मद । तथा कर्म-फलका आस्वाद ।
इन दोनोंका नाम है बंध । कर्मका जो ॥ ५ ॥
कर्तव्य मानके कर्म करना जो नियोजित ।
ममत्व फलको छोड़ त्याग तू मान सात्विक ॥ ९ ॥
ज्ञानेश्वरी ७२८
इन दोनोंके विषयोंका जब । पिता-पुत्रका संबंध-सा सब ।
कर्तव्य मान निभाते हैं तब । बद्ध न होता कर्म ॥ ६ ॥
अजी ! यह है त्याग तरुवर । मोक्ष फल देता है धनुर्धर ।
सात्विक ऐसे हैं जो मशहूर । विश्वमें सब ॥ ७ ॥
जलकर बीज जैसे । होता है निर्वंश वैसे ।
फल तज कर्म वैसे । तजा मान ॥ ८ ॥
पारसका स्पर्श जब होता । लोहका जंग मल मिटता ।
चित्तका रज-तम मिटता । सत्वसे ऐसे ॥ ९ ॥
फिर वह शुद्ध सत्व-गुण । खोलता आत्म-बोध नयन ।
मृग-जल त्रास जो अर्जुन । मिटता सांझमें जैसे ॥ २१० ॥
बुद्धि आदिके सम्मुख जैसे । रहता है विश्वाभास वैसे ।
न देख सकेंगे कोई जैसे । कभी गगन ॥ ११ ॥
न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते ।
त्यागी सत्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः ॥ १० ॥
समदृष्टिसे कर्म करना—
आदि यदि प्रारब्ध बलसे । शुभ अशुभ कर्म जो वैसे ।
लय होते आकाशमें जैसे । बादल सारे ॥ १२ ॥
सदा जैसे उसकी दृष्टिसे । कर्म होते ब्रह्म-रूप वैसे ।
इसी लिये है सुख-दुःखसे । होता अछूता ॥ १३ ॥
जिसे शुभ-कर्म जानता । उसको हर्षसे करता ।
जिसको अशुभ मानता । उससे नहीं द्वेष ॥ १४ ॥
इस विषयमें उसको कहीं । संदेहका कभी काम भी नहीं ।
जैसे स्वप्नका सुख दुःख नहीं । जगने पर ॥ १५ ॥
शुभ अशुभ कर्मोंसे न रखे राग-द्वेष जो ।
सत्वमें जो पगा त्यागी ज्ञानसे छेद संशय ॥ १० ॥
७२९ सार्थ गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद योग
इस लिये कर्म और कर्ता । इस द्वैत-भावकी जो वार्ता ।
न जानता वह पांडुसुता । सात्विक त्याग ॥ १६ ॥
इस भांति वह कर्म-पार्था । तजे तो छूट जाते सर्वथा ।
अधिक बांधते है अन्यथा । तजे तो कर्म ॥ १७ ॥
न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः ।
यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते ॥ ११ ॥
देह-धारीको कर्म अनिवार्य है—
वैसे ही जो पांडुकुमार । देहकी मूर्ति बनकर ।
रहता कर्मसे ऊबकर । वह है अनाडी ॥ १८ ॥
उकताकर मृत्तिकासे । रहेगा कहो घडा कैसे ।
तथा कपडा तंतुओंसे । कैसे रहे दूर ॥ १९ ॥
जैसे अग्नि अपनी उष्णता । त्यजेगा कैसे कह तू पार्थ ।
अथवा कैसे करेगी जोत । प्रकाशसे द्वेष ॥ २२० ॥
द्वेष कर अपनी उग्रतासे । सुगंध लायेगा हींग कहांसे ।
अथवा द्रवत्व छोड़के कैसे । रहेगा पानी ॥ २१ ॥
वैसे लेकर शरीरका आकार । करता रहता है सभी व्यवहार ।
तब कैसे है उन्माद धनुर्धर । कर्म-त्यागका ॥ २२ ॥
अपना लगाया हुवा तिलक । पुनः पुनः पोंछते स-कौतुक ।
किंतु निकालकर क्या मस्तक । लगा सकते हैं ॥ २३ ॥
वैसे विहित जो स्वयं स्वीकृत । सहज तज सकते हैं पार्थ ।
किंतु जो देह बन आया साथ । वह कर्म तजे कैसे ॥ २४ ॥
चलता जो श्वासोच्छ्वास । नींदमें भी रात-दिवस ।
न करना सा अहर्निश । चलता कर्म ॥ २५ ॥
अशक्य देहधारीको सर्वथा कर्म छोडना ।
इसीलिये फल-त्यागी त्यागी वह कहा गया ॥ ११ ॥
ज्ञानेश्वरी ७३०
An exact transcription of the page in Devanagari script:
इस शरीरके निमित्त । लगा जो कर्म सतत ।
तन हो जीवित या मृत । न छूटेगा कभी ॥ २६ ॥
इस कर्म-त्यागका प्रकार । एक ही है यहां धनुर्धर ।
न बनो फलाशाका आहार । कर्ममें कभी ॥ २७ ॥
कर्म-फल करो ईश्वरार्पण । तत्प्रसादसे बोध उद्दीपन ।
तब हो रज्जु-ज्ञान विलोपन । व्याल-शंका ॥ २८ ॥
इस भांति आत्म-बोधसे पार्थ । अविद्या सह कर्म-नाश होता ।
तथा ऐसा त्याग जो कहलाता । कर्म-त्याग ॥ २९ ॥
तभी जो इस प्रकार त्याग करता । उसको मैं सही कर्म-त्यागी मानता ।
रोगमें मूर्छाको विश्रांति कहा जाता । वैसे हैं अन्य त्याग ॥ २३० ॥
ऐसे एक कर्ममें जो थकता । दूसरेमें जा विश्रांति खोजता ।
तथा झांपड पर जो है खाता । सोटोंकी मार ॥ ३१ ॥
रहने दे यह वाग्विस्तार । त्रिलोकमें त्यागी है धनुर्धर ।
फल-त्यागसे है निष्कृती पर । ले जाता कर्म ॥ ३२ ॥
अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् ।
भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित् ॥ १२ ॥
वैसे तो सुन यह धनंजय । त्रिविध कर्म-फल कहा गया ।
समर्थ वही है जान निश्चय । न छोडते फलाशा ॥ ३३ ॥
तीन प्रकारके कर्म-फल-
जन्म देकरके आप दुहिता । "इदं न मम" कह माता पिता ।
छूट जाते दान लेके फंसता । दामाद आप ॥ ३४ ॥
बोकर जैसे विषका खेत । सुखसे लाभ लेते हैं पार्थ ।
किंतु खर्च कर होते मृत । उसको खाकर ॥ ३५ ॥
तेहरा फल कर्मोंका मधुर कटु मिश्रित ।
उससे मुक्त संन्यासी पाते हैं त्याग-हीन जो ॥ १२ ॥
७३१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद योग
वैसे अकर्ता मान कर्म करता । कर्ता मान जो फलाशा न धरता
उन दोनोंको बांध न सकता । केवल कर्म ॥ ३६ ॥
पकता पेड जो राह पर । उसके फलकी आशा कर ।
सदा कर्मका भी धनुर्धर । फल बांधता है ॥ ३७ ॥
किंतु करके फलाशा तजता । जगतके कार्यमें न घुसता ।
त्रिविध विश्व यह जो पूर्णता । कर्म फल है ॥ ३८ ॥
देव मानव और स्थावर । इसका नाम जगदंबर ।
ऐसे ही हैं ये तीन प्रकार । कर्म फलके ॥ ३९ ॥
एक है वही अनिष्ट । एक है जो केवल इष्ट ।
तथा एक है जो इष्टानिष्ट । त्रिविध ऐसे ॥ २४० ॥
किंतु बुद्धि बन विषयासक्त । स्वैराचारमें होकर अभ्यस्त ।
निषिद्ध कर्ममें होते प्रवृत्त । दुर्व्यवहारमें ॥ ४१ ॥
वहां है कृमिकीट लोष्ट । देह पाते हैं जो निकृष्ट ।
उसका नाम है अनिष्ट । कर्मका फल ॥ ४२ ॥
या स्वधर्मको मान देकर । अपने अधिकारानुसार ।
सुकृत करते धनुर्धर । वेदाज्ञासे ॥ ४३ ॥
देवोंके वे इंद्रादिक । देह पाते हैं अति नेक ।
कर्म-फल इष्टमें देख । उसकी प्रसिद्धी ॥ ४४ ॥
किंतु खटा मीठा मिलकर । होता है विशिष्ट रसांतर ।
स्वादमें दोनोंसे रुचिकर । होता भिन्न ही ॥ ४५ ॥
रेचक ही होके योग-वश । करता है स्तंभनका दोष ।
वैसे सत्यासत्य समस्त । जीतता असत्य ॥ ४६ ॥
सम-भागसे है शुभाशुभ । होके खड़ा अनुष्ठान भाग ।
उससे जो मनुष्यत्व-लाभ । मिश्र फल है ॥ ४७ ॥
ज्ञानेश्वरी ७३२
इस कर्म-फलसे बद्ध और मुक्तता—
ऐसे इसके त्रिविध भागमें । कर्म-फल रचा जगतमें ।
फंसे हैं जो भोगकी आशामें । उससे वे हैं बद्ध ॥ ४८ ॥
जिव्हा-चापल्य जैसे बढ़ता । वैसे भोजन मीठा लगता ।
अंतमें जो फल निकलता । रोगसे मृत्यु ॥ ४९ ॥
चोर-मैत्री तब तक भली । जब न आती एकांत-स्थली ।
वैसे होती है वेश्या भी भली । न होता स्पर्श ॥ २५० ॥
जब तक करता कर्म शरीर । मिलता जाता सन्मान धनुर्धर ।
मृत्यु समयमें घिरते आकर । कर्मके फल ॥ ५१ ॥
समर्थ होता जो महाजन । द्वारपे बैठ ले जाता धन ।
वैसे ही कर्म-फल अर्जुन । भोगने पड़ते ॥ ५२ ॥
भुट्टेसे जैसे धान झड़ता । उसी धानसे भुट्टा लगता ।
फिर भुट्टेसे धान गिरता । उससे फिर भुट्टा ॥ ५३ ॥
वैसे जो भोगसे कर्म होता । उस कर्ममें भोग लगता ।
पैर पैरको जीतता जाता । चलनेमें जैसे ॥ ५४ ॥
नांव रुकती उतार देखकर । होता वह उसका उरला तीर ।
वैसे है कर्म-फलसे धनुर्धर । नहीं है मुक्ति ॥ ५५ ॥
साध्य-साधन प्रकार फिर । करता फल-भोग प्रसार ।
ऐसे ही उलझाता संसार । अत्यागीको ॥ ५६ ॥
चमेली पुष्पका जैसे खिलना । उसका नाम ही है सूख जाना ।
वैसे फलाशासे नहीं करना । किया है ऐसे ॥ ५७ ॥
बीजका धान्य ही जब खाया जाता । किसानीका काम ही है रुकता ।
वैसे फल-त्यागसे है मिटता । कर्मका फल ॥ ५८ ॥
तब सत्व-शुद्धिके सहायसे । गुरु-कृपामृतके तुषारोंसे ।
उतरता खिले हुए बोधसे । द्वैतदैन्य ॥ ५९ ॥
तब है जगदाभासके कारण । मिटता है त्रिविध फल स्फुरण ।
वैसे ही भोक्ता-भोग्य सहज मान । होता है अस्त ॥ २६० ॥
७३३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
संन्याससे मूल अविद्या रहती ही नहीं—
सधता ज्ञान-प्रधान ऐसा । जिसका संन्यास है वीरेशा ।
फल-भोगके कष्टसे जैसा । होता है मुक्त ॥ ६१ ॥
तथा संन्यासमें है एक बात । आत्म-रूपमें दृष्टि होती रत ।
वहां कर्म दूसरा ऐसे पार्थ । दीखेगा कैसे ॥ ६२ ॥
ढह जाती है सब सारी दीवार । मिटते चित्र माटीमें मिलकर
वैसे ही नहीं रहता है अंधार । उदय होते ही ॥ ६३ ॥
न रही रूपकी काया जब । कहांसे दीखेगी छाया तब ।
कहांसे दिखेगा प्रतिबिंब । दर्पण ही नहीं ॥ ६४ ॥
जहां नहीं निद्राको ही स्थान । आयेगा वहां कहांसे स्वप्न ।
फिर कैसे कहे कहो कौन । स्वप्न मिथ्या या सत्य ॥ ६५ ॥
उसी भांति संन्यासमें यहां । मूल अविद्या न रही जहां ।
उसका व्यापार रहा कहां । तथा करे कौन ॥ ६६ ॥
तभी इस संन्यासमें एक । कर्मकी बात कैसी है देख ।
किंतु अविद्या देहमें एक । रहती है जो ॥ ६७ ॥
कर्तृत्वके बल पर पार्थ । आत्मा होती शुभाशुभमें प्रवृत्त ।
तथा दृष्टि-भेदके स्थानपे स्थित । रहती है वह ॥ ६८ ॥
होता जैसे पूर्व पश्चिम । वैसे है आत्मा और कर्म ।
ऐसी भिन्नता है सुवर्म । जान तू यह ॥ ६९ ॥
अथवा नभ और बादल । तथा सूर्य और मृगजल ।
पृथ्वी और वायुमें निर्मल । होती है भिन्नता ॥ २७० ॥
ओढकर नदीका नीर । बैठता नदीमें पत्थर ।
उन दोनोंमें धनुर्धर । जानता तू भेद ॥ ७१ ॥
जलकुंभी होती जलके पास । किंतु जलसे भिन्न होती खास ।
कालिख रहती दीपके पास । किंतु होती क्या दीप ॥ ७२ ॥
ज्ञानेश्वरी ७३४
यदि चंद्रमें होता कलंक । किंतु चंद्रसे न होता एक ।
अलग दृष्टि और आंख । अतिशय वैसे ॥ ७३ ॥
जैसे है पथ और पथिक । नदीतल और है उदक ।
दर्पण और जैसे दर्शक । भिन्न है जितने ॥ ७४ ॥
उतना ही भिन्न है मान । आत्मा और कर्म अर्जुन ।
किंतु है अज्ञान कारण । दीखता एक ॥ ७५ ॥
सूर्यसे विकास उपजता । भ्रमरसे सुगंध भोगाता ।
किंतु जलमें स्वस्थ रहता । कमल जैसे ॥ ७६ ॥
बार बार कहता हूं सुन । आत्मामें कर्म-भासका कारण ।
भिन्न ही है पांच जो अर्जुन । कारण रूप ॥ ७७ ॥
पंचैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे ।
सांख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम् ॥ १३ ॥
कर्मके जो पंचकारण । जानता होगा तू अर्जुन ।
करते हैं सांख्यकथन । मुक्त कंठसे ॥ ७८ ॥
वेद-राजाकी राजधानीमें । सांख्यवेदांतके भुवनमें ।
घोष करते उच्च स्वरमें । गूंजा करके ॥ ७९ ॥
जगतमें है कर्म-सिद्धार्थ । पांच कारण जान ये पार्थ ।
उसमें फंसना अनुचित । आत्मराजको ॥ २८० ॥
कृष्णार्जुन गुरुशिष्य प्रेमका वर्णन—
ऐसा यह शास्त्र-कथन । प्रसिद्ध है जान अर्जुन ।
मुझसे तू इसको सुन । चित्त देकर ॥ ८१ ॥
अन्योंके मुखसे सुनना । ऐसा कष्ट क्या है अर्जुन ।
चिद्रत्न मैं तेरे आधीन । रहते हुए ॥ ८२ ॥
जान तू मुझसे पार्थ प्राज्ञोंका कर्म-निर्णय ।
सीधे ही करते कर्म उसके पांच कारण ॥ १३ ॥
७३५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
अजी ! सम्मुख है दर्पण । करते अपना रूप दर्शन ।
देखना क्यों दूसरोंके नयन । कह तू पार्थ ॥ ८३ ॥
भक्त जैसे जहां जब देखता । उसको वैसे वहां जो दीखता ।
ऐसा मैं जब सम्मुख रहता । तेरा खिलौना बन ॥ ८४ ॥
ऐसे भावनावेगसे जब । बोलते थे देख वहां तब ।
देहभान भूलकर सब । डुलता है अर्जुन ॥ ८५ ॥
चंद्र-किरणका जब भरमार । पडता चंद्रमणि-पहाडपर ।
पिघलके होता जैसे सरोवर । उसी भांति ॥ ८६ ॥
तब सुख तथा सुखानुभूति । इन भावोंकी तोडकर भित्ति ।
बन गया वह अर्जुनाकृति । सुख केवल ॥ ८७ ॥
श्रीकृष्ण होनेसे अति समर्थ । यथावत हुवा सहज स्थित ।
तब होने सहजस्थित पार्थ । करता प्रयास ॥ ८८ ॥
व्यक्तित्व जहां अर्जुनसा । गया प्रज्ञा सह डूबसा ।
आया ऐसा महा पूरसा । आनंदका तब ॥ ८९ ॥
कहता है देव अजी हे पार्थ । पूर्ण रूपसे हो सहज-स्वस्थ ।
सांस भर डुलता है पार्थ । अपना मस्तक ॥ २९० ॥
कहता तब जानता तू उदार । तेरे साथमें भिन्न शरीरधर ।
ऊब चुका तब एकत्वमें भर- । जाना चाहता था ॥ ९१ ॥
मेरे प्रेमसे तू ऐसा । पूर्ण करता लालसा ।
रोकती क्या जीव दशा । इस प्रकार ॥ ९२ ॥
श्रीकृष्ण हंस तब भला कहता । अबतक तू यह नहीं जानता ।
पगले ! चंद्र चंद्रिकामें भिन्नता । रहती क्या कभी ॥ ९३ ॥
तथा कहनेमें यह भाव । डर जाते हैं हम पांडव ।
मन भायेका क्रोध-भाव । बढाता है प्रेम ॥ ९४ ॥
यहां है जो परस्पर भिन्नता । तभी ऐसे जीवनकी शक्यता ।
रहने दे ऐसे ये बोल पार्था । इस विषयके ॥ ९५ ॥
ज्ञानेश्वरी ७३६
अब कैसा प्रसंग चला था । क्या बोल रहे थे हम पार्था ।
सब कर्मोंकी जहां भिन्नता । आत्मामें है ॥ ९६ ॥
तब कहता हरिसे अर्जुन । कहता तू सहज मेरा मन ।
प्रारंभ किया उचित श्रीकृष्ण । मेरी समस्याका ॥ ९७ ॥
कर्म-सिद्धिके पांच कारण—
जो है सभी कर्मका बीज । कारण पंचक जो तुझ ।
'करूंगा मैं तुझसे आज' । कहा था मैने ॥ ९८ ॥
तथाँ है जो कर्म कारणसे । संबंध नहीं है आत्मासे ।
कहा था अब तूने ऐसे । वह भी कहना ॥ ९९ ॥
तब विश्वेश्वर कहता । संतोष-चित्तसे हे पार्थ ।
हमसे जिद्द कर बैठता । ऐसा मिलता कौन ॥ ३०० ॥
करूंगा सरल निरूपण । कहता तब यह श्रीकृष्ण ।
किंतु चुकाना पडेगा ऋण । तुझे इस बातका ॥ १ ॥
तब अर्जुन कहता देव । भूल गया क्या पिछले भाव ।
इस बातमें रखता ठाव । मैं तू पनका ॥ २ ॥
कहता है तब श्रीकृष्ण । कहूंगा अब जो वचन ।
मनोयोग पूर्वक सुन । पांडुकुमार ॥ ३ ॥
यह सच है धनुर्धर । कर्म जिस पर है स्थिर ।
वे सब आत्मासे बाहर । कारण हैं पांच ॥ ४ ॥
इन पांचोंके ही कारण । कार्यारंभ होते हैं जान ।
इससे कर्ममें है जान । हेतु भी पांच ॥ ५ ॥
यहां है आत्म-तत्व उदासीन । वह ना हेतु या न उपादान ।
न बनता है आप संवहन । कार्य-सिद्धिका ॥ ६ ॥
शुभाशुभ अंशमें वहां जैसे । उत्पन्न हो जाते हैं कर्म ऐसे ।
रात और दिवस आकाशसे । बनते रहते ॥ ७ ॥
(36) ७३७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
तोय तेज तथा धूम । यहां वायुसे संगम ।
होनेसे है अभ्रागम । न जानता गमन ॥ ८ ॥
अनेक काष्ठोंसे नांव बनती । केवटसे वह चलाई जाती ।
वैसे ही वायुसे वह चलती । उदक है साक्षी ॥ ९ ॥
जैसे एक मृत्तिकाका पिंड । व्यय हो कर बनता भांड ।
जब घुमाता है एक दंड । भ्रमण चक्र ॥ ३१० ॥
यह कर्तृत्व कुलालका । वहां क्या रहा है पृथ्वीका ।
बिन आधारके किसीका । कह तू संबंध ॥ ११ ॥
सूर्य-उदयके साथ सदैव । सभी व्यापार चलते पांडव ।
इसमें सविताका क्या कर्तृत्व । रहता है कह तू ॥ १२ ॥
ऐसे पांच हेतुका मिलन । होते हैं यहां पांच कारण ।
उगती कर्म-लता अर्जुन । आत्मा स्वतंत्र ॥ १३ ॥
अब मैं वह सब भिन्न भिन्न । करता हूं पांचोंका विवेचन ।
तुला कर देख लेते हैं जान । मोतियां जैसे ॥ १४ ॥
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् ।
विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पंचमम् ॥ १४ ॥
१ कर्म-सिद्धिका कारण, देह—
ऐसे हैं ये सब लक्षण । सुन तू जो कर्म कारण ।
देह है पहला कारण । कहता हूं मैं ॥ १५ ॥
देहको कहते हैं अधिष्ठान । कहता सुन इसका कारण ।
स्व-भोग सह जीवका है स्थान । यह शरीर ॥ १६ ॥
बना कर इंद्रियोंके दस हाथ । उससे श्रमकर दिवस रात ।
प्रकृतिसे भोग पाता है पार्थ । इस स्थानपे ॥ १७ ॥
अधिष्ठान अहंकार तथा विविध साधन ।
भिन्न भिन्न क्रिया पार्थ करते दैव पांचवा ॥ १४ ॥
ज्ञानेश्वरी ७३८
उसके भोगके कारण । शरीर बिन अन्य स्थान ।
नहीं होनेसे अधिष्ठान । कहते शरीरको ॥ १८ ॥
यह चौबीस ही तत्वोंका । कुटुंब गृह है बस्तीका ।
छूटना है बंध मोक्षका । उलझन यहीं ॥ १९ ॥
अथवा जो हैं अवस्थात्रय । अधिष्ठान जान धनंजय ।
इसीलिये जान यह काय । कहलाता अधिष्ठान ॥ ३२० ॥
२ कर्म-सिद्धिका कारण, कर्ता=अहंकार—
तथा कर्ता यह दूसरा । कर्म कारण धनुर्धर ।
प्रतिबिंबसा है अपार । चैतन्यका जो ॥ २१ ॥
आकाशसे बरसता है नीर । उससे जो बनता सरोवर ।
तथा बिंबित होता तदाकार । आकाश जैसे ॥ २२ ॥
अथवा राजा निद्रासे भरकर । स्वयं आप विस्मृतिमें डूबकर ।
स्वप्नमें अनुभवता धनुर्धर । दरिद्री जैसे ॥ २३ ॥
वैसे अपनेको भूलकर । चैतन्य देहाकार लेकर ।
अनुभवता है देहाकार । आत्मस्वरूप ॥ २४ ॥
ऐसे ही विचारोंके कारण । प्रसिद्ध है जीव ऐसा जान ।
बंधकर वह सह तन । संपूर्ण रूपसे ॥ २५ ॥
प्रकृति करती है जो कर्म । कहता है मैंने किया सभ्रम ।
वहां यह कर्ता ऐसा नाम । लेता है जीव ॥ २६ ॥
३ कर्म-सिद्धिका कारण, विविध साधन—
होती है जो एकही वैसी । दीखती है चोरी हुईसी ।
पलकोंमेंसे दृष्टि जैसी । चवरोंके बाल ॥ २७ ॥
यह घरमें रहता एक । दीपका वह अवलोक ।
गवाक्षोंके-भेदसे अनेक । दीखता जैसे ॥ २८ ॥
वैसे बुद्धिका जानना । श्रोत्रादि भेदसे नाना ।
बाहर इंद्रियपन । होता है व्यक्त ॥ २९ ॥
७३९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग