ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत् ।
स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्याग फलं लभेत् ॥ ८ ॥
कार्यारंभका जो उगम । कष्टकर होता प्रथम ।
लगता ढोना भारी काम । पाथेय जैसे ॥ ८५ ॥
कडुआ लगता है नीम । कशैला हर्रा प्रथम ।
प्रारंभमें वैसे काम । लगता सदैव ॥ ८६ ॥
गायका दोष है सींग । सेवंतीका कंटकांग ।
भोजन सुख महंगा । पकानेमें ॥ ८७ ॥
होता वैसे प्रारंभमें कर्म । आरंभमें होता है विषम ।
इसीलिये करनेमें श्रम । मानता है वह ॥ ८८ ॥
आरंभता है कर्म समस्त । वैसे यह जो शास्त्र - सम्मत ।
किंतु आंच आते ही व्यथित । हो तजता सब ॥ ८९ ॥
कहता संपत्ति शरीर जैसी । मिली है अतीव भाग्यसे ऐसी ।
कर्मादिकमें यह व्यर्थ वैसी । खपाना है पाप ॥ १९० ॥
किया हुवा कर्म कभी देगा फल । किंतु मिला है यह सुंदर फल ।
इसको अभी भोगनेमें कुशल । नहीं है क्या ? ॥ ९१ ॥
इस भांति शरीर - क्लेशसे । भीत हो तजता कर्म जैसे ।
कहलाता है सुन तू इसे । राजस त्याग ॥ ९२ ॥
इसमें भी होता है कर्म-त्याग । किंतु न मिलता त्यागका योग ।
अपनेसे गिर होता है त्याग । उसी भांति ॥ ९३ ॥
अथवा प्राण गये डूबकर । "अधोदकमें समाधि पाकर” ।
ऐसे नहीं कहते धनुर्धर । वह दुर्मरणही ॥ ९४ ॥
ऐसे शरीरका लोभ । तजाता है कर्म जब ।
नहीं मिलता है लाभ । कर्म-त्यागका ॥ ९५ ॥
कष्ट कारण जो कर्म तजता तन चोरके ।
त्याग राजस जो व्यर्थ न देखें अपना फल ॥ ८ ॥
७२७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद मोग