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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 806

संन्याससे मूल अविद्या रहती ही नहीं—
सधता ज्ञान-प्रधान ऐसा । जिसका संन्यास है वीरेशा ।
फल-भोगके कष्टसे जैसा । होता है मुक्त ॥ ६१ ॥
तथा संन्यासमें है एक बात । आत्म-रूपमें दृष्टि होती रत ।
वहां कर्म दूसरा ऐसे पार्थ । दीखेगा कैसे ॥ ६२ ॥
ढह जाती है सब सारी दीवार । मिटते चित्र माटीमें मिलकर
वैसे ही नहीं रहता है अंधार । उदय होते ही ॥ ६३ ॥
न रही रूपकी काया जब । कहांसे दीखेगी छाया तब ।
कहांसे दिखेगा प्रतिबिंब । दर्पण ही नहीं ॥ ६४ ॥
जहां नहीं निद्राको ही स्थान । आयेगा वहां कहांसे स्वप्न ।
फिर कैसे कहे कहो कौन । स्वप्न मिथ्या या सत्य ॥ ६५ ॥
उसी भांति संन्यासमें यहां । मूल अविद्या न रही जहां ।
उसका व्यापार रहा कहां । तथा करे कौन ॥ ६६ ॥
तभी इस संन्यासमें एक । कर्मकी बात कैसी है देख ।
किंतु अविद्या देहमें एक । रहती है जो ॥ ६७ ॥
कर्तृत्वके बल पर पार्थ । आत्मा होती शुभाशुभमें प्रवृत्त ।
तथा दृष्टि-भेदके स्थानपे स्थित । रहती है वह ॥ ६८ ॥
होता जैसे पूर्व पश्चिम । वैसे है आत्मा और कर्म ।
ऐसी भिन्नता है सुवर्म । जान तू यह ॥ ६९ ॥
अथवा नभ और बादल । तथा सूर्य और मृगजल ।
पृथ्वी और वायुमें निर्मल । होती है भिन्नता ॥ २७० ॥
ओढकर नदीका नीर । बैठता नदीमें पत्थर ।
उन दोनोंमें धनुर्धर । जानता तू भेद ॥ ७१ ॥
जलकुंभी होती जलके पास । किंतु जलसे भिन्न होती खास ।
कालिख रहती दीपके पास । किंतु होती क्या दीप ॥ ७२ ॥
ज्ञानेश्वरी ७३४