ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
यज्ञादिके आदि लेनेका मंगल-नाम—
ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः ।
ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा ॥ २३ ॥
ऐसे अनादि परब्रह्म । जगदादि विश्रामधाम ।
उसका है एकही नाम । कहा तीन प्रकारसे ॥ २८ ॥
वास्तविक वह नाम जाति रहित । किंतु पडे जो अविज्ञातममें ग्रस्त ।
उनके लिये श्रुतिने किया चिन्हित । जाननेमें उसे ॥ २९ ॥
नव जात शिशुको जैसे । कोई नाम न होता उसे ।
बुलाते तो रखे नामसे । जी कह उठता ॥ ३३० ॥
संसार-दुःखसे जो हैं पीडित । जीव आते उसके पास नित ।
उनको ओ ! देता है संकेत । जो यह नाम ॥ ३१ ॥
मिटे पर-ब्रह्मका चिर-मौन । तथा अद्वयत्वसे हो मिलन ।
ऐसा मंत्र दिया हो सकरुण । श्रुति-माताने ॥ ३२ ॥
वेदका दिया हुवा जो नाम । सुनते ही वह पर-ब्रह्म ।
सम्मुख आता वह परम । होता जो पीछे ॥ ३३ ॥
किंतु निगमाचल शिखर पर । बसे जो उपनिषदार्थ नगर ।
करते वहां ब्रह्म सह विहार । वही जानते यह ॥ ३४ ॥
रहने दे वह प्रजापति । रखता सृष्टि कर्तृत्व-शक्ति ।
उसका आधार है आवृत्ति । इस नामकी ॥ ३५ ॥
हुवा जब सृष्टिका उपक्रम । सुन अर्जुन उसके प्रथम ।
पगलाया हुवा-सा यह ब्रह्म । था अकेला ही ॥ ३६ ॥
मुझ ईश्वरको जो न जानता । तथा सृष्टि भी न कर सकता ।
ऐसेको वह महान बनाता । नाम एक ॥ ३७ ॥
ॐ तत्सत् तीन नामोंसे किया निर्देश ब्रह्मका ।
जिससे ये हुए वेद यज्ञ याज्ञिक आदि में ॥ २३ ॥
ज्ञानेश्वरी ७००
उस नामका हृदयमें चिंतन । उस वर्ण-त्रयका नित स्मरण ।
करनेसे योग्यता विश्व-सृजन । आयी उसमें ॥ ३८ ॥
रचे तब ब्रह्माने जन । तथा वेद जैसे शासन ।
और यज्ञ सम वर्तन । जीवन रूप ॥ ३९ ॥
ऐसे कितने लोक फिर । सृजन किये हैं अपार ।
ब्रह्म-दत्त दे अग्रहार । बने त्रिभुवन ॥ ३४० ॥
ऐसे नाम-मंत्रसे महान । बना जो ब्रह्मदेव अर्जुन ।
उसका रूप अब तू सुन । कहता श्रीकांत ॥ ४१ ॥
ओं तत्सत्का दर्शन—
यहां सब मंत्रोंका राजा । आदि प्रणव वह दूजा ।
है तत्कार और जो है तीजा । वहां सत्कार ॥ ४२ ॥
एवं जो ओं तत्सदाकार । ब्रह्मनाम त्रि-प्रकार ।
पुष्प सुगंध सुंदर । लेते उपनिषद ॥ ४३ ॥
इनसे होकर जब एक । कर्म चलता है सात्विक ।
बन जाता है नित सेवक । मोक्ष घटमें ॥ ४४ ॥
कर्पूरके भी अलंकार । देगा यदि दैव लाकर ।
उन्हे चढाना देह पर । है कठिनाई ॥ ४५ ॥
वैसे आचरण किया सत्कर्म । उच्चारण किया ब्रह्मका नाम ।
किंतु नहीं जानता यदि मर्म । विनियोगका ॥ ४६ ॥
साधुओंका समुदाय । घर आता धनंजय ।
किंतु होगा पुण्यक्षय । अवज्ञासे ॥ ४७ ॥
अथवा करने अलंकार । स्वर्णकी पोटली बंधकर ।
गलेमें बांधली धनुर्धर । उसी भांति ॥ ४८ ॥
लेता मुखसे ब्रह्म-नाम । हाथमें हैं सात्विक कर्म ।
प्रयोगके बिन जो कर्म । होता व्यर्थ ॥ ४९ ॥
अजी ! अन्न और जो भूख । साथ रखा हुवा भी देख ।
खाना न जानता बालक । घडता उपवास ॥ ३५० ॥
७०१ श्रद्धा-निरूपण योग
या स्नेह बात इक ठौर । आने पर पांडुकुमार ।
जलाना न जाने पर । प्रकाश कैसे ? ॥ ५१ ॥
आया कृत्य समय अर्जुन । तथा मंगलका हुवा स्मरण ।
किंतु कार्य है वह अपूर्ण । बिना प्रयोगके ॥ ५२ ॥
तभी वर्ण-त्रयात्मक । पर-ब्रह्म नाम एक ।
विनियोग सुन नेक । इस समय ॥ ५३ ॥
तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः ।
प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम् ॥ २४ ॥
नामके हैं जो तीन अक्षर । कर्मके आदि मध्य नंतर ।
प्रयोग करना सविचार । यही तीन ॥ ५४ ॥
ओंका महत्व—
यही हाथ दीप लेकर । करने ब्रह्म साक्षात्कार ।
आये हैं सब धनुर्धर । ब्रह्म-ज्ञानी ॥ ५५ ॥
ब्रह्मसे होनेमें अद्वैत । यज्ञसे न होते वंचित ।
जानते शास्त्रोंको जो पार्थ । किसी समय ॥ ५६ ॥
सर्व-प्रथम वे ओंकार । ध्यानसे करते गोचर ।
फिर करते हैं उच्चार । वाणीसे भी ॥ ५७ ॥
उसके ध्यानसे प्रकट । प्रणवोच्चार होता स्पष्ट ।
तब करते हैं वे श्रेष्ठ । क्रियाचरण ॥ ५८ ॥
अंधेरेमें जैसे दीप अभंग । अरण्यमें समर्थ साथी संग ।
वैसे जानना प्रणवका योग । कार्यारंभमें ॥ ५९ ॥
धर्म-मार्गसे पाया हुवा धन । वेदोक्त देवोद्देश्यसे अर्जुन ।
यज्ञोंमें ब्राह्मणोंद्वारा अर्पण । करते हैं जो ॥ ३६० ॥
सदा प्रथम ओंकार बोल कर उपासक ।
करते हैं अनुष्ठान यज्ञ दान तपादिक ॥ २४ ॥
ज्ञानेश्वरी ७०२
हवनादि जो अग्निमें । त्यागादिरूप आहुतिमें ।
यज्ञ-विविध विधानोंमें । करते निष्णात ॥ ६१ ॥
ऐसे विविध-रूप याग । निष्पन्न होकर तदंग ।
करते हैं उपाधि त्याग । जो हैं असार ॥ ६२ ॥
या न्यायसे प्राप्त पवित्र । भूमि आदि जो स्वतंत्र ।
देश-कालादि शुद्ध पात्र । देख देते दान ॥ ६३ ॥
अथवा एकांतर कृच्छ्रादिव्रत । चांद्रायण मासोपवास सहित ।
शोषण कर देह-धातुका नित । करते हैं तप ॥ ६४ ॥
एवं यज्ञ दान तप । प्रसिद्ध बंधन-रूप ।
बना लेते परंतप । मोक्ष-साधन ॥ ६५ ॥
स्थल पर जो है महा बोझ । नांव तैराती जलमें तुझ ।
बंधनसे मुक्त जो सहज । करता नाम वैसे ॥ ६६ ॥
ऐसे वे सब धनंजया । यज्ञादिक हैं सभी क्रिया ।
ओंकारके लेके सहाय । चलते हैं ॥ ६७ ॥
तथा होती जब फलाशा स्पर्श । तब सावध साधक सोल्हास ।
उच्चार कर तत्कार विशेष । करते अर्पण ॥ ६८ ॥
तदित्यनभिसंधाय फलं यज्ञतपःक्रियाः ।
दानक्रियाश्च विविधाः क्रियंते मोक्षकांक्षिभिः ॥ २५ ॥
तत्कारसे होनेवाले लाभ—
वस्तु है जो विश्वातीतः । तथा जो विश्व-लक्षित ।
ऐसे तत् शब्दसे व्यक्त । होती है वर वस्तु ॥ ६९ ॥
चित्तमें सर्वांदिकत्व नित । ध्यान करके तद्रूप पार्थ ।
उच्चार करके अभिव्यक्त । करते स्पष्ट ॥ ३७० ॥
तत् के स्मरणसे सारी टूटती फल-वासना ।
नाना यज्ञ तप दान करते मोक्ष साधक ॥ २५ ॥
५०३ श्रद्धा-निरूपण-शोध
यह हो तद्रूप ब्रह्मार्पण । न रहे यहां फल-कारण ।
भोग रूप न रहे स्मरण- । बीजका भी ॥ ७१ ॥
ऐसे तदात्मक जो ब्रह्म । साकार यहां सब कर्म ।
कह कर इदं न मम । झटक देते हैं ॥ ७२ ॥
ओंकारसे ऐसे प्रारंभ कर । तथा तत्कारमें अर्पण कर ।
कर्मको बनाया इस प्रकार । ब्रह्मकर्म ॥ ७३ ॥
हुवा वह कर्म ब्रह्मकार । इससे न होता कार्य भार ।
कर्ता कर्मका रहा विचार । भिन्नत्वका जो ॥ ७४ ॥
रूपसे लवण घुल जाता । किंतु स्वादसे जो रह जाता ।
वैसे द्वैत-भावसे रहता । कर्ता जो भिन्न ॥ ७५ ॥
रहता जब द्वैतका भान । होता भव-भयका कारण ।
ऐसे स्वमुखसे हैं श्रीकृष्ण । बोलते वेद ॥ ७६ ॥
तभी जो परत्वमें ब्रह्म रहता । उसको आत्मत्वमें जानना होता ।
सत् शब्द ऋण दोषार्थ रखता । यहां श्रीकृष्ण ॥ ७७ ॥
तो भी यहां ओंकार तत्कारमें । ब्रह्म-कर्म किया जो शरीरमें ।
वह कर्म प्रशस्तादि शब्दोंमें । किया है बखान ॥ ७८ ॥
उस प्रशस्त कर्ममें है । सत् शब्दका विनियोग है ।
वहीं जो प्रभु कहता है । सुनो अब ॥ ७९ ॥
सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते ।
प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते ॥ २६ ॥
सत् भावसे होनेवाले लाभ—
सत् शब्दका यहां सारांश । असत् नाट्यका हो निरास ।
दीखते हैं रूप निर्दोष । सत्ताका यहां ॥ ३८० ॥
सत्का स्मरण देता है सत्यता और साधुता ।
वैसे ही कर्म-सौंदर्य कहा सत्कारका फल ॥ २६ ॥
ज्ञानेश्वरी ७०४
जिस सत्तांका रूप संतत । रहता है स्थल-कालातीत ।
तथा होता है जो अखंडित । अपने आपमें ॥ ८१ ॥
जितना जो है यह दीखता । असत् यह वह नहीं होता ।
रूप जो यह जानता पाता । उसका आश्रय ॥ ८२ ॥
इससे वह् प्रशस्त कर्म । हुवा है जो सर्वात्मक ब्रह्म ।
कर देखना उससे सम । ऐक्य बोधसे ॥ ८३ ॥
ओंकार तथा जो तत्कार । दिखाता कर्म ब्रह्माकार ।
होना उसे निगलकर । केवल ब्रह्म ॥ ८४ ॥
ऐसा यह अंतरंग । सत् शब्दका विनियोग ।
कहता यह श्रीरंग । मैं नहीं कहता ॥ ८५ ॥
यदि कहता मैं, मैं यह कहता । श्रीरंगमें द्वैतकी आती हीनता ।
इसीलिये यह वचन है कहता । श्रीहरिका ही ॥ ८६ ॥
सत् शब्दका और एक अर्थ—
अब और ही एक प्रकार । सत् शब्दका सुन तू धनुर्धर ।
करता सात्विक कर्म पर । उपकार जो ॥ ८७ ॥
सत्कर्म चलते हैं सुंदर । अपने अधिकारानुसार ।
जब कोई अंग धनुर्धर । होता हीन कस ॥ ८८ ॥
एक अवयवकी दुर्बलता । शरीर व्यापारको ही रोकता ।
या किसी अंगसे है रुक जाता । रथका वेग ॥ ८९ ॥
वैसे ही एक गुणके बिन । संतमें आता असंतपन ।
तब सत्कर्म बनाता है जान । असत्कर्म ॥ ३९० ॥
तब ओंकार तथा तत्कार । करते हैं कर्मको सुंदर ।
वैसे ही उसका जीर्णोद्धार । करता सत् शब्द ॥ ९१ ॥
कर्मके असत्को यह मिटाता । उसमें सद्भाव रूढ करता ।
निज सत्त्वकी प्रौढ़ता बढ़ाता । यह सत् शब्द ॥ ९२ ॥
दिव्यौषधिसे रोगीको जैसे । असहायको सहायतासे ।
कर्म-व्यंगमें सत् शब्द वैसे । करता पूर्ण ॥ ९३ ॥
(84) ७०५ श्रद्धा-निरूपण-योग
अथवा हो कोई प्रमाद । कर्म छोडकर मर्यादा ।
भूलसे राहपे निषिद्ध । राहपे वहां ॥ ९४ ॥
चलते हुए भी मार्ग भूलता । तज्ञोंकी दृष्टिमें वह आता ।
व्यवहारमें क्या नहीं होता । कह तू मुझे ॥ ९५ ॥
इसीलिये ऐसे जो कर्म होते । अविचारसे सीमाको लांघते ।
असाधुता दुर्नाम पहुंचते । उस समय ॥ ९६ ॥
वहां पर यह सत् शब्द । उन दोनोंसे है प्रबुद्ध ।
नियोजित साधुता-सिद्ध । उस कर्मका ॥ ९७ ॥
जैसे लोह पारसकी दृष्टि । नाला और गंगाकी भेटी ।
अथवा मृत पर हो वृष्टि । अमृतकी जैसे ॥ ९८ ॥
असाधु कर्ममें अर्जुन । सत् शब्द प्रयोग तू जान ।
रहता है जो बड़प्पन । इस शब्दका ॥ ९९ ॥
जान कर यह सब मर्म । विचार करेगा यह नाम ।
यही है केवल पर-ब्रह्म । अनुभवेगा तू ॥ ४०० ॥
यह नाम शुद्ध पर-ब्रह्म है—
देख तू यह ओं' तत् सत् ऐसे । वहां पहुंचते बोलनेसे ।
सब प्रकाशता है जहांसे । दृश्य विश्व यह ॥ १ ॥
वह है पूर्ण निर्धर्म । शुद्ध ऐसा पर-ब्रह्म ।
यह अंतरंग नाम । करता व्यक्त ॥ २ ॥
आश्रय आकाशका जैसा । केवल आकाश है वैसा ।
यह नाम सबमें वैसा । है अभेद ॥ ३ ॥
आकाशमें जो उदय होता । सूर्य ही सबको प्रकाशता ।
वैसे है नाम ही प्रकाशता । नामीको यहां ॥ ४ ॥
तभी तीन अक्षरोंका नाम । नाम नहीं है केवल ब्रह्म ।
यह जान कर जो जो कर्म । किया जाता है ॥ ५ ॥
ज्ञानेश्वरी ७०६
यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते ।
कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते ॥ २७ ॥
याग हो अथवा दान । तथा तपादि गहन ।
पूर्ण अथवा अपूर्ण । रहे वह ॥ ६ ॥
पारसकी कसौटी पर जैसे । भले बुरेकी बात न हो वैसे ।
ब्रह्ममें अर्पण करते जिसे । वह है ब्रह्म-रूप ॥ ७ ॥
नहीं रहते पूर्ण या अपूर्ण । किये जाते कर्म जो ब्रह्मार्पण ।
देखी न जाती सिंधुमें अर्जुन । जैसे नदियां ॥ ८ ॥
ऐसे पार्थ तेरे प्रति । ब्रह्म नामकी है शक्ति ।
कही है स-उपपत्ति । बुद्धिमान तू ॥ ९ ॥
तथा एकेक अक्षर । भिन्न भिन्न स्पष्ट कर ।
विनियोग धनुर्धर । कहा तुझसे ॥ ४१० ॥
अब ऐसे सु-महिम । इसीलिये है ब्रह्मनाम ।
जान लिया न यह मर्म । तूने अर्जुन ॥ ११ ॥
तभी इस पर श्रद्धा । बढ़ती रहने दो सदा ।
उसका विनियोग कदा । रुकने न देना ॥ १२ ॥
जिस कर्ममें यह प्रयोग । अनुष्ठान किया सद्द्विनियोग ।
वहां अनुष्ठान किया सांग । वेदविदित ॥ १३ ॥
अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत् ।
असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह ॥ २८ ॥
तप यज्ञ तथा दान करता कर्म साधक ।
उसमें बरता जाता उसको सत् कहा गया ॥ २७ ॥
अश्रद्धासे किया कर्म यज्ञ दान तपादिक ।
असत् वह कहा जाता होता सर्वत्र निष्फल ॥ २८ ॥
७०७ श्रद्धा-निरूपण-योग
श्रद्धाहीन कार्य कभी सफल नहीं होता—
अथवा नामको छोड़कर । तोड़कर श्रद्धाका आधार ।
दुराग्रह बल बढ़ाकर । धनंजय ॥ १४ ॥
अश्वमेघ किये अगणित । रत्नमय पृथ्वी-दान पार्थ ।
एकांगुष्ठ तप भी सतत । किया गया ॥ १५ ॥
जलाशयके नाम पर । बन गये नये सागर ।
किंतु वे सब धनुर्धर । व्यर्थ ही मान ॥ १६ ॥
पत्थर पर मेघ बरसना । या राखमें हवन किया जाना ।
या प्रेमसे आलिंगन करना । अपनी छायाका ॥ १७ ॥
या आकाशको बेंत । मारना जैसे पार्थ ।
वैसे ही सब है व्यर्थ । यह समारोह ॥ १८ ॥
कोल्हूमें कंकडका घान डाला । उससे न खली न तेल मिला ।
किंतु अपना दारिद्र्य सकल । रहा साथ ही ॥ १९ ॥
गांठमें बंधा हुवा ढेला । यहां या वहां नहीं चला ।
जिससे मर गया भला । उपवाससे ॥ ४२० ॥
वैसे कर्म जात सफल । नहीं देते हैं यहां फल ।
तब होंगे वहां विफल । कहना रहा क्या ॥ २१ ॥
ब्रह्म नामकी श्रद्धा तजकर । करनेमें ये सभी व्यवहार ।
व्यर्थ ही जान तू पांडुकुमार । केवल दिखानेके ॥ २२ ॥
जो कलुष-कुल-केसरी । त्रिताप-तिमिर-तमारी ।
वीरवर श्रीनरहरी । बोलते ऐसे ॥ २३ ॥
निजानन्दमें तद्रूप । हुवा तब परंतप ।
चंद्रमा जैसे तद्रूप । होता चांदनीसे ॥ २४ ॥
अजी ! यह युद्ध ऐसा देखा । वाणी तथा बाणके जो नोक ।
नापते हैं जीव सह एकेक । मांस खंड ॥ २५ ॥
ज्ञानेश्वरी ७०८
इस भांति कर्कश समय । भोगता है जो स्वानंदराज्य ।
आज जो है यहां भाग्योदय । नहीं अन्यत्र ॥ २६ ॥
संजय कहता है कुरु-श्रेष्ठ । शत्रुके गुणसे होता संतुष्ट ।
यहां वह गुरु भी बना श्रेष्ठ । आत्मसुखकर ॥ २७ ॥
यदि यह प्रश्न नहीं करता । श्रीहरि ऐसे क्यों गांठ खोलता ।
तथा कैसे हमें ज्ञान मिलता । परमार्थका ॥ २८ ॥
अज्ञानके अंधेरेमें होते । जन्म मृत्युकी राह चलते ।
यहां आकर कैसे पहुंचते । आत्म प्रकाश सदनमें ॥ २९ ॥
हमें तुम्हें किया अपार । इसने यह उपकार ।
तभी हैं व्यास-सहोदर । गुरुत्वमें यह ॥ ४३० ॥
संजय कहता मनही मन । बढ गया मेरा यह कथन ।
खटकेगा धृतराष्ट्रको जान । कितना बोला मैं ॥ ३१ ॥
ऐसे अर्जुन गुण-वर्णन । छोडकर वैसे ही अपूर्ण ।
कहता पूछता क्या अर्जुन । श्रीहरिसे तब ॥ ३२ ॥
छोडकर अर्जुनका गुण-वर्णन । संजय कहता श्रीकृष्णका व्याख्यान ।
वैसेही मैं भी करूंगा सुनो व्याख्यान । ज्ञानदेव निवृत्तिका ॥ ३३ ।
गीता श्लोक २८
ओवी ४३३
ॐ
७०९ श्रद्धा-निरूपण-योग
१८
सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद योग
चित्सूर्यरूपी श्रीगुरु वंदन—
जय जय देव निर्मल । निज-जनाखिल मंगल ।
जन्म-जरा-जलद-जाळ । प्रभंजन ॥ १ ॥
जय जय देव प्रबल । विदलित मंगल कुल ।
निगमागमद्रुम-फल । फलप्रद ॥ २ ॥
जय जय देव सकल । विगत विषयवत्सल ।
कलितकालकौतूहल । कालातीत ॥ ३ ॥
जय जय दैव निष्कल । स्फुरदमंदानंद बहुल ।
नित्य निरस्ताखिलमल । मूलभूत ॥ ४ ॥
जय जय देव स्वप्रभ । जगदंबुगव्हर्गर्भ नभ ।
भुवनोद्भावारंभ-स्तंभ । भवध्वंस ॥ ५ ॥
जय जय देव निश्चल । चिलित-चित-पान तुंदिल ।
जगदुन्मीलनाविरल- । केलिप्रिय ॥ ६ ॥
जय जय देव विशुद्ध । विदुदयोद्यान-द्विरद ।
शम-दम-मदन-मद-भेद । दयार्णव ॥ ७ ॥
जय जय देवैकरूप । अतिकृत-कंदर्प-सर्प-दर्प ।
भक्त-भाव-भुवन-दीप । तापावह ॥ ८ ॥
जय जय देव अद्वितीय । परिणतोपरमैकप्रिय ।
निज-जन-नित-भजनीय । मायागम्य ॥ ९ ॥
जय जय देव श्रीगुरु । अकल्पनाख्य कल्पतरु ।
स्वसंविद्रुमबीजप्ररु । भूमिरूप ॥ १० ॥
निर्विशेष तेरा स्तवन कैसे करूं ?—
यह क्या एकेक कर ऐसे । अनेक परिभाषासे कैसे ।
स्तोत्र करूं तव उद्देश्यसे । निर्विशेष ॥ ११ ॥
जिन विशेषणसे करना वर्णन । वह दृश्य-रूप तेरा न होता जान ।
लज्जित होता हूं करनेमें स्तवन । तेरा मैं श्रीगुरु ॥ १२ ॥
किंतु जो मर्यादाका सागर । ऐसी उसकी ख्याति सादर ।
किंतु न देखता सुधाकर । हुवा उदय ॥ १३ ॥
निज-निर्झरसे वह सोमकांत । चंद्रको अर्घ्य न देता यदि रात ।
तब उससे दिलाता निशा-नाथ । सुनो देव ॥ १४ ॥
न जाने कैसे वसंत आता । सहसा खिलते वृक्ष-लता ।
किंतु आप न रोक सकता । खिलता वृक्ष ॥ १५ ॥
पद्मिनी पाकर रवि-किरण । सिकुडना जानती कहां कौन ।
या जल-स्पर्श होते ही लवण । भूलता अंग ॥ १६ ॥
वैसे मैं करता तेरा स्मरण । होता मैं मेरा यह विस्मरण ।
डकार रोक न सकता जान । तृप्त जैसे ॥ १७ ॥
तूने मुझे किया ही है ऐसे । मेरा मैं-पन मिटा देनेसे ।
स्तवनार्थ पागल-पनसे । नाचती वाचा ॥ १८ ॥
अथवा मैं वैसे ही सचेतन । रहके करूंगा तेरा स्तवन ।
जिससे गुण-गुणीकी तुलना । होगी मुझसे ॥ १९ ॥
तथा तू है एकरस अखंड । कैसे करें गुण-गुणीका खंड ।
मोति भला क्या तोडकर जोड़ । या समूचा वैसेही ॥ २० ॥
और तू है माता तथा पिता । इससे स्तवन नहीं होता ।
लगती उपाधिकी भृष्टता । पुत्रत्वकी मात्र ॥ २१ ॥
७११ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद योग
दूसरेकी करनेसे दासता । आई हुई पराधीन श्रेष्ठता ।
उपाधि उच्छिष्टका है क्या होता । बखाननेसे ॥ २२ ॥
तब तू आत्मा एक समान । ऐसे कहनेसे भी श्रीमान् ।
दृश्यादृश्यको बाहर मान । ढकेलता हुवा ॥ २३ ॥
मौन भूषणादिसे गुरु पूजन—
तभी करनेमें तेरा वर्णन । नहीं मिलता योग्य विशेषण ।
तब मौन बिन अन्य भूषण । नहीं चढाता मैं ॥ २४ ॥
स्तवन है कुछ भी न बोलना । पूजा है कुछ भी न करना ।
सन्निधिमें कुछ भी न होना । तेरे पास ॥ २५ ॥
किंतु जैसे कोई भ्रम-ग्रस्त । करता है प्रलाप बहुत ।
वैसे मैं वर्णन गुरु-मात । कहता सहले तू ॥ २६ ॥
अब दे अपना स्वाक्षर । हुवा जो गीतार्थ विस्तार ।
जिससे हो यह स्वीकार । सज्जनोंमें ॥ २७ ॥
कहते हैं श्रीनिवृत्तिनाथ यह । बार बार पूछता क्यों वह ।
कह तू पारसपे घिसते क्यों लोह । बार बार ॥ २८ ॥
ज्ञानदेव तब विनयकर । आपका प्रसाद है गुरुवर ।
सुनना जी अब चित्त देकर । ग्रंथ संवाद ॥ २९ ॥
गीत-रत्न प्रासादका कलशाध्याय—
अजी ! यह गीता-रत्न-प्रासादका । कलशही है अर्थ चिंतामणिका ।
अथवा है सभी गीता-दर्शनका । है पथ-दीप ॥ ३० ॥
लोगोंमें रही है यह मान्यता । जब दूरसे कलश दीखता ।
तब तो सहज दर्शन होता । देवताका भी ॥ ३१ ॥
अजी ! उसी भांति है यहां । एक ही अध्यायमें जहां ।
पूर्ण-दर्शन होता है यहां । गीतागमका ॥ ३२ ॥
कलश है यह इसी कारण । अध्याय यह बादरायण ।
अठारहवा जो सकारण । रचते हैं ॥ ३३ ॥
ज्ञानेश्वरी ७१२
कलशके बाद कुछ भी कहीं । मंदिरका काम रहता नहीं ।
यह बात अष्टादशमें यहीं । दीखती स्पष्ट ॥ ३४ ॥
व्यास सहज सशक्त सूत्रकार । उसने निगम-रत्नाचल पर ।
उपनिषदार्थके पठार पर । किया खनन ॥ ३५ ॥
वहां जो त्रिवर्गका असार । मिला माटी कंकड़ादि अपार ।
उससे महा-भारत प्राकार । रचा चतुर्दिक ॥ ३६ ॥
आत्म-ज्ञानका वहां अखंड । मिला जो सुंदर शिला-खंड ।
रची पार्थ-कृष्णकी अखंड । संवाद कलाकृति ॥ ३७ ॥
निवृत्ति-सूत्रका अधिष्ठान । सर्व-शास्त्रार्थका है भरण ।
आकार लाया बादरायण । मोक्ष-रेखाका ॥ ३८ ॥
करनेमें ऐसा यह निर्माण । पंद्रह अध्यायका है सदन ।
हुए हैं पंद्रह अंतस्त मान । इस प्रासादके ॥ ३९ ॥
षोडश अध्याय ऊपर । ग्रीवा घंटाका जो आकार ।
तथा कलश-पीठाकार । सप्तदश जो ॥ ४० ॥
उस पर यह अष्टादश । अपने आप हुवा कलश ।
ऊपर गीताविकमें व्यास । लगाता है ध्वज ॥ ४१ ॥
पिछले सभी अध्याय । चढते भूमिका आय ।
पूर्णता दिखाते जाय । अपनेसे ॥ ४२ ॥
हुए कार्यमें रही जो अपूर्णता । कलशमें होगी वह पूर्णता ।
वैसे अष्टादश विचार कहता । साद्यंत गीताका ॥ ४३ ॥
व्यास बडा कारीगर । रचा गीताका मंदिर ।
किया महा उपकार । प्राणि मात्रका ॥ ४४ ॥
कोई है परिक्रमा जपकी । करते बाहरसे इसकी ।
कोई श्रवणार्थ हैं छायाकी । धरते अपेक्षा ॥ ४५ ॥
तथा अवधानका संपूर्ण । देकर कोई दक्षिणा-धन ।
पैठते अंतर्गृहमें तत्क्षण । अर्थ ज्ञानके ॥ ४६ ॥
७१३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद योग
फिर पाते निज-बोधसे तत्काल । आत्म-रूप हरि-दर्शनका फल ।
ऐसे मोक्ष प्रासादमें है सकल । पाते हैं प्रसाद ॥ ४७ ॥
जैसे समर्थोंका पंक्ति भोजन । देता सबको एकसा पकवान ।
श्रवण पठन अर्थ-चिंतन । मोक्ष देता इसका ॥ ४८ ॥
गीता यह ऐसा वैष्णव-प्रासाद । अठारहवा कलश है विशद ।
मैंने कहा है जानेका यह भेद । इस स्थान पे ॥ ४९ ॥
सत्रहवे और अठारहवे अध्यायका संबंध—
समाप्त होता है सत्रहवां अध्याय । वहां होता कैसे अठारहवां उदय
कहूंगा यह प्रत्यक्ष-सा दृश्य । आंखमें दीखे वैसे ॥ ५० ॥
न तोडके दोनों आकार । बनाया है एक शरीर ।
है अर्धनारी नटेश्वर- । रूपमें जैसे ॥ ५१ ॥
या गंगा-यमुनाका उदक । प्रवाहमें भिन्न है जो देख ।
तथा पानी रूपसे एक । दीखता सदैव ॥ ५२ ॥
अथवा शुक्ल-पक्षमें जैसे । नाना चंद्रकला दीखती वैसे ।
पूर्णमासीका पूर्ण चंद्र जैसे । दीखता एक ॥ ५३ ॥
जैसे भिन्न होनेसे सब पद । श्लोकके होते हैं श्लोकावछेद ।
अध्यायके होते अध्याय भेद । इसी भांति ॥ ५४ ॥
किंतु कहते हैं एक ही प्रमेय । मिलकर ये अष्टादश अध्याय ।
नाना रत्नोंको पिरोती साभिप्राय । जैसे एकही डोरी ॥ ५५ ॥
अनेक मोतियां मिलकर । होता जैसा एकावली हार ।
किंतु शोभा दीखती सुंदर । एकही अखंड ॥ ५६ ॥
गिन सकते हैं वृक्षके सभी फूल । सौरभपे उंगली न पडे सरल ।
अध्यायोंमें श्लोक हैं वैसे ही अचल । जानना यहां ॥ ५७ ॥
यहां है जो सात शत श्लोक । अष्टादश अध्यायमें लेख ।
किंतु देव बोलता है एक । दूसरा नहीं ॥ ५८ ॥
ज्ञानेश्वरी ७१४
तथा मैने भी यह तजकर । नहीं किया है ग्रंथका बिस्तार ।
यहांपे भी कहता सविस्तर । निरूपणमें एक ॥ ५९ ॥
जहां सत्रहका अध्याय । कहते अंतके समय ।
कहता देव साभिप्राय । इस प्रकार ॥ ६० ॥
ब्रह्म नाममें श्रद्धा रखकर । किये जाते जितने व्यवहार ।
होते वह सब व्यर्थ आखर । निश्चित जान ॥ ६१ ॥
सुनकर यह श्रीहरिका बोल । डुलता है मनमें पार्थ निर्मल ।
कहता कर्म-निष्ठोंका है सकल । बना निम्न रूप ॥ ६२ ॥
अज्ञानसे अंध जो कर्म-जड़ । ईशको न देख सकता मूढ़ ।
उसके नाम श्रद्धादि जो गूढ़ । जानेगा कैसे ॥ ६३ ॥
तथा रज और तमोगुण । नहीं तजता अंतःकरण ।
तब होती है जो श्रद्धा क्षीण । जुडती कैसे ब्रह्मसे ॥ ६४ ॥
फिर शस्त्र-नोकसे गले लगना । तथा खडी डोरीपे दौड़ते जाना ।
अथवा मानो नागिनसे खेलना । होंगे कम धातुक ॥ ६५ ॥
कर्म ज्ञान-फलका सुक्षेत्र कैसे होगा ? अठारहवेका सूत्र—
ऐसे कर्म अति कठिन । देते हैं पुनः पुनः जनन ।
इस भांति कुयोग-पूर्ण । होते हैं जो ॥ ६६ ॥
होता यदि कर्म सांग संपूर्ण । बनता है ज्ञानके ही समान ।
नहीं तो देता नरक महान । यही कर्म ॥ ६७ ॥
कर्ममें हैं इस प्रकार । आते हैं दोष बार बार ।
तब कहां मोक्षका द्वार । खुलेगा कर्मठको ॥ ६८ ॥
मिटाना है यदि कर्म-संग । करके उसका पूर्ण त्याग ।
स्वीकार करना जो अव्यंग । संन्यास यहां ॥ ६९ ॥
कर्म-बाधाकी जो कहीं । भयकी बातही नहीं ।
वह आत्म-ज्ञान यहीं । होता हस्तगत ॥ ७० ॥
७१५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद योग
ज्ञानका आवाहन-मंत्र । ज्ञान फलनेका सु-क्षेत्र ।
तथा ज्ञानाकर्षक-सूत्र । तंतु ही जो ॥ ७१ ॥
यह दोनों संन्यास और त्याग । आचरनेसे छूटता जग ।
तब इस बातमें हो सजग । पूछना स्पष्ट ॥ ७२ ॥
ऐसे विचार कर अर्जुन । त्याग संन्यासका पक्व ज्ञान ।
जान लेनेमें करता प्रश्न । इस स्थानपे ॥ ७३ ॥
उसके उत्तरमें श्रीकृष्ण । करता है जो यहां कथन ।
उससे व्यक्त हुवा संपूर्ण । अष्टादशाध्याय ॥ ७४ ॥
एवं यहां ले जन्य-जनक भाव । होता अध्यायसे अध्याय प्रसव ।
अब प्रश्न किया वह सावयव । सुनलें सब ॥ ७५ ॥
कृष्णार्जुन-प्रेमका वर्णन—
वहां जो श्रीकृष्णका कथन । समाप्त होता देख अर्जुन ।
अपने मनमें होता खिन्न । जिस समय ॥ ७६ ॥
वैसे आत्म-तत्वमें निश्चित । बन गया था उसका मत ।
श्रीहरिका न करना बात । न भाया उसे ॥ ७७ ॥
बछडा होने पर भी तृप्त । गाय रहती पास सतत ।
अनन्य प्रीतकी यह रीत । चलती आयी है ॥ ७८ ॥
बिन कारण भी उनका बोलना । देख कर भी फिर फिर देखना ।
प्रिय-वस्तुके भोगसे होता दूना । भोग-भाव ॥ ७९ ॥
ऐसी है प्रेमकी यह रीति । तथा पार्थ है उसकी पूर्ति ।
तभी करती उसकी मति । चिंता मौनकी ॥ ८० ॥
तथा है संवादके निमित्तसे । व्यवहारकी जो वस्तु है उसे ।
भोगा जाता है सहज ही जैसे । दर्पण रूप ॥ ८१ ॥
फिर जब संवाद रुकता । तब यह सुख भंग होता ।
इसको फिर कैसे सहता । अभ्यस्त इसका ॥ ८२ ॥
ज्ञानेश्वरी ७१६
इसलिये वह संन्यास । पूछनेका करके मिस ।
खोलता है पर विशेष । गीता तत्वका ॥ ८३ ॥
अठारहवा अध्याय एकाध्यायी गीता है—
अठारहवा अध्याय यही नहीं । समग्र एकाध्यायी गीता है यही ।
दुहता है जब स्वयं बछडा ही । तब कैसा अकाल ॥ ८४ ॥
संवाद रुकनेका समय आया । पुनरपि गीता प्रारंभ कराया ।
गुरु-शिष्यके संवादमें अशक्य क्या । होता है कब ॥ ८५ ॥
यह सब रहने दें अब । अर्जुन पूछता सुने सब ।
कहता यह विनय अब । सुनले देव ॥ ८६ ॥
अर्जुन उवाच
संन्यासस्य महाबाहो तत्वमिच्छामि वेदितुम् ।
त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन ॥ १ ॥
त्याग और संन्यासका अर्थ भिन्नत्व—
अजी ! संन्यास और त्याग । एक ही अर्थके दो अलग ।
जैसे संघात और संग , है समुदायके ॥ ८७ ॥
त्याग तथा संन्याससे । त्याग ही कहना ऐसे ।
जान लिया है मनसे । यहां मैंने ॥ ८८ ॥
इसमें है यदि अर्थ-भेद । करें देव इसको विशद ।
तब कहता वह मुकुंद । ये दोनों हैं भिन्न ॥ ८९ ॥
अर्जुनने कहा
कैसे संन्यासका तत्व तथा है त्यागका कहो ।
जानना चाहता हूं मैं कह तूं भिन्न भिन्न जो ॥ १ ॥
७१७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद योग
वैसे तेरा जो चिंतन । त्याग संन्यास अर्जुन ।
एक ही ऐसा निदान । वह भी सत्य ॥ ९० ॥
इन दोनोंका एक अर्थ । त्याग कहलाता निश्चित ।
भेदका कारण जो पार्थ । रहता ही है ॥ ९१ ॥
तजना कर्मको जो मूलता । वह है संन्यास कहलाता ।
तथा कर्म-फल जो तजता । वह है त्याग ॥ ९२ ॥
तब है कोई कर्मका फल । तजता कोई कर्म सकल ।
कहता हूँ यह मैं निर्मल । सुन तू चित्त देकर ॥ ९३ ॥
जैसे वनमें या पर्वत पर । वृक्ष उगते सहज अपार ।
वैसे उद्यान खेत धनुर्धर । नहीं उगते ॥ ९४ ॥
घास उगता यदि नहीं भी बोते । वैसे कभी धानादि नहीं उगते
उसमें प्रयत्न करने पडते । उसी भांति ॥ ९५ ॥
या अंगांग सहज होते । भूषण बनाने पडते ।
नदी नाले सहज होते । कूए नहीं ॥ ९६ ॥
वैसे जो नित्य नैमित्तिक । कर्म होते हैं स्वाभाविक ।
किंतु नहीं होते कामिक । निरिच्छासे ॥ ९७ ॥
भगवान उवाच
काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः ।
सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः ॥ २ ॥
संन्यासकी परिभाषा काम्य-कर्मका त्याग—
कामनाओंके समुदाय । उभारते हैं धनंजय ।
अश्वमेधादि स-समय । काम्य-कर्म ॥ ९८ ॥
श्रीभगवानने कहा
त्यजना काम्य-कर्मोंको ज्ञानी संन्यास जानते ।
कहते सब कर्मोंके फलका त्याग त्याग है ॥ २ ॥
ज्ञानेश्वरी ७१८
कूप सरोवर आराम । अग्रहारादि महाप्राम ।
व्रत समारोहादि कर्म । अन्य अनेक ॥ ९९ ॥
ऐसे इष्ट-पूर्तिके जो सकल । कामना होती है जिसका मूल ।
भोगना पड़ता इसका फल । बंधकर ही ॥ १०० ॥
करते हैं सब देह-धारण । भोगने पड़ते जनन-मरण ।
इसको अ-स्वीकारना अर्जुन । असंभव जैसे ॥ १ ॥
अथवा ललाट लिखित जैसे । कभी नहीं मिटाया जाता वैसे ।
तथा काला गोरापन धोनेसे । मिटता नहीं ॥ २ ॥
वैसे काम्य-कर्म फल पार्थ । भोगना पड़ता है निश्चित ।
धरना दे बैठता है नित । ऋणदाता समान ॥ ३ ॥
या कामना नहीं करते । सहज रूपमें कर्म होते ।
रणभूमिमें बाण लगते । न लड़ते भी जैसे ॥ ४ ॥
अजानपनसे गूड़ खाता । फिर भी वह मीठा लगता ।
राख मानकर पैर देता । जलाती आग ॥ ५ ॥
काम्य-कर्ममें जो यह एक । सामर्थ्य होता है स्वाभाविक ।
इसीलिये मुमुक्षुको देख । नहीं चाहना उसे ॥ ६ ॥
वास्तवमें पार्थ ऐसे । काम्य कर्म होता उसे ।
तज देना विष जैसे । उगलकर ॥ ७ ॥
देख कर फिर यह त्याग । संन्यास कहता है सारा जग ।
तथा देखता जो अंतरंग । सर्वदृष्टा ॥ ८ ॥
इस काम्य-कर्मको तजना । कामनाको जैसे उखाडना ।
धन-त्याग कर मिटा देना । भयको जैसे ॥ ९ ॥
नित्य-नैमित्तिक कर्मका विवेचन—
चंद्र-सूर्यके जो ग्रहण । बनाते पर्वणी अर्जुन ।
या माता-पिताका मरण । निश्चित दिवस ॥ ११० ॥
७१९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद योग