सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 797, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 797

तुझे अब वह कुशलता । कहता सुंदरतासे पार्था ।
कर्मसे कर्मही है मिटता । जिससे यहां ॥ ६५ ॥
एतान्यापि तु कर्माणि संगंत्यक्त्वा फलानि च ।
कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम् ॥ ६ ॥
कर्म-नाशकी कर्म-कुशलता—
महा यागादि सब प्रमुख । कर्म-संपन्न होते हैं नेक ।
कर्तापनकी अहंता देख । रहती नहीं ॥ ६६ ॥
जैसे जो मूल्यसे यात्रा करता । उसको यात्राका गर्व न होता ।
उसको हृदयमें नहीं होता । यात्राका आनंद ॥ ६७ ॥
अथवा जो राजाकी आज्ञासे । लड़ता रहता है राजासे ।
अभिमान नहीं होता उसे । जीतता मैं राजाको ॥ ६८ ॥
अन्योंकी सहायतासे जो तरता । उसको तरनेका गर्व न होता ।
अथवा पुरोहित न धरता । दातृत्वका गर्व ॥ ६९ ॥
वैसे कर्तृत्वका अहंकार । नहीं लेते यथा अवसर ।
कर्म-मात्र सभी धनुर्धर । करना पूर्ण ॥ १७० ॥
तथा कर्म किया अर्जुना । इससे है फलका आना ।
ऐसी अपेक्षा न धरना । मनमें कभी ॥ ७१ ॥
फलकी आशा छोड़कर । कर्म करना धनुर्धर ।
पराया बच्चा निरंतर । देखती धात्री जैसे ॥ ७२ ॥
बिना किये ही फलकी आशा । तुलसीमें पानी देते जैसा ।
वैसे ही हो फलमें निराशा । करना कर्म ॥ ७३ ॥
न करके दूधकी आशा ग्वाल । करता गांवके पशु संभाल ।
उसी भांति मान कर्मका फल । करना कर्म ॥ ७४ ॥
किंतु पुण्य-कर्म भी ये ममत्व-फल छोड़के ।
करना योग्य है मेरा जान उत्तम निर्णय ॥ ६ ॥
७२५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद योग