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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 802

इस लिये कर्म और कर्ता । इस द्वैत-भावकी जो वार्ता ।
न जानता वह पांडुसुता । सात्विक त्याग ॥ १६ ॥
इस भांति वह कर्म-पार्था । तजे तो छूट जाते सर्वथा ।
अधिक बांधते है अन्यथा । तजे तो कर्म ॥ १७ ॥
न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः ।
यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते ॥ ११ ॥
देह-धारीको कर्म अनिवार्य है—
वैसे ही जो पांडुकुमार । देहकी मूर्ति बनकर ।
रहता कर्मसे ऊबकर । वह है अनाडी ॥ १८ ॥
उकताकर मृत्तिकासे । रहेगा कहो घडा कैसे ।
तथा कपडा तंतुओंसे । कैसे रहे दूर ॥ १९ ॥
जैसे अग्नि अपनी उष्णता । त्यजेगा कैसे कह तू पार्थ ।
अथवा कैसे करेगी जोत । प्रकाशसे द्वेष ॥ २२० ॥
द्वेष कर अपनी उग्रतासे । सुगंध लायेगा हींग कहांसे ।
अथवा द्रवत्व छोड़के कैसे । रहेगा पानी ॥ २१ ॥
वैसे लेकर शरीरका आकार । करता रहता है सभी व्यवहार ।
तब कैसे है उन्माद धनुर्धर । कर्म-त्यागका ॥ २२ ॥
अपना लगाया हुवा तिलक । पुनः पुनः पोंछते स-कौतुक ।
किंतु निकालकर क्या मस्तक । लगा सकते हैं ॥ २३ ॥
वैसे विहित जो स्वयं स्वीकृत । सहज तज सकते हैं पार्थ ।
किंतु जो देह बन आया साथ । वह कर्म तजे कैसे ॥ २४ ॥
चलता जो श्वासोच्छ्वास । नींदमें भी रात-दिवस ।
न करना सा अहर्निश । चलता कर्म ॥ २५ ॥
अशक्य देहधारीको सर्वथा कर्म छोडना ।
इसीलिये फल-त्यागी त्यागी वह कहा गया ॥ ११ ॥
ज्ञानेश्वरी ७३०