ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम ।
त्यागो हि पुरुषव्याघ्रः त्रिविधः संप्रकीर्तितः ॥ ४ ॥
त्याग भी तीन प्रकारका है—
त्याग जो सो यहां अर्जुन । तीन प्रकारका है जान ।
इन प्रकारका वर्णन । कहूंगा अब ॥ ४५ ॥
त्यागके तीन प्रकार । होते हैं यदि गोचर ।
इनका इत्यर्थ सार । जान तू इतना ॥ ४६ ॥
मुझ सर्वज्ञ बुद्धिको जंचता । वह निश्चित मत मैं कहता ।
उसको जान तू पहले पार्थ । इस स्थान पे ॥ ४७ ॥
चाहता जो संसारसे छुटकार । तथा इसमें सावध धनुर्धर ।
उसके लिये हैं सब ही प्रकार । करणीय हैं ये ॥ ४८ ॥
यज्ञदानतपः कर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् ।
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ॥ ५ ॥
आत्म-ज्ञानका निश्चय न होने तक कर्म अनिवार्य है—
जैसे यज्ञ दान तपादिक । कर्म करना है आवश्यक ।
न छोडे कभी उन्हे पथिक । डग भरना जैसे ॥ ४९ ॥
खोया हुवा जब नहीं मिलता । उसका भाग नहीं तजा जाता ।
या जब तक तृप्त नहीं होता । न छोड़ते थाली ॥ १५० ॥
तट पाने तक न तजते नांव । फलने तक केला न काटे पांडव ।
रखा हुवा मिले तब तक सदैव । रखते हैं दीप ॥ ५१ ॥
वैसे आत्म-ज्ञानका विषय । न होता जब तक निश्चय ।
न होना कर्ममें धनंजय । उदासीन ॥ ५२ ॥
तभी तू इसमें मेरा सुन निश्चित निर्णय ।
कहते जिसको त्याग वह भी तीन भांतिका ॥ ४ ॥
तप यज्ञ तथा दान अवश्य करना नित ।
होते पावन ज्ञानीको तजना न इन्हे कभी ॥ ५ ॥
७२३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद योग