सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 798, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 798

इस भांति कर्म-कुशलता । साधकर जो कर्म करता ।
अपने आप दर्शन पाता । सहजमें जो ॥ ७५ ॥
तभी फल आशा छोड कर । तथा तज देह अहंकार ।
कर्म करना है धनुर्धर । यह मेरा संदेश ॥ ७६ ॥
जीव जो बंधसे थका हुवा । भक्तिकी चाह करता हुआ ।
उसे मैं कहता हूं पांडव । नहीं अन्य मार्ग ॥ ७७ ॥
नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते ।
मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः ॥ ७ ॥
तामसिक कर्म-त्याग—
अंधारमें नहीं दीखता । इसलिये आंखें फोडता ।
वैसे कर्म-द्वेषसे करता । कर्मका त्याग ॥ ७८ ॥
उसका है जो कर्मका तजना । कहता हूं मैं तामस अर्जुना ।
आधासीसीके क्रोधसे फोड़ना । कपाल जैसे ॥ ७९ ॥
पथ है यह अति कठिन । तो भी पार करेंगे चरण ।
उन्हीका करना क्या खंडण । मार्गापराधसे ॥ १८० ॥
भूखेके सम्मुख आया आहार । उसको अति उष्ण मानकर ।
करके अनशनका विचार । उसे तजना सा ॥ ८१ ॥
वैसे कर्मका बाधक कर्म । निस्तार करना यह मर्म ।
न जानता तामस सभ्रम । मत्त होकर ॥ ८२ ॥
स्वाभाविक जो भागमें आता । उस कर्मको जो तज देता ।
ऐसे तामस त्यागसे पार्थ । रहना दूर ॥ ८३ ॥
राजस कर्म-त्याग—
अथवा स्वाधिकार जो जानता । अपना विहित कर्म सूझता ।
किंतु काया-क्लेश मान तजता । आलस्यसे जो ॥ ८४ ॥
न होता साध्य संन्यास कभी नियत कर्मका ।
करनेसे स-सम्मोह कहाता त्याग तामस ॥ ७ ॥
ज्ञानेश्वरी ७२६