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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 804

वैसे अकर्ता मान कर्म करता । कर्ता मान जो फलाशा न धरता
उन दोनोंको बांध न सकता । केवल कर्म ॥ ३६ ॥
पकता पेड जो राह पर । उसके फलकी आशा कर ।
सदा कर्मका भी धनुर्धर । फल बांधता है ॥ ३७ ॥
किंतु करके फलाशा तजता । जगतके कार्यमें न घुसता ।
त्रिविध विश्व यह जो पूर्णता । कर्म फल है ॥ ३८ ॥
देव मानव और स्थावर । इसका नाम जगदंबर ।
ऐसे ही हैं ये तीन प्रकार । कर्म फलके ॥ ३९ ॥
एक है वही अनिष्ट । एक है जो केवल इष्ट ।
तथा एक है जो इष्टानिष्ट । त्रिविध ऐसे ॥ २४० ॥
किंतु बुद्धि बन विषयासक्त । स्वैराचारमें होकर अभ्यस्त ।
निषिद्ध कर्ममें होते प्रवृत्त । दुर्व्यवहारमें ॥ ४१ ॥
वहां है कृमिकीट लोष्ट । देह पाते हैं जो निकृष्ट ।
उसका नाम है अनिष्ट । कर्मका फल ॥ ४२ ॥
या स्वधर्मको मान देकर । अपने अधिकारानुसार ।
सुकृत करते धनुर्धर । वेदाज्ञासे ॥ ४३ ॥
देवोंके वे इंद्रादिक । देह पाते हैं अति नेक ।
कर्म-फल इष्टमें देख । उसकी प्रसिद्धी ॥ ४४ ॥
किंतु खटा मीठा मिलकर । होता है विशिष्ट रसांतर ।
स्वादमें दोनोंसे रुचिकर । होता भिन्न ही ॥ ४५ ॥
रेचक ही होके योग-वश । करता है स्तंभनका दोष ।
वैसे सत्यासत्य समस्त । जीतता असत्य ॥ ४६ ॥
सम-भागसे है शुभाशुभ । होके खड़ा अनुष्ठान भाग ।
उससे जो मनुष्यत्व-लाभ । मिश्र फल है ॥ ४७ ॥
ज्ञानेश्वरी ७३२