ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः ।
यज्ञदानतपः कर्म न त्याज्यमिति चापरे ॥ ३ ॥
फलाशा जो न छोड सकता । कर्मको वह बद्ध कहता ।
जैसे आप नग्न हो कहता । जग झगड़ालू ॥ ३५ ॥
जिव्हा-लंपट रोगी जैसे । अन्नको दोष देता वैसे ।
या कोढी चिढे मक्खियोंसे । उसी भांति ॥ ३६ ॥
जो हैं फल-काम दुर्बल । कहते हैं कर्म ही मल ।
फिर मत देते केवल । कर्म हैं त्याज्य ॥ ३७ ॥
कहता कोई यज्ञादिक । करना अति आवश्यक ।
उसके बिना न शोधक । दूसरा कुछ है ॥ ३८ ॥
यदि है चित्त-शुद्धिका मार्ग । चलना चाहे कोई सवेग ।
देता है कर्म उसमें वेग । उसे तजना नहीं ॥ ३९ ॥
यदि सुवर्णको शुद्ध करना । उसको जैसे आगमें तपाना ।
या लोह-दर्पण स्वच्छ करना । जमाना है रज ॥ १४० ॥
या कपडोंको स्वच्छ करना । ऐसी होती है मनोकामना ।
धोबीकी भट्टी गंदी करना । ऐसे होगा ॥ ४१ ॥
वैसे दुःख दायक कर्म जात । ऐसे मान उन्हे 'तजना नित ।
रसोईका क्लेश मान पार्थ । मिलेगा क्या अन्न ॥ ४२ ॥
सुन कर ऐसे ऐसे शब्द । कर्म-रत होते हैं सुबुद्ध ।
ऐसे त्याग विषयमें विशुद्ध । हुवा न निर्णय ॥ ४३ ॥
तमी न मिटे इसका निर्णय । त्यागके विषयमें हो निर्णय ।
ऐसे कहता हूं मैं धनंजय । ध्यानसे सुन तू ॥ ४४ ॥
छोड़ना कहते कोई कर्म हैं दोष रूप जो ।
न छोड़ कहते कोई यज्ञ दान तपादिक ॥ ३ ॥
ज्ञानेश्वरी ७२२