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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 807

यदि चंद्रमें होता कलंक । किंतु चंद्रसे न होता एक ।
अलग दृष्टि और आंख । अतिशय वैसे ॥ ७३ ॥
जैसे है पथ और पथिक । नदीतल और है उदक ।
दर्पण और जैसे दर्शक । भिन्न है जितने ॥ ७४ ॥
उतना ही भिन्न है मान । आत्मा और कर्म अर्जुन ।
किंतु है अज्ञान कारण । दीखता एक ॥ ७५ ॥
सूर्यसे विकास उपजता । भ्रमरसे सुगंध भोगाता ।
किंतु जलमें स्वस्थ रहता । कमल जैसे ॥ ७६ ॥
बार बार कहता हूं सुन । आत्मामें कर्म-भासका कारण ।
भिन्न ही है पांच जो अर्जुन । कारण रूप ॥ ७७ ॥
पंचैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे ।
सांख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम् ॥ १३ ॥
कर्मके जो पंचकारण । जानता होगा तू अर्जुन ।
करते हैं सांख्यकथन । मुक्त कंठसे ॥ ७८ ॥
वेद-राजाकी राजधानीमें । सांख्यवेदांतके भुवनमें ।
घोष करते उच्च स्वरमें । गूंजा करके ॥ ७९ ॥
जगतमें है कर्म-सिद्धार्थ । पांच कारण जान ये पार्थ ।
उसमें फंसना अनुचित । आत्मराजको ॥ २८० ॥
कृष्णार्जुन गुरुशिष्य प्रेमका वर्णन—
ऐसा यह शास्त्र-कथन । प्रसिद्ध है जान अर्जुन ।
मुझसे तू इसको सुन । चित्त देकर ॥ ८१ ॥
अन्योंके मुखसे सुनना । ऐसा कष्ट क्या है अर्जुन ।
चिद्रत्न मैं तेरे आधीन । रहते हुए ॥ ८२ ॥
जान तू मुझसे पार्थ प्राज्ञोंका कर्म-निर्णय ।
सीधे ही करते कर्म उसके पांच कारण ॥ १३ ॥
७३५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग