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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 803

An exact transcription of the page in Devanagari script:

इस शरीरके निमित्त । लगा जो कर्म सतत ।
तन हो जीवित या मृत । न छूटेगा कभी ॥ २६ ॥
इस कर्म-त्यागका प्रकार । एक ही है यहां धनुर्धर ।
न बनो फलाशाका आहार । कर्ममें कभी ॥ २७ ॥
कर्म-फल करो ईश्वरार्पण । तत्प्रसादसे बोध उद्दीपन ।
तब हो रज्जु-ज्ञान विलोपन । व्याल-शंका ॥ २८ ॥
इस भांति आत्म-बोधसे पार्थ । अविद्या सह कर्म-नाश होता ।
तथा ऐसा त्याग जो कहलाता । कर्म-त्याग ॥ २९ ॥
तभी जो इस प्रकार त्याग करता । उसको मैं सही कर्म-त्यागी मानता ।
रोगमें मूर्छाको विश्रांति कहा जाता । वैसे हैं अन्य त्याग ॥ २३० ॥
ऐसे एक कर्ममें जो थकता । दूसरेमें जा विश्रांति खोजता ।
तथा झांपड पर जो है खाता । सोटोंकी मार ॥ ३१ ॥
रहने दे यह वाग्विस्तार । त्रिलोकमें त्यागी है धनुर्धर ।
फल-त्यागसे है निष्कृती पर । ले जाता कर्म ॥ ३२ ॥
अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् ।
भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित् ॥ १२ ॥
वैसे तो सुन यह धनंजय । त्रिविध कर्म-फल कहा गया ।
समर्थ वही है जान निश्चय । न छोडते फलाशा ॥ ३३ ॥
तीन प्रकारके कर्म-फल-
जन्म देकरके आप दुहिता । "इदं न मम" कह माता पिता ।
छूट जाते दान लेके फंसता । दामाद आप ॥ ३४ ॥
बोकर जैसे विषका खेत । सुखसे लाभ लेते हैं पार्थ ।
किंतु खर्च कर होते मृत । उसको खाकर ॥ ३५ ॥
तेहरा फल कर्मोंका मधुर कटु मिश्रित ।
उससे मुक्त संन्यासी पाते हैं त्याग-हीन जो ॥ १२ ॥
७३१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद योग