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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 808

अजी ! सम्मुख है दर्पण । करते अपना रूप दर्शन ।
देखना क्यों दूसरोंके नयन । कह तू पार्थ ॥ ८३ ॥
भक्त जैसे जहां जब देखता । उसको वैसे वहां जो दीखता ।
ऐसा मैं जब सम्मुख रहता । तेरा खिलौना बन ॥ ८४ ॥
ऐसे भावनावेगसे जब । बोलते थे देख वहां तब ।
देहभान भूलकर सब । डुलता है अर्जुन ॥ ८५ ॥
चंद्र-किरणका जब भरमार । पडता चंद्रमणि-पहाडपर ।
पिघलके होता जैसे सरोवर । उसी भांति ॥ ८६ ॥
तब सुख तथा सुखानुभूति । इन भावोंकी तोडकर भित्ति ।
बन गया वह अर्जुनाकृति । सुख केवल ॥ ८७ ॥
श्रीकृष्ण होनेसे अति समर्थ । यथावत हुवा सहज स्थित ।
तब होने सहजस्थित पार्थ । करता प्रयास ॥ ८८ ॥
व्यक्तित्व जहां अर्जुनसा । गया प्रज्ञा सह डूबसा ।
आया ऐसा महा पूरसा । आनंदका तब ॥ ८९ ॥
कहता है देव अजी हे पार्थ । पूर्ण रूपसे हो सहज-स्वस्थ ।
सांस भर डुलता है पार्थ । अपना मस्तक ॥ २९० ॥
कहता तब जानता तू उदार । तेरे साथमें भिन्न शरीरधर ।
ऊब चुका तब एकत्वमें भर- । जाना चाहता था ॥ ९१ ॥
मेरे प्रेमसे तू ऐसा । पूर्ण करता लालसा ।
रोकती क्या जीव दशा । इस प्रकार ॥ ९२ ॥
श्रीकृष्ण हंस तब भला कहता । अबतक तू यह नहीं जानता ।
पगले ! चंद्र चंद्रिकामें भिन्नता । रहती क्या कभी ॥ ९३ ॥
तथा कहनेमें यह भाव । डर जाते हैं हम पांडव ।
मन भायेका क्रोध-भाव । बढाता है प्रेम ॥ ९४ ॥
यहां है जो परस्पर भिन्नता । तभी ऐसे जीवनकी शक्यता ।
रहने दे ऐसे ये बोल पार्था । इस विषयके ॥ ९५ ॥
ज्ञानेश्वरी ७३६