ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसत्कर्मके तीर्थसे उज्वल होनेसे सत्व-शुद्धि होती है—
किंतु स्वाधिकारानुरूप । करना यज्ञ दान तप ।
अनुष्ठान करें आक्षेप । किये बिना ॥ ५३ ॥
चलनेमें जो वेग बढ़ता । विश्रांतिकाही कारण होता ।
वैसे कर्मातिशयमें आता । नैष्कर्म्य पास ॥ ५४ ॥
पथ्यमें जैसे नियमित । होता जाता है वैसे पार्थ ।
रोगसे हठता निश्चित । उसी प्रकार ॥ ५५ ॥
वैसे कर्म होते जो आवश्यक । करनेसे कुशलतापूर्वक ।
झड़ते हैं रज तम निरर्थक । पूर्ण-रूपसे ॥ ५६ ॥
या क्षारसे जैसे सतत । पुट देते स्वर्णको पार्थ ।
निर्मल हो जाता तुरंत । सुवर्ण जैसे ॥ ५७ ॥
वैसे निष्ठासे किया हुवा कर्म । धोता जाता है सदा रज तम ।
तथा सत्व-शुद्धिका पुण्य-धाम । दृष्टिमें आता ॥ ५८ ॥
इसीलिये जान तू पार्था । सत्व-शुद्धि जो है चाहता ।
उसको कर्म मानो तीर्थ- । समान जान ॥ ५९ ॥
तीर्थसे होता बाह्य मल-क्षालन । कर्मसे अभ्यंतर उजला जान ।
ऐसे निर्मल तीर्थ जान अर्जुन । सत्कर्मको ही ॥ १६० ॥
तृषार्तको जैसे मरु-भूमिके । अमृत-वर्षा साथ तपनेके ।
या नयनमें आ बैठे अंधेके । स्वयं भास्कर ॥ ६१ ॥
डूबनेवालेकी रक्षामें नदी आयी । गिरनेवालेके लिये धरणी आयी ।
मरनेवालेको मृत्युने ही बढ़ायी । आयू उसकी ॥ ६२ ॥
वैसे है कर्म-बद्धता । मुमुक्षुको छुड़ाती पांडुसुता ।
विष जैसे रसायन बनता । उपाय बलसे ॥ ६३ ॥
वैसे कर्म-कुशलता । देती बद्धको मुक्तता ।
बद्धको छुड़ानेमें पार्थ । आती काम ॥ ६४ ॥
ज्ञानेश्वरी ७२४