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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 811

उसके भोगके कारण । शरीर बिन अन्य स्थान ।
नहीं होनेसे अधिष्ठान । कहते शरीरको ॥ १८ ॥
यह चौबीस ही तत्वोंका । कुटुंब गृह है बस्तीका ।
छूटना है बंध मोक्षका । उलझन यहीं ॥ १९ ॥
अथवा जो हैं अवस्थात्रय । अधिष्ठान जान धनंजय ।
इसीलिये जान यह काय । कहलाता अधिष्ठान ॥ ३२० ॥
२ कर्म-सिद्धिका कारण, कर्ता=अहंकार—
तथा कर्ता यह दूसरा । कर्म कारण धनुर्धर ।
प्रतिबिंबसा है अपार । चैतन्यका जो ॥ २१ ॥
आकाशसे बरसता है नीर । उससे जो बनता सरोवर ।
तथा बिंबित होता तदाकार । आकाश जैसे ॥ २२ ॥
अथवा राजा निद्रासे भरकर । स्वयं आप विस्मृतिमें डूबकर ।
स्वप्नमें अनुभवता धनुर्धर । दरिद्री जैसे ॥ २३ ॥
वैसे अपनेको भूलकर । चैतन्य देहाकार लेकर ।
अनुभवता है देहाकार । आत्मस्वरूप ॥ २४ ॥
ऐसे ही विचारोंके कारण । प्रसिद्ध है जीव ऐसा जान ।
बंधकर वह सह तन । संपूर्ण रूपसे ॥ २५ ॥
प्रकृति करती है जो कर्म । कहता है मैंने किया सभ्रम ।
वहां यह कर्ता ऐसा नाम । लेता है जीव ॥ २६ ॥
३ कर्म-सिद्धिका कारण, विविध साधन—
होती है जो एकही वैसी । दीखती है चोरी हुईसी ।
पलकोंमेंसे दृष्टि जैसी । चवरोंके बाल ॥ २७ ॥
यह घरमें रहता एक । दीपका वह अवलोक ।
गवाक्षोंके-भेदसे अनेक । दीखता जैसे ॥ २८ ॥
वैसे बुद्धिका जानना । श्रोत्रादि भेदसे नाना ।
बाहर इंद्रियपन । होता है व्यक्त ॥ २९ ॥
७३९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग