ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवास्तवमें जब अपना । ज्ञानोदय होता अर्जुन ।
जैसे उदय-काल जान । निगलता है तारे ॥ ९६ ॥
वैसे सकारण क्रिया-जात । खो जाते हैं सहजही पार्थ ।
कर्मत्याग तब लाता नित । मोक्षका फल ॥ ९७ ॥
मोक्षका फल यह अज्ञान- । त्यागको न मिलता अर्जुन ।
इसीलिये तू त्याग न मान । जो है राजस ॥ ९८ ॥
किंतु देता है कैसा त्याग । घरमें मोक्ष-फल-भाग ।
सुन अब यह प्रसंग । कहता हूं मैं ॥ ९९ ॥
कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन ।
संगं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः ॥ ९ ॥
सात्विक-त्याग—
तब स्वाधिकारानुसार । आता जो सहज होकर ।
विधि-गौरवसे आचर । भूषण मान ॥ २०० ॥
किंतु यह मैं करता हूं ऐसे । स्मरण भी तज कर मनसे ।
फलाशा तज संपूर्ण-रूपसे । करना है जो ॥ १ ॥
किंतु अवज्ञा और कामना । माताके विषयमें अर्जुन ।
करनेसे होता है पतन । हेतु जो जैसे ॥ २ ॥
सो इन दोनोंको तजना । माता मान कर भजना ।
मुख अशुद्ध सो अर्जुन । तजना क्या गाय ॥ ३ ॥
अपने प्रिय फलमें धनुर्धर । छिलका और बीज जो असार ।
इसलिये तजते क्या फल सारा । कभी कोई ॥ ४ ॥
वैसे ही है कर्तृत्वका मद । तथा कर्म-फलका आस्वाद ।
इन दोनोंका नाम है बंध । कर्मका जो ॥ ५ ॥
कर्तव्य मानके कर्म करना जो नियोजित ।
ममत्व फलको छोड़ त्याग तू मान सात्विक ॥ ९ ॥
ज्ञानेश्वरी ७२८