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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 792

अथवा अतिथि जब आता । तब जो जो करना पडता ।
ऐसे कर्मको जानना पार्थ । नैमित्तिक कर्म ॥ ११ ॥
वर्षासे क्षुब्ध होता गगन । वसंतमें खिलता है वन ।
देहको शृंगारता यौवन । जिस भांति ॥ १२ ॥
या सोमकांत सोम स्रवता । सूर्यसे है कमल खिलता ।
मूलमें जो था वही विकसता । जैसे यहां ॥ १३ ॥
वैसे नित्यका जो होता कर्म । वही नैमित्तिक यह नियम ।
जब वह दृढ-सा होता नाम । नैमित्तिक ॥ १४ ॥
तथा सायं प्रात और मध्यान्ह । करना होता जो प्रतिदिन ।
जैसी दृष्टि होती है लोचन-। को नहीं भारी ॥ १५ ॥
नहीं आती है जिस भांति गति । चरणोंमें वह सहज होती ।
अथवा दीपमें होती है दीप्ति । पांडुकुमार ॥ १६ ॥
बिन पुटके जैसे चंदन । सुगंध देता है निशिदिन ।
अधिकारका वैसे अर्जुन । वही है रूप ॥ १७ ॥
नित्य-कर्म ऐसे है जन । बोलते हैं वह तू जान ।
नित्य-नैमित्तिक अर्जुन । दिखाये ऐसे ॥ १८ ॥
यही है नित्य नैमित्तिक । करना है जो आवश्यक ।
इसीलिये कहते देख । निष्फल इसको ॥ १९ ॥
किंतु जैसे भोजनमें सतत । भूख मिटकर होता तृप्त ।
वैसे नित्य-नैमित्तिकका पार्थ । अंगभूत है फल ॥ १२० ॥
हीन कस सोना आगमें पड़ता । हीनता तज कर तेज चढ़ता ।
इन कर्मोंका वैसा ही फल होता । जानना यहां ॥ २१ ॥
इससे दोष सब मिटते । स्वाधिकार सतत बढ़ते ।
तथा सद्गति ओर बढ़ते । अहर्निश ॥ २२ ॥
इतना यह सब रसाल । नित्य-नैमित्तिकका है फल ।
किंतु तजते मूलका बल । वैसे तजना इसे ॥ २३ ॥
ज्ञानेश्वरी ७२०