ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 805, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंइस कर्म-फलसे बद्ध और मुक्तता—
ऐसे इसके त्रिविध भागमें । कर्म-फल रचा जगतमें ।
फंसे हैं जो भोगकी आशामें । उससे वे हैं बद्ध ॥ ४८ ॥
जिव्हा-चापल्य जैसे बढ़ता । वैसे भोजन मीठा लगता ।
अंतमें जो फल निकलता । रोगसे मृत्यु ॥ ४९ ॥
चोर-मैत्री तब तक भली । जब न आती एकांत-स्थली ।
वैसे होती है वेश्या भी भली । न होता स्पर्श ॥ २५० ॥
जब तक करता कर्म शरीर । मिलता जाता सन्मान धनुर्धर ।
मृत्यु समयमें घिरते आकर । कर्मके फल ॥ ५१ ॥
समर्थ होता जो महाजन । द्वारपे बैठ ले जाता धन ।
वैसे ही कर्म-फल अर्जुन । भोगने पड़ते ॥ ५२ ॥
भुट्टेसे जैसे धान झड़ता । उसी धानसे भुट्टा लगता ।
फिर भुट्टेसे धान गिरता । उससे फिर भुट्टा ॥ ५३ ॥
वैसे जो भोगसे कर्म होता । उस कर्ममें भोग लगता ।
पैर पैरको जीतता जाता । चलनेमें जैसे ॥ ५४ ॥
नांव रुकती उतार देखकर । होता वह उसका उरला तीर ।
वैसे है कर्म-फलसे धनुर्धर । नहीं है मुक्ति ॥ ५५ ॥
साध्य-साधन प्रकार फिर । करता फल-भोग प्रसार ।
ऐसे ही उलझाता संसार । अत्यागीको ॥ ५६ ॥
चमेली पुष्पका जैसे खिलना । उसका नाम ही है सूख जाना ।
वैसे फलाशासे नहीं करना । किया है ऐसे ॥ ५७ ॥
बीजका धान्य ही जब खाया जाता । किसानीका काम ही है रुकता ।
वैसे फल-त्यागसे है मिटता । कर्मका फल ॥ ५८ ॥
तब सत्व-शुद्धिके सहायसे । गुरु-कृपामृतके तुषारोंसे ।
उतरता खिले हुए बोधसे । द्वैतदैन्य ॥ ५९ ॥
तब है जगदाभासके कारण । मिटता है त्रिविध फल स्फुरण ।
वैसे ही भोक्ता-भोग्य सहज मान । होता है अस्त ॥ २६० ॥
७३३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग