ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइन दोनोंके विषयोंका जब । पिता-पुत्रका संबंध-सा सब ।
कर्तव्य मान निभाते हैं तब । बद्ध न होता कर्म ॥ ६ ॥
अजी ! यह है त्याग तरुवर । मोक्ष फल देता है धनुर्धर ।
सात्विक ऐसे हैं जो मशहूर । विश्वमें सब ॥ ७ ॥
जलकर बीज जैसे । होता है निर्वंश वैसे ।
फल तज कर्म वैसे । तजा मान ॥ ८ ॥
पारसका स्पर्श जब होता । लोहका जंग मल मिटता ।
चित्तका रज-तम मिटता । सत्वसे ऐसे ॥ ९ ॥
फिर वह शुद्ध सत्व-गुण । खोलता आत्म-बोध नयन ।
मृग-जल त्रास जो अर्जुन । मिटता सांझमें जैसे ॥ २१० ॥
बुद्धि आदिके सम्मुख जैसे । रहता है विश्वाभास वैसे ।
न देख सकेंगे कोई जैसे । कभी गगन ॥ ११ ॥
न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते ।
त्यागी सत्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः ॥ १० ॥
समदृष्टिसे कर्म करना—
आदि यदि प्रारब्ध बलसे । शुभ अशुभ कर्म जो वैसे ।
लय होते आकाशमें जैसे । बादल सारे ॥ १२ ॥
सदा जैसे उसकी दृष्टिसे । कर्म होते ब्रह्म-रूप वैसे ।
इसी लिये है सुख-दुःखसे । होता अछूता ॥ १३ ॥
जिसे शुभ-कर्म जानता । उसको हर्षसे करता ।
जिसको अशुभ मानता । उससे नहीं द्वेष ॥ १४ ॥
इस विषयमें उसको कहीं । संदेहका कभी काम भी नहीं ।
जैसे स्वप्नका सुख दुःख नहीं । जगने पर ॥ १५ ॥
शुभ अशुभ कर्मोंसे न रखे राग-द्वेष जो ।
सत्वमें जो पगा त्यागी ज्ञानसे छेद संशय ॥ १० ॥
७२९ सार्थ गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद योग