ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्यागवृत्तिका रहस्य, संन्यास और त्यागका फल—
वन सारा खिल उठता । आम्र-वृक्ष भी महकता ।
न छूकर ही छोड़ जाता । वसंत जैसे ॥ २४ ॥
वैसे न कर कर्म-सीमा उल्लंघन । सदा कर नित्य-नैमित्तिकाचरण ।
तजना उसकी फल-आशा संपूर्ण । उच्छिष्ट जैसे ॥ २५ ॥
कर्म-फलका जो यही त्याग । ज्ञानियोंसे कहलाता त्याग ।
वैसे संन्यास और त्याग । कहा है तुझसे ॥ २६ ॥
जब यह संन्यास संभवता । काम्य-कर्म नहीं बांध सकता ।
निषिद्ध स्वभावसे छूट जाता । जो है निषिद्ध ॥ २७ ॥
तथा जो नित्यादिक होता । फल-त्यागसे है नाशता ।
जैसे अवयवोंका होता । सिर काटनेसे ॥ २८ ॥
फल पाकसे सस्य सूखता । वैसे सब कर्म है छूटता ।
आपसे आप खोजता आता । आत्म-ज्ञान ॥ २९ ॥
इस भांति यह दो अर्जुन । त्याग संन्यासका आचरण ।
देते हैं हृदय-सिंहासन । आत्म ज्ञानको ॥ १३० ॥
कर्म-त्यागकी यह कुशलता । छूट कर कर्मका त्याग जब होता ।
उस त्यागसे त्यागी है फंसता । जालमें अधिक ॥ ३१ ॥
नहीं करके रोगका निदान । औषध दिया विष होता जान ।
भूखके समय न खाया अन्न । ने मारती क्या भूख ॥ ३२ ॥
त्याग करना जहां नहीं उचित । वहां त्याग करना अनुपयुक्त ।
तथा जिसका त्यागना है उचित । नहीं करना लोभ ॥ ३३ ॥
त्यागका यह मर्म भूलकर । बना लेते हैं त्यागका भी भार ।
नहीं देखते वहां धनुर्धर । कभी वीतराग ॥ ३४ ॥
(85) ७२१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद योग