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धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press

सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished98 पृष्ठ

द्वितीय भाग: मंगल, बसंत, चांचर, हिंडोला एवं अमर आरती उपसंहार

मंगल ४३
का भे बात बनाये, परचे नहिँ पीव सोँ।
अंतर का बदफैल, फैल गै जीव सोँ ॥५॥
कहैँ कबीर पुकारि, सुनो धर्म आगरा।
बहुत हंस लै साथ, उतरो भव सागरा ॥६॥
॥ शब्द ८ ॥
पढ़ सुगना सत नाम, बैठ तन ताख में।
चार दिना का रंग, मिलै तन खाक में ॥१॥
लावहु तेल फुलेल, काया है चाम की।
अ्र्द गर्द मिलि जाय, दोहाई सत नाम की ॥२॥
नीब न मीठी होय, सींचे गुड़ घीव से।
जा कर जौन सुभाव, छुटै नहिँ जीव से ॥३॥
जहाँ सौदागर होय, तहाँ कछु भाखिये।
बिन गाहक बिन मोल, बस्तु ना खोलिये ॥४॥
चौमुख दीपक बारि, महल बिच सोइये।
नौ नारी से नेह, अकि छिन रोइये ॥५॥
चेतहु संत सुजान, तो जम से रड़ि है।
काल के हाथ गुलेल, तड़ाका मारिहै ॥६॥
धरती है मस्तूल, तंबु असमान है।
नौ लख जरत मसाल, सीढ़ी बंकनाल है ॥७॥
आगम कहैँ कबीर, सुनो धर्म आगरा।
बहुत हंस लेइ साथ, उतरो भव सागरा ॥८॥
॥ शब्द ९ ॥
चढ़ि अमवा की डारि, अकेली धन का रे खड़ी।
चले जाव मुरुख गँवार, मोरी तोहि का रे पड़ी।

४४ मंगल

की तोरी सासू दारुनिया, की नैहर दूर बसै ।
की तोरे पिय परदेस, जोहत वा की बाट खड़ी ॥२॥
ना मोरी सासू दारुनिया, न नैहर दूर बसै ।
हमरे बलम परदेस, जोहत वा की बाट खड़ी ॥३॥
पचरँग पहिरु चुनरिया, ऊपर धरो आरसी ।
सतगुरु संग सुजान, समुझै मोर पारसी ॥४॥
यह मंगल सतलोक, हंस जन गावहीँ ।
कहैं कबीर धर्मदास, प्रेम पद पावहीँ ॥५॥

॥ शब्द १० ॥
चढ़ि नौरँगिया की डार, कोइलिया बोलै हो ।
अगम महल चढ़ि चलो, जहाँ पिय से मिलो ॥१॥
मिलि चलो आपन देस, जहाँ छबि छाजई ।
`त सब्द जहाँ खिले, हंस होइ आवही ॥२॥
्य बस्तु मिलि जाय, सब्द टकसार हो ।
हुँ दिस लागी झलरिया, तो लोक असंख हो ॥३॥
ंबु दीप एक देस, पुरुष जहँ रहहि हो ।
हैं कबीर धर्मदास, बिछुरन नहिँ होइ हो ॥४॥

॥ शब्द ११ ॥
साहेब पतिया पठाये, सो हंसा बाँचे हो ।
पाती बाँचि घर जावो, पुरुष के पासे हो ॥१॥
मन रंग पालान, सुरति की काठी हो ।
अनहद सब्द सवार, अनँत कला सोभा हो ॥२॥
कामिनि करहि सिंगार, हंसा सुनु बानी हो ।
आवो पलँग चढ़ि बैठो, तो दरसन देहु हो ॥३॥

हंसा सब्द बिदेह, रूप नहिँ रेखा हो ।
कामिनि रहत लजाय, सोभा निजु देखा हो ॥४॥
धर्मराय उठि बोले, हंसा सुनि लेहु हो ।
कहँ को कियो है पयान, सो कहो समुझाइ हो ॥५॥
तब हंसा अस बोले, सुनो धर्मराय हो ।
पाये पुरुष के पान, तौ लोक के जाइब हो ॥६॥
तब धर्मराय पुनि बोले, हंसा सुनि लेहु हो ।
जाहु पुरुष के पास, सीस पगु देहु हो ॥७॥
मानसरोवर ताल, जहाँ अमी सागर हो ।
हंसा करै बिसराम, तो अग उजागर हो ॥८॥
अमर लोक एक दीप, तो सोभा सुहेल हो ।
तहँ हंसन कै बास, सुरति मिलि खेलै हो ॥६॥
अनहद धाम अचिंत, पुरुष जहँ छाजै हो ।
अमर लोक निज धाम, हंसन कै देसा हो ॥१०॥
कहैं कबीर पुकारि, सुनो धर्मदासा हो ।
वह तो अगम अगाध, पहुँचे कोइ हंसा हो ॥११॥
॥ शब्द १२ ॥
सूतल रहलौँ मैं सखियाँ, तो बिष कर आगर हो ।
सतगुरु दिहलैँ जगाइ, पायौँ सुख सागर हो ॥१॥
जब रहली जननी के ओदर१, परन सम्हारल हो ।
जब लौं तन में प्रान, न तोहि बिसराइब हो ॥२॥
एक बुंद से साहेब, मँदिल बनावल हो ।
बिना नैंव कै मंदिल, बहु कल लागल हो ॥३॥
(१) मा के पेट यानी गर्भ में ।

४६ मंगल
इहवाँ गाँव न ठाँव, नहीँ पुर पाटन हो।
नाहिन बाट बटोही, नहीँ हित आपन हो ॥४॥
सेमर है संसार, सुवा उधराइल हो।
सुंदर भक्ति अनूप, चले पछिताइल हो ॥५॥
नदी बहै अगम अपार, पार कस पाइब हो।
सतगुरु बैठे मुख मोरि, काहि गोहराइब हो ॥६॥
सत्तनाम गुन गाइब, सत ना डोलाइब हो।
कहैँ कबीर धर्मदास, अमर घर पाइब हो ॥७॥
॥ शब्द १३ ॥
धनुष बान लिये ठाढ़, जोगिनि एक माया हो।
छिनहिं में करत बिगार, तनिक नहिं दाया हो ॥१॥
फिर फिर बहै बयार, प्रेम रस डोलै हो।
चढ़ि नौरँगिया की डार, कोइलिया बोलै हो ॥२॥
पिया पिया करत पुकार, पिया नहिँ आया हो।
पिय बिनु सून मँदिलवा, बोलन लागे कागा हो ॥३॥
कागा हो तुम का रे, कियो बटवारा१ हो।
पिया मिलने की आस, बहुरि ना छूटहि हो ॥४॥
कहैँ कबीर धर्मदास, गुरू सँग चेला हो।
हिलि मिलि करो सतसंग, उतरि चलो पारा हो ॥५॥
॥ शब्द १४ ॥
सखि अनहद धाम निवास, सो देखो ये घड़ी।
तहँ पहुँचे कोइ दास, सो देखो० ॥ १ ॥
सुख कोइ एक सर हंस, सो देखो० ।
परखि गहो निज नाम, सो देखो० ॥ २ ॥
१) चारह बाट यानी बेठिकाने या इधर उधर।

मंगल ४७
जन्म जन्म दुख मिटे, सो देखो०।
लइ राखो निज धाम, सो देखो० ॥ ३ ॥
अक्षय वृक्ष के डहर समाय, सो देखो० ।
सत्त नाम परताप, सो देखो० ॥ ४ ॥
हंसा निज घर चले, सो देखो० ।
काल रहा मुरझाय, सो देखो० ॥ ५ ॥
अधर दुलीचा अमर पद, सो देखो० ।
सतगुरु दिया बिछाय, सो देखो० ॥ ६ ॥
धर्मनि मिले कबीर, सो देखो० ।
हिलि मिलि करहि कलोल, सो देखो० ॥ ७ ॥
॥ शब्द १५ ॥
गुन कर बौरी, जब लौं नैहर माहिँ हो ।
फिरि जैहौ ससुरारि, पिया के पास हो ॥ १ ॥
जब लगि राज पिया कर, तू सुख करि ले हो ।
सासु ननदिया दारुन, उत्तर जनि देहु हो ॥ २ ॥
सतगुरु डोलिया फँदावल, लगे चार कहार हो ।
आगे चलै मोर साहेब, पाछे चालनहार हो ॥ ३ ॥
जाइ उतारे वोहि देसवाँ, जहँ दिस न दुवार हो ।
मोतियन चुनि घर बने, हीरा लगे किवार हो ॥ ४ ॥
चंद्र लगन मोर अँचरा, सुरज लगन मोर देँह हो ।
हद्दे लगन मोरा साहेब, जहँ लगि फैले दृष्टि हो ॥ ५ ॥
मन मन बिहसै दुलहिनि, अमर बर पाये हो ।
साहेब कबीर कै दिहल, सुनि ले धर्मदास हो ॥ ६ ॥

हो ॥ १ ॥
Line 4: घटहि में मानसरोवर, घाट बँधावो हो ।
Line 5: घटहि में पाँच कहार, दूलह नहवावहिँ हो ॥ २ ॥
Line 6: घटहि में नेह नउनिया, तो चरन पखारहिँ हो ।
Line 7: प्रेम प्रीत के ललना, तो पलना झुलावहिँ हो ॥ ३ ॥
Line 8: घटहि में दया के दरजी, तो दरज मिलावहिँ हो ।
Line 9: पाँच तत्त के जामा, दुलह पहिरावहिँ हो ॥ ४ ॥
Line 10: घटहि में लोह लोहार, तो कँगना डावहिँ१ हो ।
Line 11: तीन गुनन के सेहरा, दुलह पहिरावहिँ हो ॥ ५ ॥
Line 12: घटहि में चंदन चौक, तो चौक पुरावहिँ हो ।
Line 13: सत्त सुकृत को कलसा, तहाँ धरावहिँ हो ॥ ६ ॥
Line 14: घटहि में मन सत माली, तो मौर ले आवहि हो ।
Line 15: घटहि में जुगति कै जौहरि, जोत पहिरावहि हो ॥ ७ ॥
Line 16: घटहि सोहंगम नारि, तो पिय को रिझावहि हो ।
Line 17: बार बार गुरु झगरि, तो अरज सुनावहि हो ॥ ८ ॥
Wait

मंगल ४९
बाम्हन बेगि पठावो मोरे बाबा,
देखि आवै वोहि देस हो।
रबि ससि तारा दिवस न रजनी,
बसै अलख अलबेल हो ॥ २ ॥
कर पगु पीठ पेट नहिँ काया,
हम से कहा न जात हो।
अस बर लिखा लिलार हमारे,
बाम्हन कहु तहँ जाइ हो ॥ ३ ॥
बंध झलरिया बेंदी झलकै,
चंद सुरज के पार हो।
मानिक दियना तहवाँ झलकै,
जगमग जोति अपार हो ॥ ४ ॥
बिना सुरत संसारहि निरखै,
बिन मुख बोलनहार हो।
स्त्रवन नैन बिनु सुनै औ देखै,
आसन अधर अधार हो ॥ ५ ॥
प्रेम प्रीत से खंभ गड़ावो,
गैबी अलँब१ बिछावो हो।
कनक कलस धरि मंगल गावो,
मोतियन झालरि लांव हो ॥ ६ ॥
दुलहिनि दुलहा ब्याहन आये,
भये दोऊ एक ठौर हो।
भया बियाह उछाह परम पद,
भये उर सत्त उचार हो ॥ ७ ॥
(१) सहारा, भरोसा।

मंगल
पाये सोहाग माँग भर सेँदुर,
नखसिख सोरहौ सिंगार हो।
फूल जड़ित रतनन से राजित१,
बेंदी झलकै लिलार हो॥८॥
सुखमनि पलँग बिछावो सखियाँ,
पद्मन धुनि झनकार हो।
अब का सोवो उठि जागो धनियाँ,
आखिर करो सम्हार हो॥६॥
बिनति करूँ मैं चरन कँवल में,
सुनो मोरे प्रान-नाथ हो।
धरमदास के सतगुरु समरथ,
तोहरे हाथ निबाह हो॥१०॥
॥शब्द १८॥
हमरा बियाह करो मोरे बाबा,
तुम सौं नाहिं निबाह हो।
जिन के नाहिं रूप औ रेखा,
उन से हमरो बियाह हो॥१॥
आवे न जाय मरै ना जीये,
सो बर खोजो जाई हो।
बूढ़ न बार तरुन नहिं चेलिक२,
वा को तिलक लगाई हो॥२॥
गगन मँदिल वह गढ़ मोरे बाबा,
अरध उरध के बीच हो।
पवन बराती ब्याहन आये,
मान करो सनमान हो॥३॥
(१) शोभित। (२) नौजवान।

तिरबेनी से नीर मँगावो,
अलख बृच्छ कै डार हो ।
सत्त सुकृत कै कलस धराबो,
पूजो पाँव हमार हो ॥ ४ ॥
तिरगुन सेँदुरा मँगावो मोरे बाबा,
पिय से माँग भराइ हो ।
सतगुरु बिप्र के चरन पखारो,
जुग जुग रहै सोहाग हो ॥ ५ ॥
सब्द सुरत से गाँठ जुरावो,
माँड़ो राखो छाइ हो ।
पाँच भँवरिया घुमावो मोरे बाबा,
गँठिया देवो निबुकाइ हो ॥ ६ ॥
चाँद सुरज दोउ कोहबर बाबा,
पाँजी¹ दसो दुवार हो ।
ऊँच दुवारी निहारो सखियाँ,
निहुरि कै घर को जाहु हो ॥ ७ ॥
ज्ञान कै डोलिया फँदावो मोरे बाबा,
करि देवो बिदा हमार हो ।
धरमदास से छूटल सब सागर,
सब सौँ भेंटि अकवार हो ॥ ८ ॥

॥ शब्द १९ ॥
चलो सखि देखन चलिये, दुलह कबीर हैं ।
उन सौँ जुरल सनेह, जठर सौँ राखिहैं ॥ टेक ॥


(१) रास्ता ।

५२ मंगल
पाँच तत्त को बासा, त्यागो बेगि कै।
छाँड़ो मिलि मिलि नेह, पुरुष गम राखि कै ॥ १ ॥
लाँघो औघट घाट, पंथ निज ताकि कै।
गहो सुकृत निज डोर, अगम गम राखि कै ॥ २ ॥
चार कोस आकास, तहाँ चढ़ि देखिये।
आगे मारग झीनि, तो सुरत बिबेकिये ॥ ३ ॥
मुकुट एक अनूप, छत्र सिर साजिहै।
दुरत अग्र को चौँर, सब्द धुनि गाजिहै ॥ ४ ॥
सेत धुजा फहराय, अँवर तहँ गूँजहीँ।
नितहिँ उठै झनकार, गगन घनघोरहीँ ॥ ५ ॥
कहैँ कबीर धर्मदास सोँ, मूल उचारिये।
अगम गम्य बताइ कै, हंस उबारिये ॥ ६ ॥
॥ शब्द २० ॥
[ प्रश्नोत्तर ]
सत्त सुकृत सतनाम, सो आदि मनाइये।
लीजै साहेब को नाम, प्रेम पद पाइये ॥ १ ॥
सुरति नहीँ बिलगाइ, तो मुक्ती होइ हो।
चलो हंसा वहि देस, बसै जहँ पीव हो ॥ २ ॥
चाँद सुरज के पूरब१, हंसा पच्छिम हो।
वोहि देसवाँ मत जाव, बसै जहँ पंछी२ हो ॥ ३ ॥
चाँद सुरज के दक्खिन, हंसा उत्तर हो।
खोलो मुक्ति दुवार, उतरि चलो पार हो ॥ ४ ॥
तीन सै साठ कड़िहार३, काल जम जार हो।
उन के वार जनि भूलो, भवसागर धार हो ॥ ५ ॥
(१) ऊपर । (२) शरीर-बद्ध जीव । (३) मल्लाह ।

५३
मंगल
बिहसैँ सब सखियाँ, तो रानी१ मनाइहै।
रानी देहु बकसीस, हंसा गहि आनौं हो ॥ ६ ॥
[रानी]–जो तुम सखियाँ सयानी, हंसा गहि आनो हो।
सात दीप नौ खंड की, रानी कहावौँ हो ॥ ७ ॥
[सखी]–हो हंसा तुम ठाढ़, कहाँ को जाइब हो।
सात दीप नौ खंड की, रानी छाँड़ि हो ॥ ८ ॥
[हंस]–सात दीप नौ खंड बसै, बकबादिन हो।
ठाकुर२ मति के हीन, कर्म बस बाँधा हो ॥ ९ ॥
स्याम रंग पहिराव, कुसुम रंग सारी हो।
मानो मेघ घन गरजि, उमँगि दल बादल हो ॥१०॥
चलि जाहु नारि गँवारि, तुँ जगत पियारी हो।
चित्रगुप्त दुर्ग३ दानी की, रहो दुलारी हो ॥११॥
[सखी]-हो हंसा तुम ठाढ़, कहाँ के जाइब हो।
सन्मुख होइ कै देखो, तो करहुँ जवाब हो ॥१२॥
स्याम रंग पहिराव, कुसुम रंग चुनरी हो।
कठिन कला छबि झलकै, तौ काल दुलारी हो ॥१३॥
मैं तोहि पूछौँ हंसा, कहाँ तोरे बाप हो।
हम से कहो समझाय, कहा करे पाप हो ॥१४॥
[हंस]--सत साहेब जो पिता, तो सतगुरु माता हो।
चित्रगुप्त दुर्गदानी, सो येहि बिधि जाता हो ॥१५॥
सब सखि माथ नवायो, तो हंसा चलि भे हो।
आगे मिले धर्मराय, काल सिर नाये हो ॥१६॥
(१) रानी से मतलब माया और सखियों से माया की शक्तियाँ।
(२) काल। (३) दुर्ग=कठिन। दुर्ग-दानी नाम काल का है।

५४ बधावा
अचिंत पुरुष को मंगल, हंसा गावै हो।
कहैं कबीर धरमदास, अमर पद पावै हो॥१७॥
———
॥ बधावा ॥
॥ शब्द १ ॥
पधारो साहेब पाहुना, मोरे मन में बहुत आनंद ॥ टेक ॥
सखि का से पोताओँ अँगना, का से पोताओँ चौक ॥ १ ॥
चंदन पोताओँ अँगना, गजमोतियन पुराओँ चौक ॥ २ ॥
सखि आँगन बोओँ लायची, मोरे फलसी नागर बेल ।
पधारो साहेब पाहुना ॥ ३ ॥
ऊँची चढ़ कर जोवती, साहेब का रथ केती दूर ॥ ४ ॥
ऊँची लहर समुद्र की, तल बहै जमुना का नीर ॥ ५ ॥
भलि भई साहेब आइया, बाजत अनहद घोर ॥ ६ ॥
कनक सिंहासन बैठका, ओढ़न अंबर चीर ॥ ७ ॥
सखि भवसागर हेरिया, लह्यो सुख सागर तीर ॥ ८ ॥
धरमदास की बीनती, मोहिँ मिलियो साहेब कबीर ॥ ६ ॥
॥ शब्द २ ॥
बधावा संत सजाऊँ हो ।
जा बिधि सतगुरु मेहर करें, सोई बिधि लाऊँ हो ॥ टेक ॥
रतन पटोरा¹ डारि पाँवड़ा², सन्मुख जाऊँ हो ।
सब सखियाँ मिलि बाँटत बधाई, मंगल गाऊँ हो ॥ १ ॥
घसि घसि चंदन अँगना लिपाऊँ, चौक पुराऊँ हो ।
मेवा नरियर पान मिठाई, संजम सबै मँगाऊँ हो ॥ २ ॥
(१) कपडा । (२) क़ालीन या बढ़िया कपड़ा जो बड़े आदमियों के चलने के
लिये बिछाया जाता है ।

बधावा ५५
खीर खाँड़ घृत अमृत भोजन, संत जिमाऊँ हो ।
चरन धोइ चरनामृत लेऊँ, सीस नवाऊँ हो ॥ ३ ॥
अब मोरे साहेब तखत बिराजैँ, आरति लाऊँ हो ।
पान पर्वान दया से पाऊँ, सब मिलि गाऊँ हो ॥ ४ ॥
अब मोरे सतगुरु पलँग पधारैँ, चरन दबाऊँ हो ।
धरमदास याही बिधि करि, सतलोक सिधाऊँ हो ॥ ५ ॥
॥ शब्द ३ ॥
साहेब सतगुरु घर आया हो ।
अँगना मोर जगमग भया, सुख सम्पति लाया हो ॥ १ ॥
आधि¹ गई मेरी हे सखी, आज सज्जन पाया हो ।
धन्य बिधाता लेख लिखा, निज भाग जगाया हो ॥ २ ॥
कोमल बचन अँग दया घनेरी, कल्प वृच्छ की छाया हो ।
धन जननी अस संत जिन जाया, अनँद बधाया हो ॥ ३ ॥
जप तप नेम धर्म बहु कीन्हा, रसना नामहिँ गाया हो ।
धरमदास सतगुरु सतसँग से, छिन मेँ परम पद पाया हो ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४ ॥
सतगुरु आये द्वार, मन मेँ बजत बधाइया ।
सतगुरु साहेब दीन-दयाला, द्वारे मोरे आइया ।
जुगन जुगन के करम मिटत भे, सतगुरु दरस दिखाइया ॥ १ ॥
प्रेम सुरत की करी रसोई, ब्यंजन² आसन लाइया ।
जेँवन बैठे सतगुरु साहेब, अधर से चौँर डोलाइया ॥ २ ॥
दया भाव के पलँग बिछाये, प्रेम दुलीचा लाइया ।
ता पर सोये सतगुरु साहेब, सुरति कै तेल लगाइया ॥ ३ ॥
(१) मानसी दुःख; चिन्ता । (२) भोजन ।

५६ बधावा
धरमदास बिनवै कर जोरी, सुनिये समरथ साँइया।
साहेब कबीर प्रभु मिले बिदेही, झीना दरस दिखाइया॥ ४ ॥
॥ शब्द ५ ॥
आज आनंद भये मेरे घर, निरगुन संत पधारे हो ॥ टेक ॥
घसि घसि चंदन अँगना लीपाओँ, गजमोतियन चौक पुराओ हो ॥ १ ॥
कनक रतन का कलस मँगाओँ, हीरा जड़ाव की झारी हो ॥ २ ॥
सतगुरु तो सिंहासन बैठे, सब्द का चँवर ढुँराओँ हो ॥ ३ ॥
धरमदास की अरज गोसाँईं, मंगलचार नित्त गाओँ हो ॥ ४ ॥
॥ शब्द ६ ॥
मोरे आये संत सनेही, धन धन घड़ी आज की हो ॥ टेक ॥
अतर फुलेल न्हवावोँ सजनी, केसरि तिलक लगाओँ हो ॥ १ ॥
धूप दीप नैबेद आरती, फूल माल पहिराओँ हो ॥ २ ॥
जिनके दरस होय सब काजा, तरसैं राना राजा हो ॥ ३ ॥
सत्त सब्द जहँ होय प्रकासा, अस कबीर धर्मदासा हो ॥ ४ ॥
॥ शब्द ७ ॥
आज घर आये साहेब मोर ॥ टेक ॥
हुलसि हुलसि धन अँगना बुहारे, मोतियन चौक पुराई ॥ १ ॥
चरन धोय चरनामृत लीन्हा, सिंहासन बैठाई ॥ २ ॥
पाँच सखी मिलि मंगल गावैँ, सब्द में सुरति समाई ॥ ३ ॥
बाँधोगढ़ कै आमिन१ बिनवै, धनि हो कबीर गोसाँईँ ॥ ४ ॥
(१) धर्मदासजी की स्त्री का नाम।

barahmaasa ५

॥ बारहमासा ॥
धर सत्य पुरुष का ध्यान, तुम्हारी पूरन है आसा ॥ टेक
पिरथम मास असाढ़ जो लागे, सोधो काया को ।
बाहर दृष्ट कहाँ सो आया, भीतर छाया को ॥
पंच का नगर बसाया को ।
नख सिख से रचि नैन नासिका, इसे बनाया को ॥
उसी का खोज करो बाला ॥ १ ॥
सावन सार नाम निज जपि ले, यह जप अपने से ।
कर नहिँ हलै न डोलै जिभ्या, सोहं जपने से ॥
काल नहिँ ब्यापै सुषमनि से ।
इँगल पिंगल के मारग की, तुम डोर गहो मन से ।
नाम सोहंग जपो स्वाँसा ॥ २ ॥
भादौँ भर्म मेटि सतगुरु की सेवा कछु करना ।
गगन गुफा के मारग को, तुम धीरज से चढ़ना ॥
केवाड़े द्वादस हैं लागे ।
बैकुंठ पुरी में दसम द्वार है, तहाँ जोति जागे ॥
वहाँ नहिँ लगै काल फाँसा ॥ ३ ॥
कार सुमति बृजराज, कोई जन अंतर ध्यान धरै ।
नाभि कँवल में सुरति लगावै, आतम नजर परै ॥
झलकवै दसम दुवारे में ।
अगम अगोचर पुर्ष अबिनासी, सुन्न अटारी में ॥
वहाँ नहिँ लगै भूख प्यासा ॥ ४ ॥
कातिक षष्ट कँवल दल भीतर, अगम जोति दरसै ।
चमकै बिजुली मेघ जो गरजै, अमृत जल वरसै ॥

५८ बारहमासा

बिना दल बादल झनकारा ।
उलटि पवन के नीचे होई, बहै अमृत धारा ॥
वहाँ नहिँ लागै भौ फाँसा ॥ ५ ॥
अगहन आसा लगी हमारी, गगन गुफा माहीं ।
बज्र केवारे लगे द्वार मेँ, सहज खुलैँ नाहीं ॥
जहाँ कछु हिकमत का काजा ।
उलटि पवन कै ठोकर मारो, खोलो दरवाजा ॥
तिन्हाँ का छूटै जम त्रासा ॥ ६ ॥
पूस मास मेँ पिया आपना, खोज करो भाई ।
जनम जनम के संसय तुम्हरे, सबै छूटि जाई ॥
लखो घट बीच पिया छाया ।
सतगुरु पूरे किरपा करिके, हमको बतलाया ॥
किया मोरे बैरियन को नासा ॥ ७ ॥
लागत माघ अगम की बानी, सुनो संत प्यारे ।
भर्म जाल भौसागर से तुम, रहो सदा न्यारे ॥
गगन मेँ अनहद बाजत है ।
सुन्न महल के भीतर मेँ, सिव सक्ति बिराजत है ॥
बने वहँ खूबहि कैलासा ॥ ८ ॥
फागुन फाँस लगै नहिँ जम की, गहौ नाम डोरी ।
पाँच चोर बसे काया माहीं, करत सदा चोरी ॥
कोई की हाँक नहीँ मानैँ ।
नर नारी औ देवी देवा, सब को भरमाने ॥
काया में साँच करौ बासा ॥ ६ ॥
चैत चित्त के मारग को, तुम खोजो दिन राती ।
सुन्न महल मेँ दीपक बारो, बिना तेल बाती ॥

वसंत और होली ५९
दरस कोइ साधू जन पावै ।
षट चक्कर कै खोल केवारा, ऊपर चढ़ि जावै ॥
तहाँ है जगर मगर हंसा ॥ १० ॥
बैसाख बात कोइ मोरी मानि ले, सब से छोट रहना ।
भला बुरा मत कहो केहू को, भला बुरा सहना ॥
भला तुम छाँड़ि बड़ाई को ।
तामस खीस मत करो जगत में, यह भाव संतन को ॥
बनो तुम दासन के दासा ॥ ११ ॥
जेठ जागती जोति की महिमा, परखो संत सुजान ।
अजपा जाप जपो सोहंगम, पावो पद निरबान ॥
सब्द धुन पाँचो लौ लावो ।
गुरु कबीर किरपा तैं धर्मन, गुन बारह मास गावो ॥
जिन्हों का ज्ञान नगर बासा ॥ १२ ॥
॥ बसंत और होली ॥
॥ बसंत ॥
प्यारे कंत से मिलि खेलौ बिमल बसंत ।
खोलो अँधेरी कोठरी, मन बैठौ महल एकांत ॥ टेक ॥
गगन मंदिल दीपक धरो हो, भवन करौ उँजियार ।
छैल छबीले कब मिलिहैं, मोर जीवन प्रान अधार ॥ १ ॥
गंगा जमुना सरसुती हो, चंद सूर के बीच ।
अर्ध ऊर्ध के मध्य में हो, अमी अरगजा कीच ॥ २ ॥
बिन पग नटवा निरत करत हैं, बिन कर बाजै ताल ।
बिना नयन छबि देखनी हो, बिन सरवन झनकार ॥ ३ ॥

६० बसंत और होली
सहस सुरंगी रमि रहा हो, हिलि मिलि एकै ठाँव ।
धर्मनि भेंटे भाव से हो, साहेब कबीर के पाँव ॥ ४ ॥
॥ होली १ ॥
हमरी उमिरिया होरी खेलन की,
पिय मोसों मिलि के बिछुरि गयो हो ॥ १ ॥
पिय हमरे हम पिय की पियारी,
पिय बिच अंतर परि गयो हो ॥ २ ॥
पिया मिलैं तब जियौं मोरी सजनी,
पिया बिन जियरा निकरि गयो हो ॥ ३ ॥
इत गोकुल उत मथुरा नगरी,
बीच डगर पिय मिलि गयो हो ॥ ४ ॥
धरमदास बिरहिनि पिय पावै,
चरन कँवल चित गहि रहो हो ॥ ५ ॥
॥ होली २ ॥
होरी खेलो सयानी, फागुन की ऋतु आनी ॥ टेक ॥
मनुषा जनम बहुरि ना पैहो, साखी बेद पुरानी ।
फिर पाछे पछिताहुगी सजनी, परिहौ चौरासी खानी ।
फिरौ जुग जुग भटकानी ॥ १ ॥
सील संतोष कै केसर घोरी, छिरकत पिय रुचि मानी ।
आतम नारि करत न्यौछावर, तन मन धनहिँ लुटानी ।
अब पिया के मन मानी ॥ २ ॥
बाजत ताल मृदंग झाँझ डफ, अनहद घोर निसानी ।
पाँच पचीस लिये सँग अबला, गगन में धूम मचानी ।
उठै सुर बारहवानी ॥ ३ ॥

बसंत और होली ६१
गगन गली मेँ छैँके अबिनासी, मगन भई मुसुकानी ।
भक्ति दान मोहिँ फगुआ दीजै, अमर लोक सहदानी ।
मिटै जब आवा जानी ॥४॥
जग के भरम छोड़ दे बौरी, लोक लाज बिसरानी ।
साहेब कबीर मिले मोहिँ सतगुरु, धरमदास भल जानी ।
भई निर्भय पटरानी ॥५॥
॥ होली ३ ॥
जग ये दोउ खेलत होरी ।
माया ब्रह्म बिलास करत हैं, एक से एक बरजोरी ॥ टेक ॥
सचिदानंद सरूप अखंडित, ब्यापक है सब ठौरी ।
हिये नैन से परख परी जेहि, जोति समाय रहो री ॥१॥
जोबन जोर नैन सर१ मारत, ठहर सकै को कोरी२ ।
मदन प्रचंड उठै चमकारी, काया करी चित चोरी ॥२॥
निरगुन रूप अमान अखंडित, जा मेँ गुन बिसरो री ।
माया सक्ति अनंद कियो है, सबहि मेँ अगर भरो री ॥३॥
कारन सूक्ष्म स्थूल देँह धरि, भक्ति हेत तृन तोरी ।
धर्मनि बिना दरस गुरु मूरत, कस भव पार भयो री ॥४॥
॥ होली ४ ॥
तुम संतो खेलु सम्हारि, जग मेँ होरी मचि रहि भारी ॥टेक॥
जड़ चेतन दुइ रूप बनाये, एक कनक दुजे नारी ।
पाँच पचीस लिये सँग अबला, हँसि हँसि मिलि गावैँ गारी ॥१॥
दुरमति दम्भ३ गहे कर मेँ डफ, हबड़ हबड़ दै तारी ।
तिरगुन तार तँबूरा बाजै, आस तृस्ना गति न्यारी ॥२॥
(१) बान । (२) तिरछी चितवन । (३) कपट ।

६२ सोहर
चोवा चंदन अबिर अरगजा, माया की गहबर भारी।
षट दरसन पाखंड छानवे, पकरि किये बेगारी ॥ ३ ॥
लोभ मोह दुइ भरि पिचकारी, छूटत बारम्बारी।
जो कोइ सन्मुख होइ के खेलै, तिनहिँ छीँट लगै कारी ॥ ४ ॥
कुमति गुलाल डारि मुख सीँजै, काम पुटरिया मारी।
सुर नर मुनि अरु पीर औलिया, भीँजि रहे संसारी ॥ ५ ॥
चतुरन फगुआ दे दे छूटे, मूरख को लगै प्यारी।
कहैँ कबीर सुनो हो धर्मनि, निर्गुन ज्ञान गलि१ न्यारी ॥ ६ ॥
॥ सोहर ॥
॥ शब्द १ ॥
साहेब मोर बसत अगमपुर, जहाँ गम न हमार हो ॥टेक॥
साहेब कै ऊँची अटरिया, तरै बिषम बजार हो।
पाप पुन्न दोउ बनियाँ, हीरा लाल बिकाय हो ॥ १ ॥
आठ कुवा नव बावड़ी, सोरह पनिहार हो।
भरलि गगरिया ढरकि गै, ठाढ़ी धन पछिताय हो ॥ २ ॥
छोट मोट डोलिया चँदन कै, छोटे चार कहार हो।
लै कै उतारे वोहि देसवाँ, जहाँ दिस न दुवार हो ॥ ३ ॥
कहैँ कबीर सुनु धर्मन, मेरो वोहि देस हो।
जो रे गये सो बहुरे नहिँ, कस कहत सनेस हो ॥ ४ ॥
॥ शब्द २ ॥
जाके दुवरवा जमिरिया सो कैसे सोइल हो।
महर महर करै फूल, नीँद नहिँ आइल हो ॥ १ ॥
(१) गली।