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धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press

सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished98 पृष्ठ

पृष्ठ 65, कुल 98 में से

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पृष्ठ 65

५२ मंगल
पाँच तत्त को बासा, त्यागो बेगि कै।
छाँड़ो मिलि मिलि नेह, पुरुष गम राखि कै ॥ १ ॥
लाँघो औघट घाट, पंथ निज ताकि कै।
गहो सुकृत निज डोर, अगम गम राखि कै ॥ २ ॥
चार कोस आकास, तहाँ चढ़ि देखिये।
आगे मारग झीनि, तो सुरत बिबेकिये ॥ ३ ॥
मुकुट एक अनूप, छत्र सिर साजिहै।
दुरत अग्र को चौँर, सब्द धुनि गाजिहै ॥ ४ ॥
सेत धुजा फहराय, अँवर तहँ गूँजहीँ।
नितहिँ उठै झनकार, गगन घनघोरहीँ ॥ ५ ॥
कहैँ कबीर धर्मदास सोँ, मूल उचारिये।
अगम गम्य बताइ कै, हंस उबारिये ॥ ६ ॥
॥ शब्द २० ॥
[ प्रश्नोत्तर ]
सत्त सुकृत सतनाम, सो आदि मनाइये।
लीजै साहेब को नाम, प्रेम पद पाइये ॥ १ ॥
सुरति नहीँ बिलगाइ, तो मुक्ती होइ हो।
चलो हंसा वहि देस, बसै जहँ पीव हो ॥ २ ॥
चाँद सुरज के पूरब१, हंसा पच्छिम हो।
वोहि देसवाँ मत जाव, बसै जहँ पंछी२ हो ॥ ३ ॥
चाँद सुरज के दक्खिन, हंसा उत्तर हो।
खोलो मुक्ति दुवार, उतरि चलो पार हो ॥ ४ ॥
तीन सै साठ कड़िहार३, काल जम जार हो।
उन के वार जनि भूलो, भवसागर धार हो ॥ ५ ॥
(१) ऊपर । (२) शरीर-बद्ध जीव । (३) मल्लाह ।