सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press

सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished98 पृष्ठ

पृष्ठ 59, कुल 98 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 59

४६ मंगल
इहवाँ गाँव न ठाँव, नहीँ पुर पाटन हो।
नाहिन बाट बटोही, नहीँ हित आपन हो ॥४॥
सेमर है संसार, सुवा उधराइल हो।
सुंदर भक्ति अनूप, चले पछिताइल हो ॥५॥
नदी बहै अगम अपार, पार कस पाइब हो।
सतगुरु बैठे मुख मोरि, काहि गोहराइब हो ॥६॥
सत्तनाम गुन गाइब, सत ना डोलाइब हो।
कहैँ कबीर धर्मदास, अमर घर पाइब हो ॥७॥
॥ शब्द १३ ॥
धनुष बान लिये ठाढ़, जोगिनि एक माया हो।
छिनहिं में करत बिगार, तनिक नहिं दाया हो ॥१॥
फिर फिर बहै बयार, प्रेम रस डोलै हो।
चढ़ि नौरँगिया की डार, कोइलिया बोलै हो ॥२॥
पिया पिया करत पुकार, पिया नहिँ आया हो।
पिय बिनु सून मँदिलवा, बोलन लागे कागा हो ॥३॥
कागा हो तुम का रे, कियो बटवारा१ हो।
पिया मिलने की आस, बहुरि ना छूटहि हो ॥४॥
कहैँ कबीर धर्मदास, गुरू सँग चेला हो।
हिलि मिलि करो सतसंग, उतरि चलो पारा हो ॥५॥
॥ शब्द १४ ॥
सखि अनहद धाम निवास, सो देखो ये घड़ी।
तहँ पहुँचे कोइ दास, सो देखो० ॥ १ ॥
सुख कोइ एक सर हंस, सो देखो० ।
परखि गहो निज नाम, सो देखो० ॥ २ ॥
१) चारह बाट यानी बेठिकाने या इधर उधर।