धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)
Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press
सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
पृष्ठ 60, कुल 98 में से
संदर्भ में पढ़ेंमंगल ४७
जन्म जन्म दुख मिटे, सो देखो०।
लइ राखो निज धाम, सो देखो० ॥ ३ ॥
अक्षय वृक्ष के डहर समाय, सो देखो० ।
सत्त नाम परताप, सो देखो० ॥ ४ ॥
हंसा निज घर चले, सो देखो० ।
काल रहा मुरझाय, सो देखो० ॥ ५ ॥
अधर दुलीचा अमर पद, सो देखो० ।
सतगुरु दिया बिछाय, सो देखो० ॥ ६ ॥
धर्मनि मिले कबीर, सो देखो० ।
हिलि मिलि करहि कलोल, सो देखो० ॥ ७ ॥
॥ शब्द १५ ॥
गुन कर बौरी, जब लौं नैहर माहिँ हो ।
फिरि जैहौ ससुरारि, पिया के पास हो ॥ १ ॥
जब लगि राज पिया कर, तू सुख करि ले हो ।
सासु ननदिया दारुन, उत्तर जनि देहु हो ॥ २ ॥
सतगुरु डोलिया फँदावल, लगे चार कहार हो ।
आगे चलै मोर साहेब, पाछे चालनहार हो ॥ ३ ॥
जाइ उतारे वोहि देसवाँ, जहँ दिस न दुवार हो ।
मोतियन चुनि घर बने, हीरा लगे किवार हो ॥ ४ ॥
चंद्र लगन मोर अँचरा, सुरज लगन मोर देँह हो ।
हद्दे लगन मोरा साहेब, जहँ लगि फैले दृष्टि हो ॥ ५ ॥
मन मन बिहसै दुलहिनि, अमर बर पाये हो ।
साहेब कबीर कै दिहल, सुनि ले धर्मदास हो ॥ ६ ॥