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धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press

सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished98 पृष्ठ

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पृष्ठ 71

५८ बारहमासा

बिना दल बादल झनकारा ।
उलटि पवन के नीचे होई, बहै अमृत धारा ॥
वहाँ नहिँ लागै भौ फाँसा ॥ ५ ॥
अगहन आसा लगी हमारी, गगन गुफा माहीं ।
बज्र केवारे लगे द्वार मेँ, सहज खुलैँ नाहीं ॥
जहाँ कछु हिकमत का काजा ।
उलटि पवन कै ठोकर मारो, खोलो दरवाजा ॥
तिन्हाँ का छूटै जम त्रासा ॥ ६ ॥
पूस मास मेँ पिया आपना, खोज करो भाई ।
जनम जनम के संसय तुम्हरे, सबै छूटि जाई ॥
लखो घट बीच पिया छाया ।
सतगुरु पूरे किरपा करिके, हमको बतलाया ॥
किया मोरे बैरियन को नासा ॥ ७ ॥
लागत माघ अगम की बानी, सुनो संत प्यारे ।
भर्म जाल भौसागर से तुम, रहो सदा न्यारे ॥
गगन मेँ अनहद बाजत है ।
सुन्न महल के भीतर मेँ, सिव सक्ति बिराजत है ॥
बने वहँ खूबहि कैलासा ॥ ८ ॥
फागुन फाँस लगै नहिँ जम की, गहौ नाम डोरी ।
पाँच चोर बसे काया माहीं, करत सदा चोरी ॥
कोई की हाँक नहीँ मानैँ ।
नर नारी औ देवी देवा, सब को भरमाने ॥
काया में साँच करौ बासा ॥ ६ ॥
चैत चित्त के मारग को, तुम खोजो दिन राती ।
सुन्न महल मेँ दीपक बारो, बिना तेल बाती ॥