धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)
Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press
सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंbarahmaasa ५
॥ बारहमासा ॥
धर सत्य पुरुष का ध्यान, तुम्हारी पूरन है आसा ॥ टेक
पिरथम मास असाढ़ जो लागे, सोधो काया को ।
बाहर दृष्ट कहाँ सो आया, भीतर छाया को ॥
पंच का नगर बसाया को ।
नख सिख से रचि नैन नासिका, इसे बनाया को ॥
उसी का खोज करो बाला ॥ १ ॥
सावन सार नाम निज जपि ले, यह जप अपने से ।
कर नहिँ हलै न डोलै जिभ्या, सोहं जपने से ॥
काल नहिँ ब्यापै सुषमनि से ।
इँगल पिंगल के मारग की, तुम डोर गहो मन से ।
नाम सोहंग जपो स्वाँसा ॥ २ ॥
भादौँ भर्म मेटि सतगुरु की सेवा कछु करना ।
गगन गुफा के मारग को, तुम धीरज से चढ़ना ॥
केवाड़े द्वादस हैं लागे ।
बैकुंठ पुरी में दसम द्वार है, तहाँ जोति जागे ॥
वहाँ नहिँ लगै काल फाँसा ॥ ३ ॥
कार सुमति बृजराज, कोई जन अंतर ध्यान धरै ।
नाभि कँवल में सुरति लगावै, आतम नजर परै ॥
झलकवै दसम दुवारे में ।
अगम अगोचर पुर्ष अबिनासी, सुन्न अटारी में ॥
वहाँ नहिँ लगै भूख प्यासा ॥ ४ ॥
कातिक षष्ट कँवल दल भीतर, अगम जोति दरसै ।
चमकै बिजुली मेघ जो गरजै, अमृत जल वरसै ॥