धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)
Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press
सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
पृष्ठ 69, कुल 98 में से
संदर्भ में पढ़ें५६ बधावा
धरमदास बिनवै कर जोरी, सुनिये समरथ साँइया।
साहेब कबीर प्रभु मिले बिदेही, झीना दरस दिखाइया॥ ४ ॥
॥ शब्द ५ ॥
आज आनंद भये मेरे घर, निरगुन संत पधारे हो ॥ टेक ॥
घसि घसि चंदन अँगना लीपाओँ, गजमोतियन चौक पुराओ हो ॥ १ ॥
कनक रतन का कलस मँगाओँ, हीरा जड़ाव की झारी हो ॥ २ ॥
सतगुरु तो सिंहासन बैठे, सब्द का चँवर ढुँराओँ हो ॥ ३ ॥
धरमदास की अरज गोसाँईं, मंगलचार नित्त गाओँ हो ॥ ४ ॥
॥ शब्द ६ ॥
मोरे आये संत सनेही, धन धन घड़ी आज की हो ॥ टेक ॥
अतर फुलेल न्हवावोँ सजनी, केसरि तिलक लगाओँ हो ॥ १ ॥
धूप दीप नैबेद आरती, फूल माल पहिराओँ हो ॥ २ ॥
जिनके दरस होय सब काजा, तरसैं राना राजा हो ॥ ३ ॥
सत्त सब्द जहँ होय प्रकासा, अस कबीर धर्मदासा हो ॥ ४ ॥
॥ शब्द ७ ॥
आज घर आये साहेब मोर ॥ टेक ॥
हुलसि हुलसि धन अँगना बुहारे, मोतियन चौक पुराई ॥ १ ॥
चरन धोय चरनामृत लीन्हा, सिंहासन बैठाई ॥ २ ॥
पाँच सखी मिलि मंगल गावैँ, सब्द में सुरति समाई ॥ ३ ॥
बाँधोगढ़ कै आमिन१ बिनवै, धनि हो कबीर गोसाँईँ ॥ ४ ॥
(१) धर्मदासजी की स्त्री का नाम।