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धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press

सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished98 पृष्ठ

पृष्ठ 73, कुल 98 में से

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पृष्ठ 73

६० बसंत और होली
सहस सुरंगी रमि रहा हो, हिलि मिलि एकै ठाँव ।
धर्मनि भेंटे भाव से हो, साहेब कबीर के पाँव ॥ ४ ॥
॥ होली १ ॥
हमरी उमिरिया होरी खेलन की,
पिय मोसों मिलि के बिछुरि गयो हो ॥ १ ॥
पिय हमरे हम पिय की पियारी,
पिय बिच अंतर परि गयो हो ॥ २ ॥
पिया मिलैं तब जियौं मोरी सजनी,
पिया बिन जियरा निकरि गयो हो ॥ ३ ॥
इत गोकुल उत मथुरा नगरी,
बीच डगर पिय मिलि गयो हो ॥ ४ ॥
धरमदास बिरहिनि पिय पावै,
चरन कँवल चित गहि रहो हो ॥ ५ ॥
॥ होली २ ॥
होरी खेलो सयानी, फागुन की ऋतु आनी ॥ टेक ॥
मनुषा जनम बहुरि ना पैहो, साखी बेद पुरानी ।
फिर पाछे पछिताहुगी सजनी, परिहौ चौरासी खानी ।
फिरौ जुग जुग भटकानी ॥ १ ॥
सील संतोष कै केसर घोरी, छिरकत पिय रुचि मानी ।
आतम नारि करत न्यौछावर, तन मन धनहिँ लुटानी ।
अब पिया के मन मानी ॥ २ ॥
बाजत ताल मृदंग झाँझ डफ, अनहद घोर निसानी ।
पाँच पचीस लिये सँग अबला, गगन में धूम मचानी ।
उठै सुर बारहवानी ॥ ३ ॥