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सर्वकोश
धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press

सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished98 पृष्ठ

पृष्ठ 66, कुल 98 में से

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पृष्ठ 66

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मंगल
बिहसैँ सब सखियाँ, तो रानी१ मनाइहै।
रानी देहु बकसीस, हंसा गहि आनौं हो ॥ ६ ॥
[रानी]–जो तुम सखियाँ सयानी, हंसा गहि आनो हो।
सात दीप नौ खंड की, रानी कहावौँ हो ॥ ७ ॥
[सखी]–हो हंसा तुम ठाढ़, कहाँ को जाइब हो।
सात दीप नौ खंड की, रानी छाँड़ि हो ॥ ८ ॥
[हंस]–सात दीप नौ खंड बसै, बकबादिन हो।
ठाकुर२ मति के हीन, कर्म बस बाँधा हो ॥ ९ ॥
स्याम रंग पहिराव, कुसुम रंग सारी हो।
मानो मेघ घन गरजि, उमँगि दल बादल हो ॥१०॥
चलि जाहु नारि गँवारि, तुँ जगत पियारी हो।
चित्रगुप्त दुर्ग३ दानी की, रहो दुलारी हो ॥११॥
[सखी]-हो हंसा तुम ठाढ़, कहाँ के जाइब हो।
सन्मुख होइ कै देखो, तो करहुँ जवाब हो ॥१२॥
स्याम रंग पहिराव, कुसुम रंग चुनरी हो।
कठिन कला छबि झलकै, तौ काल दुलारी हो ॥१३॥
मैं तोहि पूछौँ हंसा, कहाँ तोरे बाप हो।
हम से कहो समझाय, कहा करे पाप हो ॥१४॥
[हंस]--सत साहेब जो पिता, तो सतगुरु माता हो।
चित्रगुप्त दुर्गदानी, सो येहि बिधि जाता हो ॥१५॥
सब सखि माथ नवायो, तो हंसा चलि भे हो।
आगे मिले धर्मराय, काल सिर नाये हो ॥१६॥
(१) रानी से मतलब माया और सखियों से माया की शक्तियाँ।
(२) काल। (३) दुर्ग=कठिन। दुर्ग-दानी नाम काल का है।