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धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press

सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished98 पृष्ठ

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पृष्ठ 62

मंगल ४९
बाम्हन बेगि पठावो मोरे बाबा,
देखि आवै वोहि देस हो।
रबि ससि तारा दिवस न रजनी,
बसै अलख अलबेल हो ॥ २ ॥
कर पगु पीठ पेट नहिँ काया,
हम से कहा न जात हो।
अस बर लिखा लिलार हमारे,
बाम्हन कहु तहँ जाइ हो ॥ ३ ॥
बंध झलरिया बेंदी झलकै,
चंद सुरज के पार हो।
मानिक दियना तहवाँ झलकै,
जगमग जोति अपार हो ॥ ४ ॥
बिना सुरत संसारहि निरखै,
बिन मुख बोलनहार हो।
स्त्रवन नैन बिनु सुनै औ देखै,
आसन अधर अधार हो ॥ ५ ॥
प्रेम प्रीत से खंभ गड़ावो,
गैबी अलँब१ बिछावो हो।
कनक कलस धरि मंगल गावो,
मोतियन झालरि लांव हो ॥ ६ ॥
दुलहिनि दुलहा ब्याहन आये,
भये दोऊ एक ठौर हो।
भया बियाह उछाह परम पद,
भये उर सत्त उचार हो ॥ ७ ॥
(१) सहारा, भरोसा।