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धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press

सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished98 पृष्ठ

पृष्ठ 58, कुल 98 में से

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पृष्ठ 58

हंसा सब्द बिदेह, रूप नहिँ रेखा हो ।
कामिनि रहत लजाय, सोभा निजु देखा हो ॥४॥
धर्मराय उठि बोले, हंसा सुनि लेहु हो ।
कहँ को कियो है पयान, सो कहो समुझाइ हो ॥५॥
तब हंसा अस बोले, सुनो धर्मराय हो ।
पाये पुरुष के पान, तौ लोक के जाइब हो ॥६॥
तब धर्मराय पुनि बोले, हंसा सुनि लेहु हो ।
जाहु पुरुष के पास, सीस पगु देहु हो ॥७॥
मानसरोवर ताल, जहाँ अमी सागर हो ।
हंसा करै बिसराम, तो अग उजागर हो ॥८॥
अमर लोक एक दीप, तो सोभा सुहेल हो ।
तहँ हंसन कै बास, सुरति मिलि खेलै हो ॥६॥
अनहद धाम अचिंत, पुरुष जहँ छाजै हो ।
अमर लोक निज धाम, हंसन कै देसा हो ॥१०॥
कहैं कबीर पुकारि, सुनो धर्मदासा हो ।
वह तो अगम अगाध, पहुँचे कोइ हंसा हो ॥११॥
॥ शब्द १२ ॥
सूतल रहलौँ मैं सखियाँ, तो बिष कर आगर हो ।
सतगुरु दिहलैँ जगाइ, पायौँ सुख सागर हो ॥१॥
जब रहली जननी के ओदर१, परन सम्हारल हो ।
जब लौं तन में प्रान, न तोहि बिसराइब हो ॥२॥
एक बुंद से साहेब, मँदिल बनावल हो ।
बिना नैंव कै मंदिल, बहु कल लागल हो ॥३॥
(१) मा के पेट यानी गर्भ में ।