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धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press

सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished98 पृष्ठ

पृष्ठ 68, कुल 98 में से

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पृष्ठ 68

बधावा ५५
खीर खाँड़ घृत अमृत भोजन, संत जिमाऊँ हो ।
चरन धोइ चरनामृत लेऊँ, सीस नवाऊँ हो ॥ ३ ॥
अब मोरे साहेब तखत बिराजैँ, आरति लाऊँ हो ।
पान पर्वान दया से पाऊँ, सब मिलि गाऊँ हो ॥ ४ ॥
अब मोरे सतगुरु पलँग पधारैँ, चरन दबाऊँ हो ।
धरमदास याही बिधि करि, सतलोक सिधाऊँ हो ॥ ५ ॥
॥ शब्द ३ ॥
साहेब सतगुरु घर आया हो ।
अँगना मोर जगमग भया, सुख सम्पति लाया हो ॥ १ ॥
आधि¹ गई मेरी हे सखी, आज सज्जन पाया हो ।
धन्य बिधाता लेख लिखा, निज भाग जगाया हो ॥ २ ॥
कोमल बचन अँग दया घनेरी, कल्प वृच्छ की छाया हो ।
धन जननी अस संत जिन जाया, अनँद बधाया हो ॥ ३ ॥
जप तप नेम धर्म बहु कीन्हा, रसना नामहिँ गाया हो ।
धरमदास सतगुरु सतसँग से, छिन मेँ परम पद पाया हो ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४ ॥
सतगुरु आये द्वार, मन मेँ बजत बधाइया ।
सतगुरु साहेब दीन-दयाला, द्वारे मोरे आइया ।
जुगन जुगन के करम मिटत भे, सतगुरु दरस दिखाइया ॥ १ ॥
प्रेम सुरत की करी रसोई, ब्यंजन² आसन लाइया ।
जेँवन बैठे सतगुरु साहेब, अधर से चौँर डोलाइया ॥ २ ॥
दया भाव के पलँग बिछाये, प्रेम दुलीचा लाइया ।
ता पर सोये सतगुरु साहेब, सुरति कै तेल लगाइया ॥ ३ ॥
(१) मानसी दुःख; चिन्ता । (२) भोजन ।