धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)
Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press
सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमंगल ४३
का भे बात बनाये, परचे नहिँ पीव सोँ।
अंतर का बदफैल, फैल गै जीव सोँ ॥५॥
कहैँ कबीर पुकारि, सुनो धर्म आगरा।
बहुत हंस लै साथ, उतरो भव सागरा ॥६॥
॥ शब्द ८ ॥
पढ़ सुगना सत नाम, बैठ तन ताख में।
चार दिना का रंग, मिलै तन खाक में ॥१॥
लावहु तेल फुलेल, काया है चाम की।
अ्र्द गर्द मिलि जाय, दोहाई सत नाम की ॥२॥
नीब न मीठी होय, सींचे गुड़ घीव से।
जा कर जौन सुभाव, छुटै नहिँ जीव से ॥३॥
जहाँ सौदागर होय, तहाँ कछु भाखिये।
बिन गाहक बिन मोल, बस्तु ना खोलिये ॥४॥
चौमुख दीपक बारि, महल बिच सोइये।
नौ नारी से नेह, अकि छिन रोइये ॥५॥
चेतहु संत सुजान, तो जम से रड़ि है।
काल के हाथ गुलेल, तड़ाका मारिहै ॥६॥
धरती है मस्तूल, तंबु असमान है।
नौ लख जरत मसाल, सीढ़ी बंकनाल है ॥७॥
आगम कहैँ कबीर, सुनो धर्म आगरा।
बहुत हंस लेइ साथ, उतरो भव सागरा ॥८॥
॥ शब्द ९ ॥
चढ़ि अमवा की डारि, अकेली धन का रे खड़ी।
चले जाव मुरुख गँवार, मोरी तोहि का रे पड़ी।