धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)
Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press
सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबसंत और होली ६१
गगन गली मेँ छैँके अबिनासी, मगन भई मुसुकानी ।
भक्ति दान मोहिँ फगुआ दीजै, अमर लोक सहदानी ।
मिटै जब आवा जानी ॥४॥
जग के भरम छोड़ दे बौरी, लोक लाज बिसरानी ।
साहेब कबीर मिले मोहिँ सतगुरु, धरमदास भल जानी ।
भई निर्भय पटरानी ॥५॥
॥ होली ३ ॥
जग ये दोउ खेलत होरी ।
माया ब्रह्म बिलास करत हैं, एक से एक बरजोरी ॥ टेक ॥
सचिदानंद सरूप अखंडित, ब्यापक है सब ठौरी ।
हिये नैन से परख परी जेहि, जोति समाय रहो री ॥१॥
जोबन जोर नैन सर१ मारत, ठहर सकै को कोरी२ ।
मदन प्रचंड उठै चमकारी, काया करी चित चोरी ॥२॥
निरगुन रूप अमान अखंडित, जा मेँ गुन बिसरो री ।
माया सक्ति अनंद कियो है, सबहि मेँ अगर भरो री ॥३॥
कारन सूक्ष्म स्थूल देँह धरि, भक्ति हेत तृन तोरी ।
धर्मनि बिना दरस गुरु मूरत, कस भव पार भयो री ॥४॥
॥ होली ४ ॥
तुम संतो खेलु सम्हारि, जग मेँ होरी मचि रहि भारी ॥टेक॥
जड़ चेतन दुइ रूप बनाये, एक कनक दुजे नारी ।
पाँच पचीस लिये सँग अबला, हँसि हँसि मिलि गावैँ गारी ॥१॥
दुरमति दम्भ३ गहे कर मेँ डफ, हबड़ हबड़ दै तारी ।
तिरगुन तार तँबूरा बाजै, आस तृस्ना गति न्यारी ॥२॥
(१) बान । (२) तिरछी चितवन । (३) कपट ।