धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)
Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press
सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६२ सोहर
चोवा चंदन अबिर अरगजा, माया की गहबर भारी।
षट दरसन पाखंड छानवे, पकरि किये बेगारी ॥ ३ ॥
लोभ मोह दुइ भरि पिचकारी, छूटत बारम्बारी।
जो कोइ सन्मुख होइ के खेलै, तिनहिँ छीँट लगै कारी ॥ ४ ॥
कुमति गुलाल डारि मुख सीँजै, काम पुटरिया मारी।
सुर नर मुनि अरु पीर औलिया, भीँजि रहे संसारी ॥ ५ ॥
चतुरन फगुआ दे दे छूटे, मूरख को लगै प्यारी।
कहैँ कबीर सुनो हो धर्मनि, निर्गुन ज्ञान गलि१ न्यारी ॥ ६ ॥
॥ सोहर ॥
॥ शब्द १ ॥
साहेब मोर बसत अगमपुर, जहाँ गम न हमार हो ॥टेक॥
साहेब कै ऊँची अटरिया, तरै बिषम बजार हो।
पाप पुन्न दोउ बनियाँ, हीरा लाल बिकाय हो ॥ १ ॥
आठ कुवा नव बावड़ी, सोरह पनिहार हो।
भरलि गगरिया ढरकि गै, ठाढ़ी धन पछिताय हो ॥ २ ॥
छोट मोट डोलिया चँदन कै, छोटे चार कहार हो।
लै कै उतारे वोहि देसवाँ, जहाँ दिस न दुवार हो ॥ ३ ॥
कहैँ कबीर सुनु धर्मन, मेरो वोहि देस हो।
जो रे गये सो बहुरे नहिँ, कस कहत सनेस हो ॥ ४ ॥
॥ शब्द २ ॥
जाके दुवरवा जमिरिया सो कैसे सोइल हो।
महर महर करै फूल, नीँद नहिँ आइल हो ॥ १ ॥
(१) गली।