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धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press

सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished98 पृष्ठ

पृष्ठ 63, कुल 98 में से

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पृष्ठ 63

मंगल
पाये सोहाग माँग भर सेँदुर,
नखसिख सोरहौ सिंगार हो।
फूल जड़ित रतनन से राजित१,
बेंदी झलकै लिलार हो॥८॥
सुखमनि पलँग बिछावो सखियाँ,
पद्मन धुनि झनकार हो।
अब का सोवो उठि जागो धनियाँ,
आखिर करो सम्हार हो॥६॥
बिनति करूँ मैं चरन कँवल में,
सुनो मोरे प्रान-नाथ हो।
धरमदास के सतगुरु समरथ,
तोहरे हाथ निबाह हो॥१०॥
॥शब्द १८॥
हमरा बियाह करो मोरे बाबा,
तुम सौं नाहिं निबाह हो।
जिन के नाहिं रूप औ रेखा,
उन से हमरो बियाह हो॥१॥
आवे न जाय मरै ना जीये,
सो बर खोजो जाई हो।
बूढ़ न बार तरुन नहिं चेलिक२,
वा को तिलक लगाई हो॥२॥
गगन मँदिल वह गढ़ मोरे बाबा,
अरध उरध के बीच हो।
पवन बराती ब्याहन आये,
मान करो सनमान हो॥३॥
(१) शोभित। (२) नौजवान।