धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)
Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press
सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४४ मंगल
की तोरी सासू दारुनिया, की नैहर दूर बसै ।
की तोरे पिय परदेस, जोहत वा की बाट खड़ी ॥२॥
ना मोरी सासू दारुनिया, न नैहर दूर बसै ।
हमरे बलम परदेस, जोहत वा की बाट खड़ी ॥३॥
पचरँग पहिरु चुनरिया, ऊपर धरो आरसी ।
सतगुरु संग सुजान, समुझै मोर पारसी ॥४॥
यह मंगल सतलोक, हंस जन गावहीँ ।
कहैं कबीर धर्मदास, प्रेम पद पावहीँ ॥५॥
॥ शब्द १० ॥
चढ़ि नौरँगिया की डार, कोइलिया बोलै हो ।
अगम महल चढ़ि चलो, जहाँ पिय से मिलो ॥१॥
मिलि चलो आपन देस, जहाँ छबि छाजई ।
`त सब्द जहाँ खिले, हंस होइ आवही ॥२॥
्य बस्तु मिलि जाय, सब्द टकसार हो ।
हुँ दिस लागी झलरिया, तो लोक असंख हो ॥३॥
ंबु दीप एक देस, पुरुष जहँ रहहि हो ।
हैं कबीर धर्मदास, बिछुरन नहिँ होइ हो ॥४॥
॥ शब्द ११ ॥
साहेब पतिया पठाये, सो हंसा बाँचे हो ।
पाती बाँचि घर जावो, पुरुष के पासे हो ॥१॥
मन रंग पालान, सुरति की काठी हो ।
अनहद सब्द सवार, अनँत कला सोभा हो ॥२॥
कामिनि करहि सिंगार, हंसा सुनु बानी हो ।
आवो पलँग चढ़ि बैठो, तो दरसन देहु हो ॥३॥