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अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)

Amar Shaheed Chandrashekhar Azad

सूचना एवं प्रसारण मन्त्रालय, भारत सरकार द्वारा

DevanagariHindipublished148 पृष्ठ

तृतीय अध्याय
साध्य और साधना
प्रारम्भ में क्रान्ति शब्द का अर्थ ही हिंसा के माध्यम से सत्ता-परिवर्तन
करना था, भले ही आज क्रान्ति शब्द अन्य अर्थों में भी प्रयुक्त होने लगा है,
जैसे हरित क्रान्ति अथवा औद्योगिक क्रान्ति इत्यादि। अतः क्रान्ति पथ के
पथिकों के लिए अपना साध्य देश को स्वतन्त्र कराना ही सर्वोपरि था।
इसमें साधनों की पवित्रता पर विशेष ध्यान नहीं दिया जाता था। भारत
ही नहीं आयरलैण्ड एवं सोवियत संघ के क्रान्तिकारियों ने भी अपने साध्य
के लिए हिंसक साधनों को अपनाया था। इन क्रान्तिकारियों के पास आय
के कोई साधन तो थे नहीं, अपने लक्ष्य पर आगे बढ़ने के लिए इन्हें धन की
आवश्यकता पड़ती थी, जिसके लिए चन्दा माँगने पर भी धन का अभाव
अथवा कमी बनी रहती थी, अतः विवशता के कारण इन्हें डाके भी डालने
पड़ते थे।
बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ से ही बंगाल के क्रान्तिकारियों ने क्रान्ति
के लिए डकैतियों को अपनी कार्यप्रणाली का अंग बना लिया था। बंगाल
के एक प्रसिद्ध पत्र युगान्तर के एक लेख से इस बात का परिचय मिलता है
कि पवित्र साध्य के लिए डकैतियों को क्रान्तिकारी अनुचित नहीं समझते
थे।

चन्द्रशेखर आजाद 41
की आवश्यकता होती है, उसे प्राप्त करने हेतु आरम्भ मे देशवासियो पर
डकैती डालनी होगी। यह तो स्पष्ट है कि धनी इसमें पैसा नही देंगे। बाद
मे श्री अरविन्द घोष ने समझाया कि स्वतन्त्रता के लिए डकैती करने मे
जिस राजनीतिक दोष की कल्पना की जाती है, वह पूर्णतया निराधार है।
अन्त मे रंगपुर के एक प्रतिनिधि ने कहा कि हम लोग डकैती करके जो-कुछ
भी लाएं, उसका सही-सही हिसाब रखा जाए और स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद
जिनसे जो-कुछ लिया जाए, वह उन्हे ठीक-ठीक लौटा दिया जाए। इस
प्रस्ताव का अरविन्द घोष ने समर्थन किया और यह पास हो गया।"
ये क्रान्तिकारी इस नियम का पूर्णरूप से पालन करते थे। लूटे गये
व्यक्ति के घर उनसे लूटे गये धन की रसीद भेज दी जाती थी। सन् 1916
मे कलकत्ता के गोपोराय क्षेत्र मे एक डकैती हुई थी। इस डकैती का नेतृत्व
श्री अतुल्य घोष एवं श्री पुलिन बनर्जी ने किया था। बाद मे लूटे गये घर
के स्वामी के लिए एक पत्र भेजा गया था, जिसमे लिखा था—"हमारे
कोष मे आपके हिसाब मे 9891 रु० 5 पाई दिये गए कर्ज के रूप मे जमा
हुए हैं। स्वतन्त्रता मिलने पर इस धन को व्याज सहित लौटा दिया
जाएगा।"
इन डाको के औचित्य पर प्रकाश डालते हुए श्री मन्मथनाथ गुप्त
अपनी पुस्तक 'भगतसिंह और उनका युग' मे इसी प्रकार के विचार प्रकट
करते हैं। उनका आशय है, "क्रान्तिकारी अपने घरो से भी दल के लिए
गहने चुराते थे। बंगाल मे एक क्रान्तिकारी ने अपने घर डाका डलवाया
था। पैसे का हिसाब बड़े ध्यान से रखा जाता था। चन्द्रशेखर आदि सभी
बड़ी गरीबी से जीवन बसर करते थे। ...आयरलैण्ड और रूस के क्रान्ति-
कारियों द्वारा भी डाके डाले गए। स्टालिन भी बाकू के पास डाली गई
डकैती मे शामिल थे। इंगलैण्ड मे सोवियत संघ के प्रथम राजदूत क्रासिन
भी डकैतियो मे शामिल हुए थे। इसे विदेशी क्रान्तिकारी जबरदस्ती वसूल
किया गया चंदा कहते थे। सिडीशन कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार एक
डकैती डालने पर क्रान्तिकारियों ने रसीद छोड़ दी थी—इतनी रकम ली
गई है। भारत स्वतन्त्र होने पर कर्जा अदा कर दिया जाएगा।
क्रान्तिकारियो के समक्ष धन की समस्या सदा बनी रही। चन्द्रशेखर

42 चन्द्रशेखर आजाद
आजाद जब क्रांतिकारी दल में शामिल हुए, तो दल का सदस्य होने के
कारण उन्हें भी इस समस्या का सामना करना पड़ा। इस समस्या के कारण
दल के सदस्यों को भोजन एवं वस्त्र-जैसी सामान्य आवश्यकताओं के लिए
भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। कभी-कभी तो सदस्यों के
लिए भोजन का प्रबन्ध करना भी कठिन हो जाता था। यहाँ तक कि कभी-
कभी भोजन न मिलने पर क्रांतिकारियों को भिखारियों के लिए खोले गए
लंगरों में जाकर अपनी भूख शान्त करनी पड़ती थी, किन्तु आजाद को इन
जगहों पर भोजन करना बड़ा ही अपमानजनक लगता था। इसके साथ ही
अन्य अनेक आवश्यकताएँ भी दल के सामने थीं। इन सब समस्याओं के
निराकरण हेतु अमीर लोगों के यहाँ डाके डालने की योजना बनी।
दल के कार्यों के लिए डकैतियां :
अन्य कोई रास्ता न देखकर दल ने डाके डालने आरम्भ कर दिये।
पण्डित रामप्रसाद बिस्मिल डकैतियों में दल का नेतृत्व करते थे। दल की
ओर से इस प्रकार का पहला डाका प्रतापगढ़ के पास एक गाँव में मुखिया
के घर डाला गया। रामप्रसाद अपने साथियों को लेकर डाका डालने के
लिए चल पड़े। गाँव के बाहर गाँव के ही कुछ लोगों से उनकी मुलाकात
हुई। गाँव के लोगों ने उनसे पूछा कि वे कहाँ जा रहे थे। इस पर उन्हें
बताया गया कि दल के लोगों को गाँव के मुखिया के यहाँ दावत पर बुलाया
गया था।
चन्द्रशेखर आजाद भी इस डकैती में शामिल थे। मुखिया के घर
पहुँचने पर डाका डालने से पहले बिस्मिल ने अपने साथियों को निर्देश
दिया कि "दल का उद्देश्य केवल धन प्राप्त करना है; किसी की हत्या
करना नहीं। अतः केवल धन ही लूटा जाए और इस बात का ध्यान रहे
कि किसी महिला के साथ कोई भी किसी प्रकार का अभद्र व्यवहार न
करे।" साथी घर के अन्दर घुस गए और रामप्रसाद बिस्मिल स्वयं हाथ में
पिस्तौल लेकर बाहर खड़े रहे, ताकि यदि कोई व्यक्ति बाहर से मदद के
लिए आये, तो उसे अन्दर न जाने दिया जाए।
दल के लोग अन्दर लूटपाट करने लगे। घर में चीख-पुकार मच गई।

चन्द्रशेखर आजाद 43
स्त्रियों के साथ किसी भी प्रकार की जबरदस्ती न करने का निर्देश था,
उनके इस तरह के व्यवहार से फायदा उठाकर एक महिला ने चन्द्रशेखर
आजाद के हाथ से पिस्तोल छीन लिया। स्त्री पर हाथ नहीं डाला जा
सकता था। इधर चीख-पुकार सुनकर बाहर गाँव के कई लोग इकट्ठे हो
चुके थे और उनकी संख्या बढ़ती जा रही थी। रामप्रसाद बिस्मिल उन्हें
रोके खड़े थे। स्थिति गम्भीर हो गई थी, किन्तु किसी की भी हत्या नहीं
करनी थी। तब बिस्मिल ने अपने साथियों को भाग चलने का संकेत किया
और सब साथी भाग खड़े हुए। यहाँ से कुछ भी हाथ नहीं लगा, वरन् एक
पिस्तौल से हाथ ही धोने पड़े। इस प्रकार दल को पहले ही डाके में
असफलता का मुँह देखना पड़ा।
इसके बाद दूसरा डाका एक जमींदार के यहाँ डाला गया। सभी
क्रांतिकारी घर के अन्दर लूटपाट करने लगे। इसी बीच दल के एक सदस्य
की नजर घर की एक युवा लड़की पर पड़ी। उसे देखकर उस सदस्य का
मन डोल पड़ा। वह उस लड़की के साथ दुर्व्यवहार करने लगा। चन्द्रशेखर
आजाद ने उसे देख लिया और ऐसा न करने की चेतावनी दी, किन्तु उसने
उनकी बात पर कोई ध्यान नहीं दिया। उदार चरित्र आजाद से यह बर-
दाश्त नहीं हुआ; वह क्रोधित हो उठे और उन्होंने अपने ही दल के उस
सदस्य को गोली मार दी। इसके बाद उन्होंने उस लड़की के साथ हुए
अभद्र व्यवहार के लिए उससे क्षमा माँगी और वहाँ से कुछ लूटे बिना चले
गए। इस प्रकार दूसरी डकैती में भी कुछ हाथ नहीं लगा।
अपने एक साथी से दल के कार्य के लिए आजाद ने चार हजार रुपये
कर्ज लिये थे। यह पैसा छः महीने बाद ब्याज सहित चुकाया जाना था।
इसका उल्लेख पिछले अध्याय में हो चुका है। उस मित्र ने भी यह पैसा
किसी दूसरे से लेकर दिया था। अभी तीन महीने ही हुए थे कि एक दिन
वह मित्र आजाद के पास आया और उसने बताया कि वह व्यक्ति, जिससे
उसने पैसे लिये थे, अपने पैसे माँग रहा था। अतः उसने आजाद से पैसे
लौटाने की प्रार्थना की। इस पर आजाद बड़े असमंजस में पड़ गए। उन्होंने
उस मित्र को अपनी परिस्थिति बताई तथा यह भी कहा कि वायदे के अनु-
सार पैसे छः महीने बाद अवश्य लौटा दिये जाएँगे।

८५ चन्द्रशेखर आजाद।
इस पर उस व्यक्ति ने अपनी विवशता उनके सामने रखी और बताया
कि इस समय उनके पास भी पैसे नहीं थे, अन्यथा वह स्वयं लौटा देता तथा
पैसा लौटाना भी नितान्त आवश्यक था। मित्र की विवशता देखकर आजाद
ने उसे वचन दे दिया कि पैसे शीघ्र ही उसके घर पहुंचा दिये जाएंगे।
मित्र को दिये गए वचन का पालन करना जरूरी था, परन्तु रुपए
कहाँ से लौटाए जाएँ। इसी उधेड़बुन मे कुछ समय तक सोचते रहने के
बाद आजाद एक निर्णय पर पहुँचे; उन्होने मन-ही-मन कार्यक्रम की रूप-
रेखा बना ली।
तब आजाद दिल्ली मे थे। भरी दोपहर मे वह अपनी योजना को
कार्यरूप मे परिणत करने के लिए निकल पड़े और चांदनी चौक पहुंच
गये। दिल्ली के सबसे व्यस्त एवं भीड़भाड़ वाले स्थानो मे चांदनी चौक
भी एक है। उनके साथ उनके पांच-छः साथी और भी थे। सुन्दर नये कपड़ो
मे सजे-धजे आजाद एक जौहरी की दुकान के सामने जा पहुँचे। उन्होंने
साथियों को बाहर ही खडे रहने को कहा तथा अपने आप दुकान के अन्दर
घुस गये। अन्दर जाकर वह जोहरी के साथ आभूषणों के मूल्य तथा अन्य
विषयों में बातें करने लगे। तभी उन्होंने अपने साथियो को सचेत किया।
संकेत पाते ही बाहर खड़े साथी भी दुकान के अन्दर घुसे गए। आसपास
के लोगो को कुछ पता भी न लग सका और आजाद अपने मित्रो के साथ
जोहरी की दुकान से पन्द्रह हजार रुपये लूटकर भाग खड़े हुए।
चार हजार रुपये उस मित्र को समय पर लौटा दिये। इसके बाद

चन्द्रशेखर आजाद 45
जा सकता है। काकोरी काण्ड तक वह 'हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन'
के सदस्य रहे। वहाँ उन्होंने शचीन्द्रनाथ सान्याल के नेतृत्व में काम किया,
व रामप्रसाद बिस्मिल आदि क्रान्तिकारी उनके साथी थे। इसे उनके
क्रान्तिकारी जीवन का पूर्वार्द्ध कहा जा सकता है। इस काण्ड के बाद
उन्होंने भगतसिंह आदि के साथ मिलकर क्रान्तिकारी गतिविधियों का
संचालन किया। यह उनके इस जीवन का उत्तरार्द्ध कहा जाएगा।
गवर्नर का सेक्रेटरी बनकर ठगी
उनके इस उत्तरार्द्ध जीवन में भी इस प्रकार की डकैती की योजनाएँ
बनी थीं, किन्तु भगतसिंह जनता पर डाके डालने के पक्ष में नहीं थे। अतः
डाके तो नहीं डाले गये, किन्तु सामान्यतया अन्य तरीकों से धन संग्रह
अवश्य किया गया। जब वह स्वयं अपने दल के अध्यक्ष थे। एक बार उन्होंने
कानपुर के एक सेठ से गर्वनर का सेक्रेटरी बनकर पन्द्रह हजार रुपये ऐंठ
लिये थे।
घटना इस प्रकार है—रात के लगभग नौ बजे थे। सेठ दिलसुख राय
अपने मुनीम के साथ बैठे हुए बही-खातों की जाँच कर रहे थे। तभी सेठजी के
नौकर ने जाकर उन्हें बताया कि कोई साहब उनसे मिलना चाहते हैं। सेठ-
जी ने मुनीम को उन लोगों के साथ बातें करने के लिए भेजा। मुनीम जी उन
लोगों से बातें करने गये और लौटकर बताया कि गवर्नर साहब के सेक्रेटरी
आये थे। उनके साथ उनका एक बाबू और एक चपरासी भी था। वे लोग
उसी समय सेठजी से मिलना चाहते थे। इतना सुनकर सेठजी स्वयं उनसे
मिलने के लिए चल पड़े और आदर सहित उन्हें अन्दर लिवा लाये। उन्हें
बड़े सम्मान के साथ बैठाया गया। हाथ जोड़ते हुए सेठजी ने सेक्रेटरी साहब
से आने का कारण पूछा। इस पर सेक्रेटरी साहब ने बताया, "लड़ाई में
सरकार के पास धन की कमी हो गई है, इसलिए बड़े-बड़े धनवान लोगों से
सरकार चन्दा माँग रही है। मैं इसीलिए गवर्नर साहब की ओर से आपके
पास चन्दा माँगने आया हूँ।"—
"आपको कष्ट करने की क्या आवश्यकता थी, मुझे बता दिया होता;
मैं स्वयं आपकी सेवा में हाजिर हो जाता" सेठजी बोले।

46 चन्द्रशेखर आजाद
"मैं आपके पास आया या आप मेरे पास आये एक ही बात है, इससे
क्या अन्तर पड़ता है।"
"यह तो आपका बड़प्पन है हजूर, जो आपने मेरे घर आने की कृपा
की। कृपया बताएँ कि मुझे कितनी सेवा करनी होगी?"
"सेठजी चन्दा गवर्नर साहब ने स्वयं लोगों का इन्कम टैक्स देखकर
निश्चित किया है, अतः आपके नाम पर पन्द्रह हजार रुपये लिखे गये हैं।"
रकम कुछ बड़ी थी। सेठजी को मायूस जैसा देखकर सेक्रेटरी साहब
ने अपना दूसरा दाँव फेंका—"आप कोई मामूली आदमी नहीं हैं। आप जो
आयकर देते हैं, उसको देखते हुए इतनी धनराशि कोई अधिक नहीं है।
महामहिम गवर्नर आपसे अत्यधिक प्रसन्न हैं, वह अगले वर्ष आपको राय-
बहादुर का खिताब देने वाले हैं।"
रायबहादुर खिताब का नाम सुनते ही सेठ दिलसुखराय की खुशी का
कोई ठिकाना न रहा। मौके का फायदा उठाते हुए सेक्रेटरी साहब फिर
बोले, "अगले वर्ष जिन लोगों को यह पदवी दी जा रही है, उस सूची में
आपका नाम भी है, समझ लीजिए आप रायबहादुर बन ही गये हैं। अब
तो केवल औपचारिकता पूरी होनी है।"
रायबहादुर की उपाधि मिलना उन दिनों बड़े सम्मान की बात समझी
जाती थी। इस प्रकार अपने आप इतना बड़ा सम्मान मिलने की बात सुनकर
कर सेठजी कठिनाई से अपनी खुशी को दबा पा रहे थे, वरना उनके मन में
खुशी के लड्डू फूट रहे थे। इस समय न मालूम वह क्या-क्या सोच रहे थे।
इधर सेक्रेटरी साहब और उनके साथी भी सेठजी के मन की बात को
समझ रहे थे और मन-ही-मन हँस भी रहे थे। उन्होंने सेठ की खूब तारीफ
करते हुए उसे इस बात का पूरा विश्वास दिला दिया कि अब उसकी इस
उपाधि को कोई नहीं छीन सकता। बातों ही बातों में सेठजी ने पन्द्रह
हजार रुपये का चन्दा दे दिया। सेक्रेटरी साहब रसीद-बुक साथ ही लाये
थे। साथ आये बाबू ने रसीद बनाकर सेठजी को दे दी। सेक्रेटरी साहब
अपने बाबू और चपरासी के साथ चलते बने। सेठजी बेचारे रायबहादुर
की पदवी मिलनेवाली है, इस खुशी में पागल हुए जा रहे थे।
उतनी देर में नौकर ने सेठजी को पुलिस के आने की सूचना दी।

चन्द्रशेखर आजाद 47
ही सी० आई० डी० इन्स्पेक्टर चार-पांच सिपाहियों के साथ अन्दर
आया। आते ही उसने सेठजी से प्रश्न किया, "अभी आपके यहाँ कौन
आया था?"
"गवर्नर साहब के सेक्रेटरी आये थे, चन्दा माँगने।" सेठजी बोले।
"उनके साथ और कौन-कौन थे?"
"उनके साथ उनका एक क्लर्क तथा एक चपरासी था।"
इन्स्पेक्टर ने उनके रूप-रंग, आकार आदि के बारे में पूछा। सेठजी
ने पूरा हुलिया बता दिया। इस पर इन्स्पेक्टर ने पूछा, "क्या आपने उन्हें
चन्दा दे दिया?"
"हाँ साहब!" सेठजी ने कहा।
"कितना?"
"पन्द्रह हजार रुपये।"
तब इन्स्पेक्टर ने बताया, "आप ठगे गये हैं सेठजी, आपके साथ एक
बहुत बड़ा धोखा हुआ है। वे तीनों सेक्रेटरी, बाबू या क्लर्क कुछ नहीं थे।
वे चन्द्रशेखर आजाद, भगतसिंह और राजगुरु थे।"
सेठजी को काटो तो खून नहीं; उन्हें सारी धरती घूमती हुई दिखाई
देने लगी, अपने कानों पर यकायक विश्वास ही नहीं हुआ। उन्हें बेबात
पन्द्रह हजार रुपयों का चूना लग गया था। उन्हें मुनीम के ऊपर क्रोध तथा
स्वयं अपनी मूर्खता पर रोना आ रहा था।
गाड़ोदिया स्टोर डकैती :
भगतसिंह की गिरफ्तारी के बाद भी दल के कामों को आजाद निरन्तर
चलाते रहे। दल के कुछ कारखाने अभी भी चल रहे थे, किन्तु दल के अनेक
प्रमुख सदस्य गिरफ्तार हो चुके थे। ऐसे समय में चुप होकर बैठ जाना
आजाद के वश का नहीं था। अन्य व्यवस्था की दृष्टि के लिए 6 जून, 1930
के दिन दिल्ली की एक मोटर कम्पनी के द्वारा डकैती डाली। यह डकैती
गाड़ोदिया स्टोर डकैती के नाम से जानी जाती है। इस डकैती का नेतृत्व
चन्द्रशेखर आजाद ने स्वयं किया था। उनके अतिरिक्त इसमें दल के हंसराज
वायरलेस, धन्वन्तरि तथा विद्याभूषण कर्पूर भी उनके साथ रहे

५३
थे। इस डकैती में तेरह हजार रुपये हाथ लगे थे।
इस डकैती का सुखद आश्चर्यजनक पहलू यह है कि इस स्टोर के
मालिक को जब यह ज्ञान हुआ कि डकैती क्रान्तिकारियों द्वारा डाली गई है
तो उसने खोज-बीन के लिए इस मामले को फिर आगे नहीं बढ़ाया। इस
डकैती का पता लाहौर काण्ड में मुखबिर बने दल के ही सदस्य कैलाशपति
के बयानों के बाद चला।
काकोरी काण्ड ·
हर सम्भव प्रयत्न करने पर भी क्रान्तिकारी दल के पास धन की
रहती थी। इससे दल के कार्यक्रम सुचारु रूप से नहीं चल सकते थे।
दल ने कोई बड़ा कदम उठाने का निश्चय किया। इस विषय में पं०
रामप्रसाद बिस्मिल ने अपनी आत्मकथा में लिखा है—
'इस समय समिति की आर्थिक स्थिति बड़ी खराब थी। ....
का प्रबन्ध करना नितान्त आवश्यकता थी। किन्तु वह हो कैसे? दान क...
देता न था, कर्ज भी न मिलता था और कोई उपाय न देख डाका डालना
तय हुआ। किन्तु किसी व्यक्ति विशेष की सम्पत्ति पर डाका डालना
अभीष्ट न था। सोचा यदि लूटना है तो सरकारी माल क्यों न लूटा जाए!
इस उधेड़बुन में एक दिन मैं रेल में जा रहा था। गार्ड के डिब्बे के पास
की गाड़ी में बैठा था। स्टेशन मास्टर एक थैली लाया और गार्ड के डिब्बे
में डाल गया। कुछ खटपट की आवाज हुई और मैंने उतरकर देखा कि एक
लोहे का सन्दूक रखा है। मैंने विचार किया कि इसी में थैली डाली गयी
होगी। अगले स्टेशन पर उसमें थैली डालते भी देखा। अनुमान किया कि
डिब्बे में लोहे का सन्दूक जंजीरों से बंधा रहता होगा, ताला पड़ा रहता
होगा, आवश्यकता होने पर ताला खोलकर उतार लेते होंगे। इसके थोड़े
दिनों बाद लखनऊ स्टेशन पर जाने का अवसर प्राप्त हुआ। देखा एक
गाड़ी में से कुली लोहे के आमदनी वाले सन्दूक उतार रहे हैं। निरीक्षण
करने से मालूम हुआ कि उनमें जंजीर-ताला कुछ नहीं पड़ता, यों ही रखे
जाते हैं। उसी समय निश्चय किया कि इसी पर हाथ मारूँगा। उसी समय
...। हरएक स्थान पर जाकर टाइम टेबुल देखकर अनुमान किया

चन्द्रशेखर आजाद 49
कि सहारनपुर से गाड़ी चलती है, लखनऊ तक अवश्य रोज दस हजार
रुपये की आमदनी होती होगी।"
स्पष्ट है कि यह योजना पण्डित रामप्रसाद 'बिस्मिल' के मस्तिष्क की
उपज थी। अतः इसके लिए 9 अगस्त, 1925 का दिन निश्चित किया गया।
इसके लिए दल के दस युवकों का चुनाव किया गया—पण्डित रामप्रसाद
'बिस्मिल', अशफाकउल्ला खां, राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी, चन्द्रशेखर आजाद,
मन्मथनाथ गुप्त, बनवारीलाल, शचीन्द्रनाथ बख्शी, मुरारीलाल, केशव
चक्रवर्ती तथा मुकुन्दीलाल।
8 डाउन पैसेंजर गाड़ी सहारनपुर से चलती थी तथा इसमें सभी
स्टेशनों से राजस्व इकट्ठा होकर लखनऊ पहुँचता था। अतः निश्चित
समय पर ये वीर अपने अभियान पर चल पड़े। इस विषय में मन्मथनाथ
गुप्त लिखते हैं—"हम लोग 9 तारीख को संध्या समय शाहजहाँपुर से
हथियार, छेनी, घन, हथोड़े आदि से लैस होकर गाड़ी पर सवार हो गए।
इस गाड़ी में रेल के खजाने के अतिरिक्त कोई और खजाना भी जा रहा
था जिसके साथ बन्दूकों का पहरा था। इसके अतिरिक्त गाड़ी में कई
और बन्दूकें थीं। कुछ पल्टनियां गोरे भी हथियार सहित मौजूद थे। जिसमें
शायद एक मेजर भी ऊँचे क्लास में था। हमारे स्काउट ने खबर दी, तब
हम असमंजस में पड़ गए। श्री अशफाक ने शायद अपना निषेध फिर से
लोगों के मस्तिष्क में प्रविष्ट कराने की चेष्टा की, किन्तु हम लोग तुल चुके
थे। हम इतने अग्रसर हो चुके थे कि हमारा लौटना कठिन था और हम
लौटना चाहते भी नहीं थे। एक महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि यों तो अशफाक
मना कर रहे थे, किन्तु जब उन्होंने देखा कि उनकी एक न चली और हम
लोग काम करने पर तुले हैं, तो उन्होंने कमर कस ली। उनकी सुन्दर बड़ी-
बड़ी आँखें तेज से दीप्त हो उठीं और अपना पार्ट अदा करने के लिए
अत्यन्त साहस तथा हर्षपूर्वक प्रस्तुत हो गए।"
श्री अशफाकउल्ला, राजेन्द्र लाहिड़ी तथा शचीन्द्रनाथ बख्शी द्वितीय
श्रेणी के डिब्बे में यात्रा कर रहे थे, अन्य लोग तृतीय श्रेणी में बैठे थे। कुछ
सदस्यों को द्वितीय श्रेणी के डिब्बों में एक विशेष उद्देश्य से बैठाया गया
था। गाड़ी को काकोरी में जंजीर खींचकर रोकना था, किन्तु तृतीय श्रेणी

30 स्वदेश
के डिब्बों की जंजीरें प्रायः खराब रहती थीं।
इस दल के पास चार बड़े माउजर पिस्तौल, प्रत्येक के लिए
कुछ अधिक कारतूस तथा अन्य छोटे-मोटे हथियार थे। काकोरी उस
जिले में एक छोटा-सा गाँव है। जब यह जगह थोड़ी ही दूर रह गई
तो जंजीर खींच कर उसे रोक दिया गया। गाड़ी के रुकने पर यात्री उतर
कर गार्ड के डिब्बे के पास जाने लगे, कुछ खिड़कियों से सिर बाहर निकाल-
ने लगे और फिर गार्ड भी नीचे उतर आया और उस डिब्बे की ओर
गया, जहाँ से जंजीर खींची गई थी। क्रान्तिकारी तुरन्त डिब्बों से बा-
हर आए। उन्होंने यात्रियों को डिब्बों में चढ़ जाने का आदेश दिया, कि
गार्ड को जमीन पर लेट जाने को कहा गया, ताकि उसके बिना गाड़ी
नहीं सके। दो-दो व्यक्ति पटरी के दोनों ओर कुछ दूरी पर खड़े हो गए,
उनके हाथों में माउजर पिस्तौलें थीं, जो एक-एक हजार गज तक मार कर
सकती थीं। उन्हें रुक-रुककर आकाश की ओर हवाई फायर करने को कहा
गया था, किन्तु एक युवक ने मूर्खता से सामने की ओर गोली चला दी।
यह गोली एक यात्री का काम तमाम कर गई। वह व्यक्ति सम्भवतः
महिला बोगी में बैठी हुई अपनी पत्नी को सान्त्वना देने जा रहा था।
दल के दोय सदस्य गार्ड के डिब्बे में चढ़ गए। लोहे का सन्दूक बाहर
उतार लिया गया। सन्दूक तोड़ डाला गया, उसमें निकले पैसों को चादरों
से गठरी बना ली गई। इसी समय लखनऊ की ओर से कोई दूसरी
या एक्सप्रेस गाड़ी भी आ रही थी। इससे क्रान्तिकारियों को कुछ शंका
हुई कि वह कहीं रुक न जाए और उसमें कुछ सशस्त्र लोग न हों। इस
घटना का विवरण श्री मन्मथनाथ गुप्त ने इस प्रकार किया है—
"....थैले निकालकर चादर में बाँध लिये गए। इसी समय लखनऊ
की ओर से कोई मेल या एक्सप्रेस आ रहा था। वह गाड़ी बड़ी जोर से
गुजरती हुई चली आ रही थी। हमारे दिल धड़क रहे थे। हम सोचते थे
कि कहीं यह गाड़ी खड़ी हो गई और इसमें कुछ लोग हथियारबन्द निकल
आए, तो हममें से दो-चार अवश्य ढेर हो जाएँगे। खैर गाड़ी किसी तरह
निकल गई। जब गाड़ी हमारे निकट से जा रही थी, तो हमने बन्दूकें जरा
... जब गाड़ी चली गई, तो हम लोगों ने अपना कार्य प्रारम्भ

चन्द्रशेखर आज़ाद
कर दिया। हम लोगों ने बहुत शीघ्र शायद दस मिनट से भी कम समय में
यह सब काम समाप्त कर दिया और थैलों को लेकर झाड़ियों की ओर
चले गए।"
इस लूट के बाद क्रान्तिकारी लखनऊ की ओर चले गए। रास्ते में रुपये
निकालकर चमड़े के थैलों को बरसात के पानी में डाल दिया गया और
फिर सभी लखनऊ पहुँच गए। इस डकैती में युवकों के इस दल को किसी
प्रकार के विरोध का सामना नहीं करना पड़ा। जबकि गाड़ी में चौदह
व्यक्ति ऐसे थे, जिनके पास हथियार भी थे। दो सशस्त्र गोरे सैनिक भी
थे। गाड़ी का ड्राइवर तथा इन्जीनियर बहुत अधिक भयभीत हो गए थे।
ड्राइवर इञ्जिन में लेट गया था और इन्जीनियर डरकर शौचालय में जा
छिपा था। यात्रियों से पहले ही कह दिया गया था कि वे निश्चिन्त रहें,
उन्हें कोई कुछ नहीं कहेगा; केवल सरकारी खजाना लूटा जाएगा। अतः
वे शान्ति से बैठे रहे। गाड़ी में बैठे लोगों ने यह समझ लिया था कि गाड़ी
को बहुत अधिक लोगों ने घेर लिया है, जबकि यह काम केवल दस युवकों
का था, जिनमें से अधिकतर सदस्यों की अवस्था बाईस वर्ष के आसपास थी।
हाँ, इन सभी युवकों का शरीर स्वस्थ तथा सुदृढ़ अवश्य था।
इस डकैती की सफलता से एक ओर जहाँ दल को कर्जों से मुक्ति
मिली, वहीं दूसरी ओर युवकों का साहस भी बढ़ गया। साथ ही नये हथि-
यार भी खरीदे गए और आगे की योजना भी बनने लगी।
गिरफ्तारियों का सिलसिला :
काकोरी काण्ड सरकार के लिए खुली चेतावनी के समान था। शीघ्र
ही पुलिस सक्रिय हो गई। जगह-जगह छापे मारे जाने लगे, तलाशियाँ ली
जाने लगीं। गुप्तचर विभाग भी अपने स्तर से इसकी खोज में जुट गया।
शीघ्र ही चालीस व्यक्ति गिरफ्तार कर लिये गए, जबकि डकैती में केवल
दस ही लोगों ने भाग लिया था। ऐसे लोगों को भी गिरफ्तार कर लिया
गया, जिनका इस मामले में कभी कोई सम्बन्ध नहीं था। इस प्रकार के
लोगों को बाद में छोड़ दिया गया।
शाहजहाँपुर के बनारसीलाल तथा इन्दुभूषण मित्र तथा कानपुर के

52 चन्द्रशेखर आजाद
' गोपीमोहन भी गिरफ्तार किये गए थे, किन्तु इनमें से प्रथम दो व्यक्ति
मुखबिर बन गए तथा गोपीमोहन साहा ने सरकारी गवाह बनना स्वीकार
कर लिया। इस डकैती में भाग लेनेवाला बनवारीलाल भी इकबाली गवाह
बन गया। इन लोगों ने पुलिस को सब-कुछ बता दिया, केवल बनारस केन्द्र
का कोई भी मुखबिर न मिल सका, अतः इस केन्द्र के बारे में पुलिस कुछ भी
पता न लगा सकी।
इन चारों को छोड़कर शेष चौबीस व्यक्ति अभियुक्त सिद्ध किये गये।
इक्कीस गिरफ्तार कर लिये गए तथा अशफाकउल्ला खां, चन्द्रशेखर आजाद
और शचीन्द्र बख्शी पुलिस के हाथ नहीं आए। इन्हें फरार घोषित कर दिया
गया।
बाद में दामोदरस्वरूप सेठ गम्भीर रूप से अस्वस्थ होने के कारण छोड़
दिये गए। मथुरा-आगरा केन्द्र के शिवचरणलाल तथा उरई-कानपुर केन्द्र के
वीरभद्र तिवारी पर से रहस्यमय अज्ञात कारणों से मुकदमा उठा लिया
गया।
मुकदमा :
शेष गिरफ्तार अभियुक्तों पर निम्नलिखित अभियोगों पर मुकदमा
चला—

  1. धारा 121 ब्रिटेन के सम्राट् के विरुद्ध युद्ध की घोषणा।
  2. धारा 120 अराजनीतिक षड्यन्त्र।
  3. धारा 396 कत्ल एव डकैती।
  4. धारा 302 कत्ल।

चन्द्रशेखर आजाद 53
सजाएँ :
काकोरी काण्ड के इन दोनों मुकदमों में अभियुक्तों को निम्नलिखित
सजाएँ मिलीं—
मृत्युदण्ड—पण्डित रामप्रसाद बिस्मिल, ठाकुर रोशनसिंह, राजेन्द्र-
नाथ लाहिड़ी तथा अशफाकउल्ला खां।
कालापानी—शचीन्द्रनाथ सान्याल तथा शचीन्द्र बख्शी।
चौदह वर्ष की कैद—मन्मथनाथ गुप्त।
दस वर्ष की कैद—योगेशचन्द्र चटर्जी, मुकुन्दीलाल, गोविन्दचरण कार,
राजकुमारसिंह तथा रामकृष्ण खत्री।
सात वर्ष की कैद—विष्णुशरण दुब्लिश और सुरेश भट्टाचार्य।
पाँच वर्ष की कैद—भूपेन्द्रनाथ सान्याल, प्रेमकृष्ण खन्ना तथा राम-
दुलारे त्रिवेदी।
चार वर्ष की कैद—प्रणवेश चटर्जी।
यद्यपि बनवारीलाल इकबाली गवाह बन गया था, फिर भी वह सजा
पाने से बच नहीं सका। अदालत ने उसे भी पाँच वर्ष की सजा दी।
मन्मथनाथ गुप्त, योगेशचन्द्र चटर्जी, मुकुन्दीलाल, गोविन्दचरण कार,
विष्णुशरण दुब्लिश तथा सुरेश भट्टाचार्य के विरुद्ध सरकार ने फिर अपील
की। इन ६ अभियुक्तों में से योगेशचन्द्र चटर्जी, मुकुन्दीलाल तथा गोविन्द-
चरण कार को पहले दस वर्ष की कैद की सजा मिली थी, बाद में इनकी
सजा भी बढ़ाकर कालेपानी में बदल दी गई तथा सात साल कैद की सजा
पानेवाले विष्णुशरण दुब्लिश और सुरेश भट्टाचार्य की सजा बढ़ाकर दस
वर्ष कर दी गई। उम्र कम होने के कारण मन्मथनाथ गुप्त की सजा पूर्ववत्
रही।

चन्द्रशेखर आजाद
54
परन्तु परिणाम शून्य रहा। अन्ततः अंग्रेजी सरकार ने अपनी क्रूरता का
परिचय दे ही दिया; 17 दिसम्बर, 1927 को राजेन्द्र लाहिड़ी को गोंडा
जेल में तथा 19 दिसम्बर को रामप्रसाद बिस्मिल को गोरखपुर जेल में,
इसी दिन अशफ़ाकउल्ला खा को फैजाबाद जेल मे और 18 दिसम्बर को
इलाहाबाद जेल में ठा० रोशनसिंह को फाँसी दे दी गई।
इस प्रकार यह दल छिन्न-भिन्न हो गया। केवल चन्द्रशेखर आजाद
ही पुलिस के हाथ नही आ सके। इसके साथ ही उनके क्रान्तिकारी जीवन
का पूर्वार्द्ध समाप्त हो गया।

चतुर्थ अध्याय
मध्यान्तर काल
काकोरी काण्ड के बाद चन्द्रशेखर आजाद ही ऐसे व्यक्ति थे, जिन्हें
लाख प्रयत्न करने पर भी पुलिस गिरफ्तार नहीं कर सकी। काकोरी काण्ड
के फैसले तक दल के लोगों को भी मालूम नहीं था कि आजाद कहाँ हैं।
श्री मन्मथनाथ गुप्त के अनुसार इस काण्ड के बाद वह दल के लोगों से
अपने घर जाने के लिए कहकर गए थे, किन्तु दल के लोगों को ही मालूम
नहीं था कि उनका घर उन्नाव था अथवा भाभरा।
इस काण्ड में उनके सभी साथी गिरफ्तार हो चुके थे। किन्तु आजाद
को खोजने के लिए पुलिस ने कुएँ, तालाब आदि भी छान मारे। इस विषय
में डॉ० भगवानदास माहौर ने लिखा है—
“प्रबल पराक्रम अंग्रेज सरकार ने उन्हें गिरफ्तार करने की चेष्टा में
कोई कसर उठा न रखी। आजाद पर कई हजार रुपये का इनाम घोषित
हो चुका था। जैसा कि कहते हैं; सारे कुओं में खोज हो चुकी थी, नदियों
में गोता लगाया गया और खोहों में तलाशा गया। पर आजाद रुद्रनारायण
के साथ परम शान्ति में निवास कर रहे थे।”
इस समय उनका निवास स्थान झाँसी और उसके आस-पास का क्षेत्र
ही था। उन दिनों झाँसी स्थित दल का केन्द्र ही उनके छिपने की जगह थी।
ऐसी स्थिति में कुछ दिनों तक शान्त बने रहना आवश्यक था। काकोरी
काण्ड के बाद से भगतसिंह के साथ नये दल के संगठन तक का समय
आजाद के क्रान्तिकारी जीवन का मध्यान्तर काल कहा जा सकता है। इस
काल में उनकी निम्नलिखित गतिविधियाँ रहीं।

56 चन्द्रशेखर आजाद
झाँसी में :
फरारी की अवस्था में सर्वप्रथम वह झाँसी पहुँचे। यहाँ उन्होंने मोटर
ड्राइविंग तथा मैकेनिक का काम सीखा और बुन्देलखण्ड मोटर कम्पनी में
काम किया। यहाँ काम करते समय एक बार उनके साथ एक दुर्घटना भी
हो गई, एक कार चालू नहीं हो रही थी, कोई भी व्यक्ति उसका हैण्डिल
नहीं घुमा पा रहा था। आजाद ने इसे चालू करने के लिए इतनी जोर से
हैण्डिल घुमाया कि उनके हाथ की हड्डी उखड़ गई। उन्हें तुरन्त अस्पताल
ले जाया गया। इसका ऑपरेशन करने के लिए क्लोरोफार्म सुंघाकर बेहोश
करना आवश्यक था, किन्तु डाक्टरों की इस राय से आजाद घबरा गए,
क्योंकि उन्होंने सुन रखा था कि बेहोशी की हालत में कभी-कभी व्यक्ति
अपनी गोपनीय बातें भी बता देता है। अतः आजाद बिना बेहोश हुए ही
ऑपरेशन कराने को तैयार हो गए, किन्तु डाक्टरों ने उनकी यह बात नहीं
मानी। आजाद ऑपरेशन-टेबल से उतर पड़े। तब उनके मित्रों ने किसी
तरह बेहोश किए जाने के लिए राजी किया।
सम्भवतः बेहोशी की हालत में उनके मुँह से कोई ऐसी बात निकल
गई, जिससे उनके क्रान्तिकारी होने का पता डाक्टर को लग गया था।
ऑपरेशन के बाद डाक्टर उनके साथ बड़े सम्मान से बातें कर रहा था।
अस्पताल से छुट्टी देते समय डाक्टर ने उनसे कहा--"अब आपका हाथ
ठीक हो गया, है। कोई चिन्ता न करिए। मुझे आशा है, आप अपने हाथों
का इस्तेमाल देश के लिए वीरता के साथ करेंगे।"
झाँसी में आजाद मास्टर रुद्रनारायण के छोटे भाई बनकर रहे थे।
डा० माहौर के अनुसार पुलिस ने कई बार रुद्रनारायण के घर पर छापे
भी मारे थे, आजाद को सामने देखकर भी वे उन्हें गिरफ्तार नहीं कर पाये,
क्योंकि उनके साथ आजाद का व्यवहार इस प्रकार का होता था कि पुलिस
कल्पना ही नहीं कर सकती थी कि वही आजाद होंगे और पुलिस के पास
उनका कोई फोटोग्राफ था नहीं, जो उन्हें पहचान पाती--.
"बार-बार रुद्रनारायण के घर की तलाशी हुई, पर बिल्कुल खुले रूप
में रहने वाले आजाद गिरफ्तार नहीं किए जा सके। आजाद आये हुए पुलिस
वालों और उनके अफसरों से मजाक करते रहे और बदमाश आजाद की

चालाकियों के विषय में उनकी कहानियाँ सुनते रहे। जब पुलिस वाले चले
जाते, तो आजाद हँसकर हमसे कहते—ये साले मुझे हौवा और जादूगर
बताये हुए हैं, ये बड़े मामूली लोग हैं। ये एक मजिस्ट्रेट के सामने गुलाम की
तरह खड़े रहते हैं। अब उस कुमुदसिंह को लो, जो यह कह रहा था—
क्रान्तिकारी लोग बड़े परिवारों में से होते हैं। अब अशफ़ाक़उल्ला को लो,
तो उसे डिप्टी मजिस्ट्रेट समझा जा सकता है।"
झाँसी में रहकर मोटर कम्पनी के कार्य के अतिरिक्त वह जंगलों में
जाकर निशाना लगाने का अभ्यास करते रहते थे। इन दिनों भगवानदास
माहौर से निरन्तर उनका सम्पर्क बना रहा।
साधु वेश में :
इसके बाद आजाद धीमरपुर गाँव चले गए और गाँव के बाहर एक
कुटिया बनाकर साधुवेश में रहने लगे। उन्हें ऐसा करने का परामर्श
रुद्रनारायण ने ही दिया था। यहाँ वह लोगों को रामचरित मानस की
चौपाइयाँ सुनाते थे। आरम्भ में लोग उन्हें भोजन का सामान कुटिया में
ही दे जाते थे, किन्तु बाद में आजाद श्रद्धालु लोगों के घर ही जाकर भोजन
करने लगे थे। यहीं उन्होंने छोटे बच्चों को पढ़ाने के लिए एक पाठशाला
भी खोली। पहले विद्यालय खुले आसमान के नीचे लगता था, परन्तु बाद
में गाँव के ही एक धनवान व्यक्ति ठाकुर मलखानसिंह ने इस कार्य के
लिए अपने घर की बैठक दे दी थी। बाद में आजाद, जो उन दिनों ब्रह्म-
चारी के नाम से जाने जाते थे, ठाकुर मलखानसिंह के ही घर में रहने लगे,
क्योंकि मलखानसिंह तथा उनके तीन भाई नौकरी करते थे और घर से
बाहर ही रहते थे। पुरुष सदस्य के घर में रहने से घर की सुरक्षा हो जाती
थी। आजाद वस्तुतः घर के सदस्य जैसे ही बन गए।
नरेशों के सम्पर्क में :
इस अवधि में उनका कई राजाओं एवं जमींदारों से भी सम्पर्क हुआ
था। एक बार ओरछा के राजा अपने दीवान आदि के साथ जंगल में
शिकार खेलने के लिए जा रहे थे, तब उनकी साधुवेशधारी आजाद से भेंट

58 चन्द्रशेखर आजाद

हुई थी। राजा साहब को शिकार के लिए जाते देख आजाद ने भी उनके
साथ चलने की इच्छा व्यक्त की। राजा को इससे बड़ा आश्चर्य हुआ कि
एक साधु शिकार करने की इच्छा व्यक्त कर रहा था। इस पर आजाद
ने अपने-आपको केवल एक पुजारी बताया था। अतः एक बन्दूक उन्हें भी
दे दी गई। इस पर राजा साहब तथा उनके कर्मचारियों को हंसी भी
आई। शिकार करते समय सभी लोग अपने-अपने स्थानों पर जम गए।
एक तगड़ा वनैला सूअर था। राजा तथा उसके सभी कर्मचारियों ने उस
पर गोलियां चलाईं, परन्तु सभी के निशाने चूक गए, फिर सबके अन्त में
आजाद ने निशाना लगाया, उनकी पहली ही गोली से सूअर धराशायी
हो गया। इस घटना के बाद राजा साहब को पक्का विश्वास हो गया कि
वह साधु या पुजारी न होकर कोई क्रान्तिकारी है। राजा साहब स्वयं भी
स्वतन्त्रता सेनानियों से सहानुभूति रखते थे। यह परिचय मित्रता में बदल
गया। काफी दिनों बाद आजाद ने उन्हें अपनी वास्तविकता बतायी।
एक बार बड़े लाट साहब ओरछा आने वाले थे। आजाद ने राजा के
पास सूचना भिजवाई कि इस अवसर पर वह लाट साहब का स्वागत
अपने ढंग से करना चाहते थे। राजा साहब ने आजाद से निवेदन किया
था कि लाट साहब राज्य के अतिथि बनकर आ रहे थे, अतः वह (आजाद)
ऐसा कुछ न करें।
यह भी कहा जाता है कि बाद में यही राजा साहब अपने एक मुंहलगे
नौकर के बहकावे में आकर आजाद को पकड़वाने के लिए सहमत हो गए
थे। जब उनके तथा इस नौकर के बीच इस योजना पर बात हो रही थी,
आजाद उस समय वहीं पर सो रहे थे। राजा को कोई शक न हो, इसलिए
वह जोर-जोर से खर्राटे ले रहे थे। इसके तुरन्त बाद मौका मिलते ही वह
वहां से भाग गए।
मास्टर रुद्रनारायण ने ही आजाद को साधुवेश में रहने का परामर्श
दिया था। उन्हीं के सहयोग से आजाद का सम्पर्क राजा साहब रानिया-
धाना से भी हुआ था। आजाद पहले उनके यहां एक अच्छे मोटर-मैकेनिक
के रूप में गए थे। बाद में राजा साहब को उन्होंने बताया था कि वह एक
क्रान्तिकारी हैं। मार्च, 1928 में राजा साहब ने उन्हें यह आश्वासन भी

चन्द्रशेखर आजाद 59
या था कि वह दल के कार्यों के लिए कुछ हथियार भी देंगे।
इस समय भगवानदास माहौर भी आज़ाद के साथ ही रहते थे। राजा
खलकश्री सिंहदेव के आजाद पक्के विश्वासपात्र बन गए थे। यहाँ रह-
कर वह ड्राइविंग तथा निशाना लगाने का अभ्यास भी करते रहते थे।
राजा साहब उनके साथ शिकार खेलने भी जाते रहते थे। राजा साहब की
उनके साथ इस घनिष्ठता से उनके कर्मचारी तथा रिश्तेदार ईर्ष्या करने
लगे, अतः आजाद ने खनियाधाना छोड़ दिया।
बम्बई में :
कुछ पुस्तको मे वर्णन मिलता है कि आजाद बुन्देलखण्ड के बाद फिर
बम्बई चले गए थे और वहाँ उन्होंने बन्दरगाह में कुली का काम किया।
दिनभर जहाजों में माल चढ़ाने या उतारने के काम करते थे, जिसके लिए
शाम को नौ आने मजदूरी मिलती थी। रात में बारह बजे तक विचर-
ते तथा फिर किसी गोदाम में या फुटपाथ पर सो जाते थे। यह क्रम
लगभग डेढ़ वर्ष तक चला।
यहाँ उन्होंने वीर सावरकर से भी भेंट की थी। सावरकर ने उन्हें
क्रान्तिपथ की कठिनाइयों से अवगत कराया और इनसे भयभीत न होने
का परामर्श दिया, इससे आजाद को एक नई प्रेरणा मिली और वह नये
सिरे से दल का संगठन करने के लिए बम्बई से उत्तर की ओर चल पड़े।