अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)
Amar Shaheed Chandrashekhar Azad
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की आवश्यकता होती है, उसे प्राप्त करने हेतु आरम्भ मे देशवासियो पर
डकैती डालनी होगी। यह तो स्पष्ट है कि धनी इसमें पैसा नही देंगे। बाद
मे श्री अरविन्द घोष ने समझाया कि स्वतन्त्रता के लिए डकैती करने मे
जिस राजनीतिक दोष की कल्पना की जाती है, वह पूर्णतया निराधार है।
अन्त मे रंगपुर के एक प्रतिनिधि ने कहा कि हम लोग डकैती करके जो-कुछ
भी लाएं, उसका सही-सही हिसाब रखा जाए और स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद
जिनसे जो-कुछ लिया जाए, वह उन्हे ठीक-ठीक लौटा दिया जाए। इस
प्रस्ताव का अरविन्द घोष ने समर्थन किया और यह पास हो गया।"
ये क्रान्तिकारी इस नियम का पूर्णरूप से पालन करते थे। लूटे गये
व्यक्ति के घर उनसे लूटे गये धन की रसीद भेज दी जाती थी। सन् 1916
मे कलकत्ता के गोपोराय क्षेत्र मे एक डकैती हुई थी। इस डकैती का नेतृत्व
श्री अतुल्य घोष एवं श्री पुलिन बनर्जी ने किया था। बाद मे लूटे गये घर
के स्वामी के लिए एक पत्र भेजा गया था, जिसमे लिखा था—"हमारे
कोष मे आपके हिसाब मे 9891 रु० 5 पाई दिये गए कर्ज के रूप मे जमा
हुए हैं। स्वतन्त्रता मिलने पर इस धन को व्याज सहित लौटा दिया
जाएगा।"
इन डाको के औचित्य पर प्रकाश डालते हुए श्री मन्मथनाथ गुप्त
अपनी पुस्तक 'भगतसिंह और उनका युग' मे इसी प्रकार के विचार प्रकट
करते हैं। उनका आशय है, "क्रान्तिकारी अपने घरो से भी दल के लिए
गहने चुराते थे। बंगाल मे एक क्रान्तिकारी ने अपने घर डाका डलवाया
था। पैसे का हिसाब बड़े ध्यान से रखा जाता था। चन्द्रशेखर आदि सभी
बड़ी गरीबी से जीवन बसर करते थे। ...आयरलैण्ड और रूस के क्रान्ति-
कारियों द्वारा भी डाके डाले गए। स्टालिन भी बाकू के पास डाली गई
डकैती मे शामिल थे। इंगलैण्ड मे सोवियत संघ के प्रथम राजदूत क्रासिन
भी डकैतियो मे शामिल हुए थे। इसे विदेशी क्रान्तिकारी जबरदस्ती वसूल
किया गया चंदा कहते थे। सिडीशन कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार एक
डकैती डालने पर क्रान्तिकारियों ने रसीद छोड़ दी थी—इतनी रकम ली
गई है। भारत स्वतन्त्र होने पर कर्जा अदा कर दिया जाएगा।
क्रान्तिकारियो के समक्ष धन की समस्या सदा बनी रही। चन्द्रशेखर