अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)
Amar Shaheed Chandrashekhar Azad
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के डिब्बों की जंजीरें प्रायः खराब रहती थीं।
इस दल के पास चार बड़े माउजर पिस्तौल, प्रत्येक के लिए
कुछ अधिक कारतूस तथा अन्य छोटे-मोटे हथियार थे। काकोरी उस
जिले में एक छोटा-सा गाँव है। जब यह जगह थोड़ी ही दूर रह गई
तो जंजीर खींच कर उसे रोक दिया गया। गाड़ी के रुकने पर यात्री उतर
कर गार्ड के डिब्बे के पास जाने लगे, कुछ खिड़कियों से सिर बाहर निकाल-
ने लगे और फिर गार्ड भी नीचे उतर आया और उस डिब्बे की ओर
गया, जहाँ से जंजीर खींची गई थी। क्रान्तिकारी तुरन्त डिब्बों से बा-
हर आए। उन्होंने यात्रियों को डिब्बों में चढ़ जाने का आदेश दिया, कि
गार्ड को जमीन पर लेट जाने को कहा गया, ताकि उसके बिना गाड़ी
नहीं सके। दो-दो व्यक्ति पटरी के दोनों ओर कुछ दूरी पर खड़े हो गए,
उनके हाथों में माउजर पिस्तौलें थीं, जो एक-एक हजार गज तक मार कर
सकती थीं। उन्हें रुक-रुककर आकाश की ओर हवाई फायर करने को कहा
गया था, किन्तु एक युवक ने मूर्खता से सामने की ओर गोली चला दी।
यह गोली एक यात्री का काम तमाम कर गई। वह व्यक्ति सम्भवतः
महिला बोगी में बैठी हुई अपनी पत्नी को सान्त्वना देने जा रहा था।
दल के दोय सदस्य गार्ड के डिब्बे में चढ़ गए। लोहे का सन्दूक बाहर
उतार लिया गया। सन्दूक तोड़ डाला गया, उसमें निकले पैसों को चादरों
से गठरी बना ली गई। इसी समय लखनऊ की ओर से कोई दूसरी
या एक्सप्रेस गाड़ी भी आ रही थी। इससे क्रान्तिकारियों को कुछ शंका
हुई कि वह कहीं रुक न जाए और उसमें कुछ सशस्त्र लोग न हों। इस
घटना का विवरण श्री मन्मथनाथ गुप्त ने इस प्रकार किया है—
"....थैले निकालकर चादर में बाँध लिये गए। इसी समय लखनऊ
की ओर से कोई मेल या एक्सप्रेस आ रहा था। वह गाड़ी बड़ी जोर से
गुजरती हुई चली आ रही थी। हमारे दिल धड़क रहे थे। हम सोचते थे
कि कहीं यह गाड़ी खड़ी हो गई और इसमें कुछ लोग हथियारबन्द निकल
आए, तो हममें से दो-चार अवश्य ढेर हो जाएँगे। खैर गाड़ी किसी तरह
निकल गई। जब गाड़ी हमारे निकट से जा रही थी, तो हमने बन्दूकें जरा
... जब गाड़ी चली गई, तो हम लोगों ने अपना कार्य प्रारम्भ