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अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)

अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)

Amar Shaheed Chandrashekhar Azad

सूचना एवं प्रसारण मन्त्रालय, भारत सरकार द्वारा

DevanagariHindipublished148 पृष्ठ

पृष्ठ 51, कुल 148 में से

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पृष्ठ 51

46 चन्द्रशेखर आजाद
"मैं आपके पास आया या आप मेरे पास आये एक ही बात है, इससे
क्या अन्तर पड़ता है।"
"यह तो आपका बड़प्पन है हजूर, जो आपने मेरे घर आने की कृपा
की। कृपया बताएँ कि मुझे कितनी सेवा करनी होगी?"
"सेठजी चन्दा गवर्नर साहब ने स्वयं लोगों का इन्कम टैक्स देखकर
निश्चित किया है, अतः आपके नाम पर पन्द्रह हजार रुपये लिखे गये हैं।"
रकम कुछ बड़ी थी। सेठजी को मायूस जैसा देखकर सेक्रेटरी साहब
ने अपना दूसरा दाँव फेंका—"आप कोई मामूली आदमी नहीं हैं। आप जो
आयकर देते हैं, उसको देखते हुए इतनी धनराशि कोई अधिक नहीं है।
महामहिम गवर्नर आपसे अत्यधिक प्रसन्न हैं, वह अगले वर्ष आपको राय-
बहादुर का खिताब देने वाले हैं।"
रायबहादुर खिताब का नाम सुनते ही सेठ दिलसुखराय की खुशी का
कोई ठिकाना न रहा। मौके का फायदा उठाते हुए सेक्रेटरी साहब फिर
बोले, "अगले वर्ष जिन लोगों को यह पदवी दी जा रही है, उस सूची में
आपका नाम भी है, समझ लीजिए आप रायबहादुर बन ही गये हैं। अब
तो केवल औपचारिकता पूरी होनी है।"
रायबहादुर की उपाधि मिलना उन दिनों बड़े सम्मान की बात समझी
जाती थी। इस प्रकार अपने आप इतना बड़ा सम्मान मिलने की बात सुनकर
कर सेठजी कठिनाई से अपनी खुशी को दबा पा रहे थे, वरना उनके मन में
खुशी के लड्डू फूट रहे थे। इस समय न मालूम वह क्या-क्या सोच रहे थे।
इधर सेक्रेटरी साहब और उनके साथी भी सेठजी के मन की बात को
समझ रहे थे और मन-ही-मन हँस भी रहे थे। उन्होंने सेठ की खूब तारीफ
करते हुए उसे इस बात का पूरा विश्वास दिला दिया कि अब उसकी इस
उपाधि को कोई नहीं छीन सकता। बातों ही बातों में सेठजी ने पन्द्रह
हजार रुपये का चन्दा दे दिया। सेक्रेटरी साहब रसीद-बुक साथ ही लाये
थे। साथ आये बाबू ने रसीद बनाकर सेठजी को दे दी। सेक्रेटरी साहब
अपने बाबू और चपरासी के साथ चलते बने। सेठजी बेचारे रायबहादुर
की पदवी मिलनेवाली है, इस खुशी में पागल हुए जा रहे थे।
उतनी देर में नौकर ने सेठजी को पुलिस के आने की सूचना दी।