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अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)

अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)

Amar Shaheed Chandrashekhar Azad

सूचना एवं प्रसारण मन्त्रालय, भारत सरकार द्वारा

DevanagariHindipublished148 पृष्ठ

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चन्द्रशेखर आजाद 47
ही सी० आई० डी० इन्स्पेक्टर चार-पांच सिपाहियों के साथ अन्दर
आया। आते ही उसने सेठजी से प्रश्न किया, "अभी आपके यहाँ कौन
आया था?"
"गवर्नर साहब के सेक्रेटरी आये थे, चन्दा माँगने।" सेठजी बोले।
"उनके साथ और कौन-कौन थे?"
"उनके साथ उनका एक क्लर्क तथा एक चपरासी था।"
इन्स्पेक्टर ने उनके रूप-रंग, आकार आदि के बारे में पूछा। सेठजी
ने पूरा हुलिया बता दिया। इस पर इन्स्पेक्टर ने पूछा, "क्या आपने उन्हें
चन्दा दे दिया?"
"हाँ साहब!" सेठजी ने कहा।
"कितना?"
"पन्द्रह हजार रुपये।"
तब इन्स्पेक्टर ने बताया, "आप ठगे गये हैं सेठजी, आपके साथ एक
बहुत बड़ा धोखा हुआ है। वे तीनों सेक्रेटरी, बाबू या क्लर्क कुछ नहीं थे।
वे चन्द्रशेखर आजाद, भगतसिंह और राजगुरु थे।"
सेठजी को काटो तो खून नहीं; उन्हें सारी धरती घूमती हुई दिखाई
देने लगी, अपने कानों पर यकायक विश्वास ही नहीं हुआ। उन्हें बेबात
पन्द्रह हजार रुपयों का चूना लग गया था। उन्हें मुनीम के ऊपर क्रोध तथा
स्वयं अपनी मूर्खता पर रोना आ रहा था।
गाड़ोदिया स्टोर डकैती :
भगतसिंह की गिरफ्तारी के बाद भी दल के कामों को आजाद निरन्तर
चलाते रहे। दल के कुछ कारखाने अभी भी चल रहे थे, किन्तु दल के अनेक
प्रमुख सदस्य गिरफ्तार हो चुके थे। ऐसे समय में चुप होकर बैठ जाना
आजाद के वश का नहीं था। अन्य व्यवस्था की दृष्टि के लिए 6 जून, 1930
के दिन दिल्ली की एक मोटर कम्पनी के द्वारा डकैती डाली। यह डकैती
गाड़ोदिया स्टोर डकैती के नाम से जानी जाती है। इस डकैती का नेतृत्व
चन्द्रशेखर आजाद ने स्वयं किया था। उनके अतिरिक्त इसमें दल के हंसराज
वायरलेस, धन्वन्तरि तथा विद्याभूषण कर्पूर भी उनके साथ रहे