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अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)

अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)

Amar Shaheed Chandrashekhar Azad

सूचना एवं प्रसारण मन्त्रालय, भारत सरकार द्वारा

DevanagariHindipublished148 पृष्ठ

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थे। इस डकैती में तेरह हजार रुपये हाथ लगे थे।
इस डकैती का सुखद आश्चर्यजनक पहलू यह है कि इस स्टोर के
मालिक को जब यह ज्ञान हुआ कि डकैती क्रान्तिकारियों द्वारा डाली गई है
तो उसने खोज-बीन के लिए इस मामले को फिर आगे नहीं बढ़ाया। इस
डकैती का पता लाहौर काण्ड में मुखबिर बने दल के ही सदस्य कैलाशपति
के बयानों के बाद चला।
काकोरी काण्ड ·
हर सम्भव प्रयत्न करने पर भी क्रान्तिकारी दल के पास धन की
रहती थी। इससे दल के कार्यक्रम सुचारु रूप से नहीं चल सकते थे।
दल ने कोई बड़ा कदम उठाने का निश्चय किया। इस विषय में पं०
रामप्रसाद बिस्मिल ने अपनी आत्मकथा में लिखा है—
'इस समय समिति की आर्थिक स्थिति बड़ी खराब थी। ....
का प्रबन्ध करना नितान्त आवश्यकता थी। किन्तु वह हो कैसे? दान क...
देता न था, कर्ज भी न मिलता था और कोई उपाय न देख डाका डालना
तय हुआ। किन्तु किसी व्यक्ति विशेष की सम्पत्ति पर डाका डालना
अभीष्ट न था। सोचा यदि लूटना है तो सरकारी माल क्यों न लूटा जाए!
इस उधेड़बुन में एक दिन मैं रेल में जा रहा था। गार्ड के डिब्बे के पास
की गाड़ी में बैठा था। स्टेशन मास्टर एक थैली लाया और गार्ड के डिब्बे
में डाल गया। कुछ खटपट की आवाज हुई और मैंने उतरकर देखा कि एक
लोहे का सन्दूक रखा है। मैंने विचार किया कि इसी में थैली डाली गयी
होगी। अगले स्टेशन पर उसमें थैली डालते भी देखा। अनुमान किया कि
डिब्बे में लोहे का सन्दूक जंजीरों से बंधा रहता होगा, ताला पड़ा रहता
होगा, आवश्यकता होने पर ताला खोलकर उतार लेते होंगे। इसके थोड़े
दिनों बाद लखनऊ स्टेशन पर जाने का अवसर प्राप्त हुआ। देखा एक
गाड़ी में से कुली लोहे के आमदनी वाले सन्दूक उतार रहे हैं। निरीक्षण
करने से मालूम हुआ कि उनमें जंजीर-ताला कुछ नहीं पड़ता, यों ही रखे
जाते हैं। उसी समय निश्चय किया कि इसी पर हाथ मारूँगा। उसी समय
...। हरएक स्थान पर जाकर टाइम टेबुल देखकर अनुमान किया