अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)
Amar Shaheed Chandrashekhar Azad
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संदर्भ में पढ़ेंचन्द्रशेखर आजाद 49
कि सहारनपुर से गाड़ी चलती है, लखनऊ तक अवश्य रोज दस हजार
रुपये की आमदनी होती होगी।"
स्पष्ट है कि यह योजना पण्डित रामप्रसाद 'बिस्मिल' के मस्तिष्क की
उपज थी। अतः इसके लिए 9 अगस्त, 1925 का दिन निश्चित किया गया।
इसके लिए दल के दस युवकों का चुनाव किया गया—पण्डित रामप्रसाद
'बिस्मिल', अशफाकउल्ला खां, राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी, चन्द्रशेखर आजाद,
मन्मथनाथ गुप्त, बनवारीलाल, शचीन्द्रनाथ बख्शी, मुरारीलाल, केशव
चक्रवर्ती तथा मुकुन्दीलाल।
8 डाउन पैसेंजर गाड़ी सहारनपुर से चलती थी तथा इसमें सभी
स्टेशनों से राजस्व इकट्ठा होकर लखनऊ पहुँचता था। अतः निश्चित
समय पर ये वीर अपने अभियान पर चल पड़े। इस विषय में मन्मथनाथ
गुप्त लिखते हैं—"हम लोग 9 तारीख को संध्या समय शाहजहाँपुर से
हथियार, छेनी, घन, हथोड़े आदि से लैस होकर गाड़ी पर सवार हो गए।
इस गाड़ी में रेल के खजाने के अतिरिक्त कोई और खजाना भी जा रहा
था जिसके साथ बन्दूकों का पहरा था। इसके अतिरिक्त गाड़ी में कई
और बन्दूकें थीं। कुछ पल्टनियां गोरे भी हथियार सहित मौजूद थे। जिसमें
शायद एक मेजर भी ऊँचे क्लास में था। हमारे स्काउट ने खबर दी, तब
हम असमंजस में पड़ गए। श्री अशफाक ने शायद अपना निषेध फिर से
लोगों के मस्तिष्क में प्रविष्ट कराने की चेष्टा की, किन्तु हम लोग तुल चुके
थे। हम इतने अग्रसर हो चुके थे कि हमारा लौटना कठिन था और हम
लौटना चाहते भी नहीं थे। एक महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि यों तो अशफाक
मना कर रहे थे, किन्तु जब उन्होंने देखा कि उनकी एक न चली और हम
लोग काम करने पर तुले हैं, तो उन्होंने कमर कस ली। उनकी सुन्दर बड़ी-
बड़ी आँखें तेज से दीप्त हो उठीं और अपना पार्ट अदा करने के लिए
अत्यन्त साहस तथा हर्षपूर्वक प्रस्तुत हो गए।"
श्री अशफाकउल्ला, राजेन्द्र लाहिड़ी तथा शचीन्द्रनाथ बख्शी द्वितीय
श्रेणी के डिब्बे में यात्रा कर रहे थे, अन्य लोग तृतीय श्रेणी में बैठे थे। कुछ
सदस्यों को द्वितीय श्रेणी के डिब्बों में एक विशेष उद्देश्य से बैठाया गया
था। गाड़ी को काकोरी में जंजीर खींचकर रोकना था, किन्तु तृतीय श्रेणी