अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)
Amar Shaheed Chandrashekhar Azad
सूचना एवं प्रसारण मन्त्रालय, भारत सरकार द्वारा
पृष्ठ 47, कुल 148 में से
संदर्भ में पढ़ें42 चन्द्रशेखर आजाद
आजाद जब क्रांतिकारी दल में शामिल हुए, तो दल का सदस्य होने के
कारण उन्हें भी इस समस्या का सामना करना पड़ा। इस समस्या के कारण
दल के सदस्यों को भोजन एवं वस्त्र-जैसी सामान्य आवश्यकताओं के लिए
भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। कभी-कभी तो सदस्यों के
लिए भोजन का प्रबन्ध करना भी कठिन हो जाता था। यहाँ तक कि कभी-
कभी भोजन न मिलने पर क्रांतिकारियों को भिखारियों के लिए खोले गए
लंगरों में जाकर अपनी भूख शान्त करनी पड़ती थी, किन्तु आजाद को इन
जगहों पर भोजन करना बड़ा ही अपमानजनक लगता था। इसके साथ ही
अन्य अनेक आवश्यकताएँ भी दल के सामने थीं। इन सब समस्याओं के
निराकरण हेतु अमीर लोगों के यहाँ डाके डालने की योजना बनी।
दल के कार्यों के लिए डकैतियां :
अन्य कोई रास्ता न देखकर दल ने डाके डालने आरम्भ कर दिये।
पण्डित रामप्रसाद बिस्मिल डकैतियों में दल का नेतृत्व करते थे। दल की
ओर से इस प्रकार का पहला डाका प्रतापगढ़ के पास एक गाँव में मुखिया
के घर डाला गया। रामप्रसाद अपने साथियों को लेकर डाका डालने के
लिए चल पड़े। गाँव के बाहर गाँव के ही कुछ लोगों से उनकी मुलाकात
हुई। गाँव के लोगों ने उनसे पूछा कि वे कहाँ जा रहे थे। इस पर उन्हें
बताया गया कि दल के लोगों को गाँव के मुखिया के यहाँ दावत पर बुलाया
गया था।
चन्द्रशेखर आजाद भी इस डकैती में शामिल थे। मुखिया के घर
पहुँचने पर डाका डालने से पहले बिस्मिल ने अपने साथियों को निर्देश
दिया कि "दल का उद्देश्य केवल धन प्राप्त करना है; किसी की हत्या
करना नहीं। अतः केवल धन ही लूटा जाए और इस बात का ध्यान रहे
कि किसी महिला के साथ कोई भी किसी प्रकार का अभद्र व्यवहार न
करे।" साथी घर के अन्दर घुस गए और रामप्रसाद बिस्मिल स्वयं हाथ में
पिस्तौल लेकर बाहर खड़े रहे, ताकि यदि कोई व्यक्ति बाहर से मदद के
लिए आये, तो उसे अन्दर न जाने दिया जाए।
दल के लोग अन्दर लूटपाट करने लगे। घर में चीख-पुकार मच गई।