अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)
Amar Shaheed Chandrashekhar Azad
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स्त्रियों के साथ किसी भी प्रकार की जबरदस्ती न करने का निर्देश था,
उनके इस तरह के व्यवहार से फायदा उठाकर एक महिला ने चन्द्रशेखर
आजाद के हाथ से पिस्तोल छीन लिया। स्त्री पर हाथ नहीं डाला जा
सकता था। इधर चीख-पुकार सुनकर बाहर गाँव के कई लोग इकट्ठे हो
चुके थे और उनकी संख्या बढ़ती जा रही थी। रामप्रसाद बिस्मिल उन्हें
रोके खड़े थे। स्थिति गम्भीर हो गई थी, किन्तु किसी की भी हत्या नहीं
करनी थी। तब बिस्मिल ने अपने साथियों को भाग चलने का संकेत किया
और सब साथी भाग खड़े हुए। यहाँ से कुछ भी हाथ नहीं लगा, वरन् एक
पिस्तौल से हाथ ही धोने पड़े। इस प्रकार दल को पहले ही डाके में
असफलता का मुँह देखना पड़ा।
इसके बाद दूसरा डाका एक जमींदार के यहाँ डाला गया। सभी
क्रांतिकारी घर के अन्दर लूटपाट करने लगे। इसी बीच दल के एक सदस्य
की नजर घर की एक युवा लड़की पर पड़ी। उसे देखकर उस सदस्य का
मन डोल पड़ा। वह उस लड़की के साथ दुर्व्यवहार करने लगा। चन्द्रशेखर
आजाद ने उसे देख लिया और ऐसा न करने की चेतावनी दी, किन्तु उसने
उनकी बात पर कोई ध्यान नहीं दिया। उदार चरित्र आजाद से यह बर-
दाश्त नहीं हुआ; वह क्रोधित हो उठे और उन्होंने अपने ही दल के उस
सदस्य को गोली मार दी। इसके बाद उन्होंने उस लड़की के साथ हुए
अभद्र व्यवहार के लिए उससे क्षमा माँगी और वहाँ से कुछ लूटे बिना चले
गए। इस प्रकार दूसरी डकैती में भी कुछ हाथ नहीं लगा।
अपने एक साथी से दल के कार्य के लिए आजाद ने चार हजार रुपये
कर्ज लिये थे। यह पैसा छः महीने बाद ब्याज सहित चुकाया जाना था।
इसका उल्लेख पिछले अध्याय में हो चुका है। उस मित्र ने भी यह पैसा
किसी दूसरे से लेकर दिया था। अभी तीन महीने ही हुए थे कि एक दिन
वह मित्र आजाद के पास आया और उसने बताया कि वह व्यक्ति, जिससे
उसने पैसे लिये थे, अपने पैसे माँग रहा था। अतः उसने आजाद से पैसे
लौटाने की प्रार्थना की। इस पर आजाद बड़े असमंजस में पड़ गए। उन्होंने
उस मित्र को अपनी परिस्थिति बताई तथा यह भी कहा कि वायदे के अनु-
सार पैसे छः महीने बाद अवश्य लौटा दिये जाएँगे।